17 March 2019

आमलकी एकादशी व्रत विधि | पौराणिक व्रत कथा | Amalaka Ekadashi 2019 | Amalaki Ekadashi Vrat Katha in Hindi #EkadashiVrat

आमलकी एकादशी व्रत विधि | पौराणिक व्रत कथा | Amalaka Ekadashi 2019 | Amalaki Ekadashi Vrat Katha in Hindi #EkadashiVrat

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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत महाशिवरात्रि तथा होली के मध्य में आता हैं, तथा इस एकादशी में आवले के फल का अति विशेष महत्व होता हैं। अतः फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी या आमला एकादशी अथवा आंवला एकादशी के रूप में मनाया जाता हैं। आमलकी एकादशी को आमलक्य एकादशी भी कहा जाता हैं।

        आमलकी का अर्थ आंवला ही होता हैं, जिसे हिन्दू धर्म शास्त्रों में गंगा नदी के समान श्रेष्ठ बताया गया हैं। पद्म पुराण के अनुसार आंवला का वृक्ष भगवान विष्णुजी को अत्यंत प्रिय माना गया हैं। पीपल के समान आंवले के पेड़ में प्रत्येक देवी-देवताओं का वास माना गया हैं। स्वर्ग तथा मोक्ष की प्राप्ति की इच्छा रखने वाले प्रत्येक मनुष्य को फाल्गुन मास की आमला एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिये। आँवला को देवतुल्य माना गया हैं। आमलकी एकादशी के व्रत में आँवले के कृक्ष का पूजन किया जाता हैं। इस वृक्ष के प्रत्येक अंग में ईश्वर का वास कहा गया हैं। आंवले के वृक्ष में भगवान श्रीविष्णु का वास होने के कारण वृक्ष के नीचे श्रीहरी का पूजन किया जाता हैं। इस पावन दिवस आंवले का उबटन, आंवले के जल से स्नान, आंवला पूजन, आंवले का भोजन तथा आंवले का दान करने का विधान हैं।



आमलकी एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?

आमलकी एकादशी महाशिवरात्रि तथा होली के मध्य में आती हैं। सनातन हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार आमलकी एकादशी का व्रत सम्पूर्ण भारत-वर्ष में फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। साथ ही, अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत फरवरी या मार्च के महीने में आता हैं।

