14 February 2020

मुंडन मुहूर्त 2020 | मुंडन के लिए शुभ समय शुभ दिन | Mundan Sanskar Muhurat in 2020 | चौलमुंडन | चूड़ाकरण संस्कार

मुंडन मुहूर्त 2020 | मुंडन के लिए शुभ समय शुभ दिन | Mundan Sanskar Muhurat in 2020 | चौलमुंडन | चूड़ाकरण संस्कार

mundan muhurat in hindi india
mundan sanskar muhurat

सनातन हिन्दू धर्म में जन्म के पश्चात प्रत्येक शिशु के गर्भकाल के बाल उतारने की परंपरा हैं, जिसे मुंडन संस्कार कहा जाता हैं। बालकों का मुण्डन 3, 5 तथा 7 आदि विषम वर्षों में किया जाता हैं। वहीं बालिकाओं का चौल कर्म (मुण्डन) संस्कार सम वर्षों में किया जाता हैं। हालांकि कुल परंपरा के अनुसार बच्चों का मुण्डन 1 वर्ष की आयु में भी किया जाता हैं।

मुंडन को लेकर हिन्दू धार्मिक मान्यता हैं कि पूर्व जन्मों के ऋणों से मुक्ति के उद्देश्य से जन्मकालीन केश काटे जाते हैं। वहीं वैज्ञानिक दृष्टि के अनुसार जब बच्चा माँ के पेट में होता हैं तो उसके सिर के बालों में बहुत से हानिकारक बैक्टीरिया लग जाते हैं जो जन्म के पश्चात धोने से भी नहीं निकल पाते हैं अतः बच्चे के जन्म के 1 साल के भीतर एक बार मुंडन अवश्य कराना चाहिए।

मुंडन मुहूर्त के लिए तिथि, नक्षत्र तथा मास विचार

हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ (बड़े बच्चे का मुंडन इस माह में न करें, साथ ही इस माह में जन्म लेने वाले बच्चे का मुंडन भी न करें), आषाढ़ (मुंडन आषाढ़ी एकादशी से पहले करें), माघ तथा फाल्गुन मास में बच्चों का मुण्डन संस्कार कराना चाहिए।
तिथियां में द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी तथा त्रयोदशी मुंडन संस्कार के लिए शुभ मानी जाती हैं।
मुंडन के लिए सोमवार, बुधवार, गुरुवार तथा शुक्रवार शुभ दिन माने गये हैं। वहीं शुक्रवार के दिन बालिकाओं को मुंडन नहीं करना चाहिए।
नक्षत्रों में अश्विनी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, पुनर्वसु, चित्रा, स्वाति, ज्येष्ठ, श्रवण, धनिष्ठा तथा शतभिषा मुंडन संस्कार के लिए शुभ माने गये हैं।
कुछ विद्वानों के अनुसार जन्म मास व जन्म नक्षत्र तथा चंद्रमा के चतुर्थ, अष्टम, द्वादश तथा शत्रु भाव में स्थित होने पर मुंडन निषेध माना गया हैं। वहीं कुछ विद्वान जन्म नक्षत्र या जन्म राशि को मुंडन के लिए शुभ मानते हैं।
द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, षष्टम, सप्तम, नवम या द्वादश राशियों के लग्न या इनके नवांश में मुंडन शुभ होते हैं।

मुंडन संस्कार के लाभ

मुंडन के संदर्भ में यजुर्वेद में उल्लेख हैं कि, मुंडन संस्कार बल, आयु, आरोग्य तथा तेज की वृद्धि के लिए किया जाने वाला अति महत्वपूर्ण संस्कार हैं।
मुण्डन के प्रभाव से बच्चों को दांतों के निकलते समय होने वाला दर्द अधिक परेशान नहीं करता हैं।
मुण्डन के पश्चात बच्चों के शरीर का तापमान सामान्य हो जाता हैं। इससे मस्तिष्क स्थिर रहता हैं, साथ ही बच्चों को शारीरिक तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ नहीं होती हैं।
जन्मकालीन केश उतारे जाने के पश्चात सिर पर धूप पड़ने से विटामिन डी मिलता हैं। इससे कोशिकाओं में रक्त का प्रवाह अच्छी तरह से होता हैं तथा इसके प्रभाव से भविष्य में आने वाले बाल अत्यंत अच्छे होते हैं।

विशेष: मुंडन संस्कार का शुभ मुहूर्त में संपन्न होना शिशु के लिए लाभदायक तथा कल्याणकारी होता हैं, अतः मुंडन संबंधी मुहूर्त के लिए विद्वान ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें या अपनी कुल परंपरा के अनुसार बच्चों का मुण्डन कराएँ।

मुंडन संस्कार का शुभ मुहूर्त 2020

16 जनवरी, गुरुवार
माघ कृष्ण षष्ठी
हस्त नक्षत्र
07:11 से 09:48

17 जनवरी, शुक्रवार
माघ कृष्ण सप्तमी
चित्रा नक्षत्र
07:18 से 07:25

30 जनवरी, गुरुवार
माघ शुक्ल पंचमी
उ. भाद्रपद नक्षत्र
15:02 से 19:08

31 जनवरी, शुक्रवार
माघ शुक्ल षष्ठी
रेवती नक्षत्र
07:04 से 18:14

07 फरवरी, शुक्रवार
माघ शुक्ल त्रयोदशी
पुनर्वसु नक्षत्र
07:06 से 18:24

13 फरवरी, गुरुवार
फाल्गुन कृष्ण पंचमी
हस्त नक्षत्र
07:02 से 20:02

14 फरवरी, शुक्रवार
फाल्गुन कृष्ण षष्ठी
स्वाति नक्षत्र
07:01 से 18:21

17 फरवरी, सोमवार
फाल्गुन कृष्ण नवमी
ज्येष्ठा नक्षत्र
14:36 से 20:06

21 फरवरी, शुक्रवार
फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
09:13 से 17:21

28 फरवरी, शुक्रवार
फाल्गुन शुक्ल पंचमी
अश्विनी नक्षत्र
06:48 से 19:23

05 मार्च, गुरुवार
फाल्गुन शुक्ल दशमी
आर्द्रा नक्षत्र
11:26 से 18:59

11 मार्च, बुधवार
चैत्र कृष्ण द्वितीया
हस्त नक्षत्र
06:35 से 18:36

13 मार्च, शुक्रवार
चैत्र कृष्ण चतुर्थी
स्वाति नक्षत्र
08:51 से 13:59

25 मार्च, बुधवार
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
रेवती नक्षत्र
09:13 से 17:21

26 मार्च, गुरुवार
चैत्र शुक्ल द्वितीया
रेवती/अश्विनी नक्षत्र
07:06 से 18:24

16 अप्रैल, गुरुवार
वैशाख कृष्ण नवमी
धनिष्ठा नक्षत्र
18:12 से 20:50

17 अप्रैल, शुक्रवार
वैशाख कृष्ण दशमी
उ.भाद्रपद नक्षत्र
05:54 से 07:05

27 अप्रैल, सोमवार
वैशाख शुक्ल चतुर्थी
मृगशिरा नक्षत्र
14:30 से 20:07

29 अप्रैल, बुधवार
वैशाख शुक्ल षष्ठी
पुनर्वसु नक्षत्र
05:42 से 19:58

30 अप्रैल, गुरुवार
वैशाख शुक्ल सप्तमी
पुष्य नक्षत्र
05:41 से 14:39

13 मई, बुधवार
ज्येष्ठा कृष्ण षष्ठी
श्रावण नक्षत्र
05:32 से 19:04

14 मई, गुरुवार
ज्येष्ठा कृष्ण सप्तमी
श्रावण नक्षत्र
05:31 से 06:51

15 मई, शुक्रवार
ज्येष्ठ कृष्ण अष्टमी
धनिष्ठा नक्षत्र
04:02 से 08:23

20 मई, बुधवार
ज्येष्ठ कृष्ण त्रयोदशी
अश्विनी नक्षत्र
05:28 से 19:19

25 मई, सोमवार
ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया
मृगशिरा नक्षत्र
05:26 से 05:54