आमलकी एकादशी व्रत का महत्व

आमलकी एकादशी के व्रत में आँवले के कृक्ष का पूजन किया जाता हैं। इस पावन एकादशी को शास्त्रो में उसी प्रकार श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हैं जैसे माँ गंगा को नदियों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त हैं। वेदो, पुराणो तथा शास्त्रो के अनुसार जब भगवान श्रीविष्णुजी ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति की थी, तब उन्होंने एक आंवला के वृक्ष को भी प्रतिष्ठित किया हैं। एक बार भगवान विष्णुजी ने जब अवज्ञा प्रकट किया तो उससे चन्द्रमा के समान कांतिमान एक बिंदु पृथ्वी पर प्रकट हुआ। इस बिन्दु से ही आंवला का वृक्ष उतपन्न हुआ था। ऋषि-मुनि तथा देवता गण उस वृक्ष के पास आये। तथा वे उस वृक्ष को देखकर अश्चर्यचकित हो गए क्योकि वे अभी तक इस प्रकार के वृक्ष के बारे में नही जानते थे। तभी आकाशवाणी हुई की “महानुभावों, यह वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ वृक्ष आमलक का हैं, जो विष्णुजी को अति प्रिय हैं। इसके स्मरण मात्र से गोदान का फल प्राप्त होता हैं तथा स्पर्श करने से दुगुना एवम फल का स्वादन करने से तिगुना फल प्राप्त होता हैं।” अतः आँवला को देवतुल्य माना गया हैं। इस वृक्ष के प्रत्येक अंग में ईश्वर का वास कहा गया हैं। भगवान श्री हरि विष्णु जी ने स्वयं कहा हैं स्वर्ग तथा मोक्ष की इच्छा रखने वाले प्रत्येक मनुष्य को फाल्गुन मास की आमलकी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिये। आंवले का यह वैष्णव वृक्ष समस्त पापो को हरने वाला हैं। जीसके मूल में विष्णु, ब्रह्मा तथा भगवान भोलेनाथ स्वयं वास करते हैं, शाखाओ में मुनि, टहनियों में प्रेत्येक देवता, पत्तो में स्वयं वसु, फूलो में मरुद्गण तथा फलो में समस्त प्रजापति वास करते हैं।
अतः भगवान विष्णुजी ने स्वयं कहा हैं की, फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आमलकी एकादशी का श्रद्धा-पूर्वक व्रत जो कोई करेगा। उसे अवश्य ही मनोवांछित फलों की प्राप्ति होगी।
पद्मपुराणके उत्तरखण्ड में एकादशी के व्रत के महत्व को पूर्ण रुप से बताया गया हैं। आमलकी एकादशी के व्रत से जातक को पूर्वजन्म से प्रारम्भ कर वर्तमान के जन्म तक प्रत्येक पापों से मुक्ति प्राप्त होती हैं। इस पावन व्रत का वर्णन स्कन्द पुराण में अति सुन्दर रूप से वर्णित हैं। आमलकी एकादशी का व्रत सनातन धर्म में अति उत्तम माना गया हैं। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होतें हैं एवं दोनों लोकों में उसकी विजय अवश्य ही निश्चित हो जाती हैं।
आमलकी एकदशी का व्रत रखने से जातक को अपनी समस्त इच्छाओं तथा स्वप्नों को पूर्ण करने में सहायता प्राप्त होती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो जातक एकादशी का व्रत नियमित रखते हैं उन्हे भगवान् श्री नारायण की विशेष कृपा निरंतर प्राप्त होती रहती हैं। ब्रह्मांड पुराणमें आमलकी एकदशी का दिन एक ऐसे व्रत के रूप में वर्णित हैं की, जिस दिन व्रत रखने से समस्त दुःखों की समाप्ति होती हैं तथा भाग्य शीघ्र उदित हो जाता हैं। हिन्दू धर्मानुसार इस व्रत के पुण्य से मनुष्य के प्रत्येक पाप नष्ट हो जाते हैं। पद्मपुराण में कहा गया हैं कि युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण जी ने स्वयं बताया हैं की एकादशी का व्रत समस्त प्राणियों के लिए अनिवार्य हैं। एकादशी के दिन सूर्य तथा अन्य ग्रह अपनी स्थिती में परिवर्तित होते हैं, जिसका प्रत्येक मनुष्य की इन्द्रियों पर प्रभाव पड़ता हैं। इन विपरीत प्रभाव में संतुलन बनाने हेतु व्रत किया जाता हैं। व्रत तथा ध्यान ही मनुष्यो में संतुलित रहने का गुण विकसित करते हैं। आमलकी एकादशी के महत्व का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराणमें भी प्राप्त होता हैं, तथा इस एकादशी को मेरूपर्वत के समान जो बड़े-बड़े पाप हैं उनसे मुक्ति प्राप्त करने हेतु सर्वाधिक आवश्यक माना गया हैं। उन समस्त पाप-कर्मो को यह पापनाशिनी आमलकी एकादशी एक ही उपवास में भस्म कर देती हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार भगवान् श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति निर्जल संकल्प लेकर आमलकी एकादशी व्रत रखता हैं, उसे मोक्ष के साथ भगवान विष्णु की प्राप्ति होती हैं। पूर्ण श्रद्धा-भाव से यह व्रत करने से जाने-अनजाने में किये जातक के समस्त पाप क्षमा होते हैं, तथा उसे मुक्ति प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी आगे बताते हैं कि इस दिवस दान का विशेष महत्व होता हैं। जातक यदि अपनी इच्छा से अनाज, जूते-चप्पल, छाता, कपड़े, पशु या सोना का दान करता हैं, तो इस व्रत का फल उसे पूर्णतः प्राप्त होता हैं। अतः आमलकी एकादशी व्रत के दिवस यथासंभव दान व दक्षिणा देनी चाहिए। जो जातक आमलकी एकादशी का सच्ची श्रद्धा-भाव से व्रत करते हैं, उनके पितर नरक के दु:खों से मुक्त हो कर भगवान विष्णु के परम धाम अर्थात विष्णुलोक को चले जाते हैं। साथ ही जातक को सांसारिक जीवन में सुख शांति, ऐश्वर्य, धन-सम्पदा तथा अच्छा परिवार प्राप्त होता हैं। जो मनुष्य जीवन-पर्यन्त एकादशी को उपवास करता हैं, वह मरणोपरांत वैकुण्ठ जाता हैं। श्रीकृष्ण जी यह भी बताते हैं कि इस व्रत के प्रभाव से जातक को मृत्यु के पश्चात नरक में जाकर यमराज के दर्शन कदापि नहीं होते हैं, किन्तु सीधे स्वर्ग का मार्ग खुलता हैं। जो मनुष्य आमलकी एकादशी का व्रत रखता हैं, उसे अच्छा स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि, सम्पति, उत्तम बुद्धि, राज्य तथा ऐश्वर्य प्राप्त होता हैं। विष्णु जी के भक्तो के लिए, इस एकादशी का विशेष महत्व हैं। जो जातक आमलकी एकादशी के दिन भगवान श्रीविष्णु की कथा का श्रवण करता हैं, उसे सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी दान करने का फल प्राप्त होता हैं। इस दिवस उपवास रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती हैं, साथ ही व्रत के प्रभाव से जातक का शरीर भी स्वस्थ रहता हैं। जो व्यक्ति पूर्ण रूप से उपवास नहीं कर सकते उनके लिए मध्याह्न या संध्या-काल में एकाहार अर्थात एक समय भोजन करके एकादशी व्रत करने का विधान हैं। एकादशी में अन्न का सेवन करने से पुण्य का नाश होता हैं तथा भारी दोष लगता हैं। एकादशी-माहात्म्य को सुनने मात्र से सहस्र गोदानोंका पुण्यफल प्राप्त होता हैं। पौराणिक ग्रंथो के अनुसार एकादशी का व्रत जीवों के परम लक्ष्य, भगवद-भक्ति को प्राप्त करने में सहायक माना गया हैं। अतः एकादशी का दिन प्रभु की पूर्ण श्रद्धा से भक्ति करने के लिए अति शुभकारी तथा फलदायक हैं। इस दिवस जातक अपनी इच्छाओं से मुक्त हो कर यदि शुद्ध चित्त से प्रभु की पूर्ण-भक्ति से सेवा करता हैं तो वह अवश्य ही प्रभु की कृपा के पात्र बनता हैं। आमलकी एकादशी व्रत की कथा सुनने, सुनाने तथा पढने मात्र से 100 गायो के दान के तुल्य पुण्य-फलो की प्राप्ति होती हैं। अतः आमलकी एकादशी मुक्तिदायिनी होने के साथ ही समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली मानी जाती हैं।