27 मई, बुधवार
ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी
पुनर्वसु नक्षत्र
05:25 से 20:28

28 मई, गुरुवार
ज्येष्ठ शुक्ल षष्ठी
पुष्य नक्षत्र
05:25 से 07:27

01 जून, सोमवार
ज्येष्ठ शुक्ल दशमी
हस्त नक्षत्र
05:24 से 13:16

03 जून, बुधवार
ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी
स्वाति नक्षत्र
05:23 से 06:21

07 जून, रविवार
आषाढ़ कृष्ण द्वितीया
मूल नक्षत्र
05:23 से 19:44

08 जून, सोमवार
आषाढ़ कृष्ण तृतीया
उत्तराषाढ़ा नक्षत्र
05:23 से 18:21

10 जून, बुधवार
आषाढ़ कृष्ण पंचमी
श्रावण नक्षत्र
05:23 से 10:34

11 जून, गुरुवार
आषाढ़ कृष्ण षष्ठी
धनिष्ठा नक्षत्र
11:28 से 19:29

15 जून, सोमवार
आषाढ़ कृष्ण दशमी
रेवती नक्षत्र
06:29 से 16:31

17 जून, बुधवार
आषाढ़ कृष्ण एकादशी
अश्विनी नक्षत्र
05:23 से 07:04

03 जुलाई, शुक्रवार
ज्येष्ठा नक्षत्र
आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी
07:06 से 18:24

08 जुलाई, बुधवार
धनिष्ठा नक्षत्र
श्रावण कृष्ण तृतीया
05:01 से 09:19

09 जुलाई, गुरुवार
शतभिषा नक्षत्र
श्रावण कृष्ण चतुर्थी
10:12 से 16:56

12 जुलाई, रविवार
रेवती नक्षत्र
श्रावण कृष्ण सप्तमी
08:18 से 21:11

13 जुलाई, सोमवार
रेवती/अश्विनी नक्षत्र
श्रावण कृष्ण अष्टमी
10:29 से 16:48

18 अक्तूबर, रविवार
स्वाती नक्षत्र
आश्विन शुक्ल द्वितीया
07:06 से 15:22

19 अक्तूबर, सोमवार
अनुराधा नक्षत्र
आश्विन शुक्ल तृतीया
08:16 से 14:08

13 February 2020

2020 में होलिका दहन कब है | शास्त्रोक्त नियम | होली 2020 | होली कब है 2020 | When Is Holi in 2020

2020 में होलिका दहन कब है | शास्त्रोक्त नियम | होली 2020 | होली कब है 2020 | When Is Holi in 2020

holi kitni tarikh ko hai
holi kab ki hai ?

हिन्दू पंचांग के अनुसार होली त्यौहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी तथा धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। महाशिवरात्रि के पावन पर्व के पश्यात, इस त्योहार को बसंत ऋतु के आगमन का स्वागत करने के लिए मनाते हैं। होलिका दहन जिसे छोटी होली भी कहते हैं इस पर्व के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है तथा अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है। बसंत ऋतु में प्रकृति में फैली रंगों की छटा को ही रंगों से खेलकर वसंत उत्सव होली के रूप में दर्शाया जाता है। विशेषतः हरियाणा में इस पर्व को धुलंडी भी कहा जाता है। हिन्दू धर्म में भी इस पर्व का बहुत अधिक महत्व होता है।

होलिका दहन का इतिहास

होली का वर्णन बहुत पहले से हमें देखने को मिलता है। प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में 16वीं शताब्दी का चित्र मिला है जिसमें होली के पर्व को उकेरा गया है। ऐसे ही विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी ख़ुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।
होली का इतिहास
होली का वर्णन बहुत पहले से हमें देखने को मिलता है। प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में १६वीं शताब्दी का चित्र मिला है जिसमें होली के पर्व को उकेरा गया है। ऐसे ही विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से ३०० वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है।