आमलकी एकादशी व्रत पूजन सामग्री

भगवान के लिए पीला वस्त्र
श्री विष्णु जी की मूर्ति
शालिग्राम भगवान की मूर्ति
पुष्प तथा पुष्पमाला
नारियल तथा सुपारी
धूप, दीप तथा घी
पंचामृत (दूध (कच्चा दूध), दही, घी, शहद तथा शक्कर का मिश्रण)
अक्षत
तुलसी पत्र
चंदन
कलश
प्रसाद के लिए मिष्ठान तथा ऋतुफल
आंवला

आमलकी एकादशी व्रत की पूजा विधि

        एकादशी का व्रत रखने वाले भक्तो को अपना मन शांत एवं स्थिर रखना चाहिए। किसी भी प्रकार की द्वेष-भावना या क्रोध को मन में नहीं लाना चाहिए। इस दिन विशेष रूप से व्रती को बुरे कर्म करने वाले, पापी तथा दुष्ट व्यक्तियों की संगत से बचना चाहिये। परनिंदा से बचना चाहिए तथा इस दिन कम से कम बोलना चाहिए, जिस से मुख से कोई गलत बात ना निकल पाये। तथापि यदि जाने-अंजाने कोई भूल हो जाए, तो उसके लिये भगवान श्री हरि से क्षमा मांगते रहना चाहिए।
प्रत्येक एकादशी व्रत का विधान स्वयं श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा हैं। व्रत की विधि बताते हुए श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि एकादशी व्रतों के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही प्रारम्भ किया जाता हैं, अतः दशमी तिथि के दिन में सात्विक भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा साँयकाल में सूर्यास्त के पश्चात भोजन नहीं करना चाहिए एवं रात्रि में भोग विलास को त्याग कर एवं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन तथा नारायण की छवि मन में बसाए हुए, भगवान का ध्यान करते हुए शयन करना चाहिए। दशमी के दिन से ही, चावल, उरद, चना, मूंग, जौ, मसूर, लहसुन, शराब तथा अन्य नशीली चीजो का सेवन नहीं करना चाहिए।
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        अगले दिन अर्थात एकादशी व्रत के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर, स्नानादि से पवित्र होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण कर, आंवले के वृक्ष के समीप जाएँ। आमलकी एकादशी में भगवान विष्णु जी की पूजा-अर्चना की जाती हैं। इस दिन विष्णु भक्त सम्पूर्ण दिवस व्रत रखते हैं। यह माना जाता हैं कि आवलें के वृक्ष की उत्पत्ति श्री विष्णु के मुख से हुई थी, अतः इस दिवस व्रती द्वारा आवलें के वृक्ष की पूजा की जाती हैं।  पूजा के पश्चात आंवले के वृक्ष के नीचे नवरत्न युक्त कलश स्थापित करना चाहिए। इन सब चीजों के अभाव में श्रीविष्णुजी की सामान्य पूजा में आंवले का प्रयोग करना चाहिए। इसके पश्चात आँवले के वृक्ष के चारों ओर साफ कर के गाय के गोबर तथा गंगाजल से भूमि को लीपकर पवित्र कर लेना चाहिए। इसके पश्चात आसन पर बैठकर व्रत संकल्प लेना चाहिए कि मैं आज समस्त भोगों को त्याग कर, निराहार एकादशी का व्रत करुंगा, हे प्रभु मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा करें। तथा मेरे समस्त पाप क्षमाँ करे।संकल्प लेने के पश्चात कलश स्थापना की जाती हैं अतः वृक्ष की जड़ में एक वेदी बनायें। वेदी पर जल से भरा कलश रखना चाहिए। जल में गंगाजल मिलायें। कलश में पंचरत्न तथा सुगंधी रखनी चाहिए। आम का पल्लव भी रखें। कलश पर चंदन लगायें तथा वस्त्र समर्पित करना चाहिए। कलश के ऊपर एक पात्र में खील भरकर रखनी चाहिए। जीसके ऊपर श्री विष्णु के छठें अवतार श्री परशुराम जी का स्वर्ण मूर्ति या प्रतिमा को स्थापित करना चाहिए। तत्पश्चात, षोडशोपचार विधि से भगवान परशुराम जी की पूजा करें। दीप जलायें। उसके पश्चात शालिग्राम भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर वस्त्र पहनाए एवं पुष्प तथा ऋतु फल का भोग लगायें तथा शालिग्राम पर तुलसी-पत्र अवश्य चढ़ाना चाहिए। उसके पश्चात धूप, दीप, गंध, कमल अथवा वैजयन्ती पुष्प, गंगा जल, पंचामृत, नैवेद्य, मिठाई, नारियल, सुपारी, सुंदर आंवला, बेर, अनार, आम आदि जैसे ऋतु-फल से भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान हैं। अतः भगवान लक्ष्मी नारायण जी की विधिवत पूजन-आरती करनी चाहिए। साथ ही, धन प्राप्ति तथा आर्थिक समृद्धि के लिए आमलकी एकादशी के दिन माँ लक्ष्मीजी की भी पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात आमलकी एकादशी की कथा सुने, पढे अथवा सुनायें। श्री विष्णु भगवान एवं एकादशी माता की आरती करें। इस दिवस आँवले के वृक्ष की १०८ या २८ बार परिक्रमा करनी चाहिए।
        इस दिन प्रसाद के रूप में पंचामृत तथा आंवले का समस्त श्रद्धालुओ में वितरण करना चाहिए। इस दिन श्रीखंड चंदन अथवा सफ़ेद चन्दन या गोपी चन्दन मस्तक पर लगाकर पूजन करना चाहिए।
व्रत के दिन अन्न वर्जित हैं। अतः निराहार रहें तथा सध्याकाल में पूजा के पश्चात चाहें तो फलाहार कर सकते हैं। फल तथा दूध खा कर एवं सम्पूर्ण दिवस चावल तथा अन्य अनाज ना खा कर आंशिक व्रत रखा जा सकता हैं। यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए तथा इस दिन आप दान करके पुन्य प्राप्त कर सकते हैं।
एकादशी के व्रत में रात्रि जागरण का अधिक महत्व हैं। कहा गया हैं की, जो भक्तजन एकादशी की रात्रि में जागरण एवं भजन कीर्तन करते हैं उन्हें श्रेष्ठ यज्ञों से जो पुण्य प्राप्त होता उससे कई गुना अधिक पुण्य फलो की प्राप्ति होती हैं। अतः संभव हो तो रात्रि में जगकर भगवान का भजन कीर्तन अवश्य करना चाहिए। एकादशी के दिन भगवान विष्णु का स्मरण कर विष्णु-सहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा-दृष्टि प्राप्त होती हैं। इस दिन आमलकी एकादशी व्रत की कथा अवश्य पढनी, सुननी तथा सुनानी चाहिए।
व्रत के अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि पर सवेरा होने पर पुन: स्नान करने के पश्चात श्रीविष्णु भगवान की पूजा तथा आरती करनी चाहिए। उसके पश्चात सही मुहूर्त में व्रत का पारण करना चाहिए, साथ ही ब्राह्मण-भोज करवाने के पश्चात योग्य कर्मकाण्डी ब्राह्मण को अन्न तथा सुंदर आंवले का दान तथा यथा-संभव सोना, तिल, भूमि, गौ, फल, छाता, जनेऊ या धोती दक्षिणा के रूप में देकर, उनका आशीर्वाद ग्रहण करना चाहिए तथा उपस्थित श्रद्धालुओ में प्रसाद वितरित करने के पश्चात स्वयं मौन रह कर, भोजन ग्रहण करना चाहिए।

आमलकी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

आमलकी एकादशी व्रत की पौराणिक कथा



पद्मपुराण के उत्तरखण्ड के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से परम पुण्यकारी आमलकी एकादशी के विषय पर पूछे जाने पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को आमलकी एकादशी की कथा सुनाई थी। उन्होंने बताया कि, “हे कुंती पुत्र! में तुम्हें आमलकी एकादशी की कथा सुनता हूँ। आमलकी एकादशी की कथा को पढ़ने, सुनने अथवा सुनाने मात्र से ही समस्त प्राणी को राजसूय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता हैं। अतः तुम यह कथा ध्यानपूर्वक सुनो-

प्राचीन समय में वैदिक नामक एक नगर था। उस नगर में ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय, शूद्र, चारों वर्ण के लोग प्रसन्तता-पूर्वक निवास करते थे। नगर में सदैव वेदध्वनि गूँजती रहती थी। उस नगरी में कोई भी पापी, दुराचारी या नास्तिक मनुष्य नहीं रहता था।

नगर में चैत्ररथ नामक चंद्रवंशी राजा राज्य करता था। वह उच्चकोटि का विद्वान तथा धार्मिक प्रवृत्ति का व्यक्ति था, उसके राज्य में कोई भी गरीब नहीं था तथा न ही कंजूस। उस राज्य के प्रत्येक व्यक्ति विष्णुजी के परम भक्त थे। नगर के वृद्ध या बालक, प्रत्येक निवासी प्रत्येक एकादशी का व्रत किया करते थे।

एक समय फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी नामक एकादशी का दिन आया। उस दिन राजा तथा प्रत्येक प्रजाजन, वृद्ध से बालक तक ने आनंदपूर्वक उस एकादशी को उपवास किया। राजा अपनी प्रजा के साथ मंदिर में जाकर कलश स्थापित करने पश्चात धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न, छत्र आदि से भगवानजी का विशेष पूजन करने लगा। राज्य के प्रत्येक नागरिक भी भगवानजी की स्तुति करने लगे।

उस मंदिर में रात्री के समय प्रत्येक प्रजाजनो ने जागरण किया। रात्री के ही समय उस स्थान पर एक बहेलिया आया। जो की महापापी तथा दुराचारी व्यक्ति था।

अपने कुटुंब का पालन वह जीव हिंसा से करता था। वह भूख-प्यास से अति व्याकुल था, कुछ भोजन पाने की इच्छा से वह उस मंदिर के एक कोने में बैठ गया।

उस स्थान बैठकर वह भगवान विष्णुजी की कथा तथा एकादशी माहात्म्य को सुनने लगा। इस प्रकार उस बहेलिए ने सम्पूर्ण रात्री अन्य लोगों के बीच जागरण कर के व्यतीत की। प्रातःकाल प्रजाजन अपने-अपने निवास-स्थान पर चले गए। साथ ही, वह बहेलिया भी अपने घर चला गया तथा घर पहुचने के पश्चात भोजन किया।