होलिका दहन का शास्त्रोक्त नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए -
    1.   पहला, उस दिन भद्रान हो। भद्रा का ही एक दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।
    2.   दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के पश्यात के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा की उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा तथा अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए; क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत -- होलिका जलकर भस्म हो गयी तथा भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।

होली से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

होली से जुड़ी अनेक कथाएँ इतिहास-पुराण में पायी जाती हैं; जैसे हिरण्यकश्यप-प्रह्लाद की जनश्रुति, राधा-कृष्ण की लीलाएँ तथा राक्षसी धुण्डी की कथा आदि।

रंगवाली होली से एक दिन पहले होलिका दहन करने की परंपरा है। फाल्गुन मास की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करते हुए होलिका दहन किया जाता है। कथा के अनुसार असुर हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था, किन्तु यह बात हिरण्यकश्यप को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। बालक प्रह्लाद को भगवान कि भक्ति से विमुख करने का कार्य उसने अपनी बहन होलिका को सौंपा, जिसके पास वरदान था कि अग्नि उसके शरीर को जला नहीं सकती। भक्तराज प्रह्लाद को मारने के उद्देश्य से होलिका उन्हें अपनी गोद में लेकर अग्नि में प्रविष्ट हो गयी, किन्तु प्रह्लाद की भक्ति के प्रताप तथा भगवान की कृपा के फलस्वरूप ख़ुद होलिका ही आग में जल गयी। अग्नि में प्रह्लाद के शरीर को कोई नुक़सान नहीं हुआ।

रंगवाली होली को राधा-कृष्ण के पावन प्रेम की याद में भी मनाया जाता है। कथानक के अनुसार एक बार बाल-गोपाल ने माता यशोदा से पूछा कि वे स्वयं राधा की तरह गोरे क्यों नहीं हैं। यशोदा ने मज़ाक़ में उनसे कहा कि राधा के चेहरे पर रंग मलने से राधाजी का रंग भी कन्हैया की ही तरह हो जाएगा। इसके पश्यात कान्हा ने राधा तथा गोपियों के साथ रंगों से होली खेली तथा तब से यह पर्व रंगों के त्योहार के रूप में मनाया जा रहा है।

यह भी कहा जाता है कि भगवान शिव के शाप के कारण धुण्डी नामक राक्षसी को पृथु के लोगों इस दिन भगा दिया था, जिसकी याद में होली मनाते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में होली का पर्व

यह पर्व सबसे ज़्यादा धूम-धाम से ब्रज क्षेत्र में मनाया जाता है। ख़ास तौर पर बरसाना की लट्ठमार होली बहुत मशहूर है। मथुरा तथा वृन्दावन में भी १५ दिनों तक होली की धूम रहती है। हरयाणा में भाभी द्वारा देवर को सताने की परंपरा है। कुछ स्थानों जैसे की मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में होली के पांचवें दिन रंगपंचमी मनाई जाती है, जो मुख्य होली से भी अधिक ज़ोर-शोर से खेली जाती है। महाराष्ट्र में रंग पंचमी के दिन सूखे गुलाल से खेलने की परंपरा है। दक्षिण गुजरात के आदि-वासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है। छत्तीसगढ़ में लोक-गीतों का बहुत प्रचलन है तथा मालवांचल में भगोरिया मनाया जाता है।

होलिका दहन का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, होली को असत्य पर सत्य की जीत के रूप में जाना जाता है। जहाँ एक ओर होली वाले दिन सभी तरह-तरह के रंगों में मलीन दिखाई पड़ते है वहीं दूसरी तरफ इससे एक दिन पहले होलिका दहन मनाई जाती है। जिसे नारायण के भक्त प्रहलाद के विश्वास तथा उसकी भक्ति के रूप में मनाया जाता है।