कुछ समय व्यतीत होने के पश्चात उस बहेलिए की अकाल मृत्यु हो गई। उसने जीव हिंसा की थी, इस कारण वह घोर नरक का भागी था, किन्तु उस दिवस आमलकी एकादशी का अज्ञान वश व्रत तथा जागरण के प्रभाव से उसने राजा विदुरथ के यहां जन्म लिया। पुरोहितो ने उसका नाम वसुरथ रखा। बड़ा होने पर वह चतुरंगिणी सेना सहित तथा धन-धान्य से युक्त होकर दस सहस्र ग्रामों का कुशल संचालन करने लगा।

वह तेज में सूर्य के भांति, कांति में चंद्रमा के भांति, वीरता में भगवान श्रीविष्णु के भांति तथा क्षमा में पृथ्वीमाता के भांति था। वह अत्यंत धार्मिक, सत्यवादी, कर्मवीर तथा अपार विष्णु-भक्त राजा था। वह प्रजा का समान भाव से पालन करता था। दान-पुण्य करना उसका नित्य-कर्म के समान था।

एक बार राजा वसुरथ शिकार खेलने के लिए गया। दैवयोग से वन में वह रास्ता भटक गया तथा दिशा का अज्ञान होने के कारण उसी वन में एक वृक्ष के समीप सो गया। कुछ समय पश्चात पहाड़ी डाकू वहाँ आए तथा राजा को अकेला पा कर मारो-मारोचिल्लाते हुए राजा वसुरथ की ओर भागे। वह डाकू कहने लगे कि इस दुष्ट राजा ने हमारे माता-पिता, पुत्र-पौत्र आदि समस्त सम्बंधियों का वध किया हैं तथा हमे देश से निकाल दिया हैं। अब हमें इसे मृत्युदंड दे कर अपने अपमान का प्रतिशोध लेना होगा।

इतना कहने पश्चात समस्त डाकू राजा को मारने लगे तथा राजा पर अस्त्र-शस्त्र का प्रहार करने लगे। उन डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र राजा के शरीर पर लगते ही नष्ट हो जाते तथा राजा को पुष्पों के समान प्रतीत होते। कुछ समय के पश्चात भगवान की इच्छा अनुसार डाकुओं के अस्त्र-शस्त्र उन्हीं पर प्रहार करने लगे, जिससे वे सभी डाकू मूर्च्छित हो गए।

उसी समय राजा के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुई। वह देवी अत्यंत सुंदर प्रतीत हो रही थी तथा सुंदर वस्त्रों एवं अलौकिक आभूषणों से अलंकृत थी। उसकी भृकुटी टेढ़ी थी। उसकी आंखों से क्रोध की भीषण लपटें प्रवाहित हो रही थीं।

उस समय वह देवी काल के समान प्रतीत हो रही थी। उस देवीने कुछ ही क्षण में उन समस्त डाकुओं का समूल नाश कर दिया।

निंद्रा से जागने पर राजा ने वहाँ अनेक डाकुओं को मृत अवस्था मे देखा। वह विचार करने लगा किसने इन्हें पराजित किया? इस अपरिचित वन में कौन मेरा हितैषी रहता हैं?

राजा वसुरथ ऐसा विचार कर ही रहा था कि उसी समय आकाशवाणी हुई की- हे राजन! इस संसार मे भगवान श्रीविष्णु के अतिरिक्त तेरी रक्षा कौन कर सकता हैं!

इस आकाशवाणी को सुनकर राजा ने भगवान विष्णुजी का स्मरण कर उन्हें प्रणाम किया, तथा अपने नगर को लौट आया एवं सुखपूर्वक राज्य करने लगा तथा मरणोपरांत वैकुंठ धाम को गया।

इस प्रकार भगवान श्रीहरि की शक्ति हमारे समस्त कष्टों का नाश एक क्षण में ही कर देती हैं। यह माँ शक्ति केवल मनुष्य की ही नहीं, अपितु देवताओं की रक्षा में भी पूर्णतः समर्थ हैं। इसी शक्ति के बल से भगवान विष्णुजी ने मधु-कैटभ नाम के अति शक्तिशाली राक्षसों का वध किया था। तथा यही माँ शक्ति ने  उत्पन्ना एकादशी के रूप मे प्रकट हो कर मुर नामक दैत्य का वध कर देवताओं को भी भयमुक्त किया था।

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