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, होलिका दहन को छोटी होली के नाम से भी जाना जाता है जिसे फाल्गुन माह की पूर्णिमा को किया जाता है। होलिका दहन सूर्यास्त के पश्चात् प्रदोष के समय पूर्णिमा तिथि रहते हुए किये जाते है। पूर्णिमा तिथि के दौरान भद्रा लगने पर होलिका पूजन निषेध माना जाता है। क्योंकि भद्रा में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

रंगवाली होली का महत्व :

होलिका दहन के दुसरे दिन धुलेंडी मनाई जाती है जिसे रंगवाली होली भी कहते है। इस दिन सभी लोग आपस में एक दुसरे को गुलाल लगाते है, ढोल आदि बजाकर होली के गीत गाते है। किन्तु आजकल जमाना काफी मॉडर्न हो गया है तो लोग ढोल की जगह स्पीकर लगाकर होली के गानों पर नाचते गाते जश्न मनाते है।
रंग-पर्व होली हमें जाति, वर्ग तथा लिंग आदि विभेदों से ऊपर उठकर प्रेम व शान्ति के रंगों को फैलाने का संदेश देता है। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!

2020 में होलिका दहन कब है | शास्त्रोक्त नियम होली कब है?

होलिका दहन 2020
09 मार्च 2020, सोमवार

रंगवाली होली (धुलण्डी)
10 मार्च 2020, मंगलवार

होलिका दहन मुहूर्त

09 मार्च 2020, सोमवार
साँय 18:33 से 20:58
भद्रा पूँछ - प्रातः 09:37 से 10:38
भद्रा मुख - 10:38 से 12:19
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 09 मार्च 2020 समय- 03:03 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 09 मार्च 2020 समय 23:17 बजे

आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाए।

04 February 2020

जया एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Jaya Ekadashi 2020

जया एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Jaya Ekadashi 2020 #EkadashiVrat

jaya ekadashi in hindi date
jaya ekadashi

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका पुण्यकारी व्रत करने से जातक को भूत-प्रेत या पिशाच जैसी योनियों में जाने का भय नहीं सताता हैं। इस परम पुण्यकारी एकादशी का नाम जया एकादशी हैं। यह व्रत माघ मास से शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के दिन किया जाता हैं। मान्यता हैं कि जया एकादशी के व्रत से जातक भूत, प्रेत, पिशाच तथा नकारात्मक ऊर्जा आदि से आजीवन मुक्त हो सकता हैं। अतः इस एकादशी के उपवास को पूर्ण विधि-विधान के अनुसार करना चाहिए। साथ ही, जया एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धापूर्वक रखने से जातक की माता का स्वास्थ्य अच्छा रहता हैं।
जया एकादशी व्रत के दिन भगवान श्री हरीविष्णु के अवतार श्रीकृष्ण जीकी विधिपूर्वक पूजा करने का विधान हैं। हिन्दू धर्मग्रंथो के अनुसार जया एकादशी के दिन व्रत करने से समस्त वेदों का ज्ञान, यज्ञों तथा विशेष अनुष्ठानों का पुण्य प्राप्त होता हैं। जया एकादशी व्रत के प्रभाव से जातक के समस्त पापों का नाश होता हैं तथा इस व्रत का पुण्य जातक को मरणोपरांत मोक्ष प्रदान करता हैं।

जया एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 04 फरवरी, मंगलवार की रात्रि 09 बजकर 48 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 05 फरवरी, बुधवार की रात्रि 09 बजकर 30 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2020 में जया एकादशी का व्रत 05 फरवरी, बुधवार के दिन किया जाएगा।
               
इस वर्ष, जया एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 06  फरवरी, गुरुवार की प्रातः 07 बजकर 08 मिनिट से 09 बजकर 21 मिनिट तक का रहेगा।

जया एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?

सनातन हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार जया एकादशी का व्रत सम्पूर्ण भारत-वर्ष में माघ मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। वहीं, अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत जनवरी या फरवरी के महीने में आता हैं।

Enter you Email