27 July 2019

कामिका एकादशी व्रत कथा | कामिका एकादशी व्रत विधि | Ekadashi Vrat Katha in Hindi | Kamika Ekadashi 2019

कामिका एकादशी व्रत कथा | कामिका एकादशी व्रत विधि | Kamika Ekadashi 2019 | Ekadashi Vrat Katha in Hindi

kamika ekadashi katha
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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसकी कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं। गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में कामिका एकादशी का व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण एकादशी के दिन किया जाता हैं। जिस व्यक्ति ने पापकर्म किया हैं, तथा उसे इसका भय उसे सताता हैं, ऐसे व्यक्ति को कामिका एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धाभाव तथा विधि-विधान से अवश्य करना चाहिए। कामिका एकादशीका व्रत भगवान विष्णु जी की अराधना एवं पूजा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर होता हैं। एकादशी के सभी व्रतों में कामिका एकादशी को सर्वोत्तम व्रत माना जाता हैं। धर्म-ग्रंथो के अनुसार, यह एकादशी उपासकों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित इच्छापूर्ती करने वाली मानी गई हैं। अतः कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती हैं तथा एकादशी का व्रत करने से व्रती को उनके समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

कामिका एकादशी व्रत का उद्देश्य

कामिका एकादशी की रात्रि को दीपदान तथा जागरण के फल का माहात्म्य चित्रगुप्त भी नहीं कह सकते। जो जातक इस एकादशी की रात्रि को भगवान के मंदिर में दीपक जलाते हैं उनके पितर स्वर्गलोक में अमृतपान करते हैं तथा जो घी या तेल का दीपक जलाते हैं, वे सौ करोड़ दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्य लोक को जाते हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं कि “हे नारद! ब्रह्महत्या तथा भ्रूण हत्या आदि पापों को नष्ट करने वाली इस कामिका एकादशी का व्रत मनुष्य को यत्न के साथ करना चाहिए। कामिका एकादशी के व्रत का माहात्म्य तथा कथा श्रद्धा-भाव से सुनने तथा पढ़ने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता हैं।

कामिका एकादशी व्रत का महत्त्व

कामिका एकादशीके व्रत को आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं, क्योंकि यह व्रत चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता हैं तथा मन एवं हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता हैं। कामिका एकादशी का व्रत करने से सबके बिगड़े कार्य शीघ्र पूर्ण हो जाते हैं। विशेष रूप से इस तिथि में विष्णु जी की पूजा-अर्चना करना अत्यंत लाभकारी माना गया हैं। कामिका एकादशी के व्रत में शंख, चक्र, तथा गदाधारी श्री हरी-विष्णु जी की पूजा की जाती हैं। जो मनुष्य इस एकाद्शी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णु जी कि पूजा करता हैं उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती हैं।
कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी कष्ट दूर होते हैं। उपासक को मोक्ष प्राप्ति होती हैं। इस दिन तीर्थस्थानों में स्नान करने तथा दान-पुण्य करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फलप्राप्ति होती हैं।
यह भी मान्यता हैं कि श्रावण के पवित्र मास में भगवान विष्णुजी की पूजा करने से, सभी देवता, गन्धर्वों तथा नागों एवं सूर्य देव आदि सब पूजित हो जाते हैं। श्री विष्णुजी को यदि संतुष्ट करना हो तो उनकी पूजा तुलसी पत्र से करें। ऐसा करने से ना केवल प्रभु प्रसन्न होंगे अपितु वरती के भी सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। कामिका एकादशी व्रत की कथा सुनना वाजपेय यज्ञ करने के समान ही माना गया हैं।
जो फल सूर्य व चंद्र ग्रहण पर पुष्कर तथा काशी में स्नान करने से तथा गोदावरी तथा गंगा नदी में स्नान से भी प्राप्त नहीं होता वह फल इस दिन भगवान विष्णु के पूजन से प्राप्त होता हैं।
पापरूपी कीचड़ में फँसे हुए तथा संसाररूपी समुद्र में डूबे मनुष्यों के लिए इस एकादशी का व्रत तथा भगवान विष्णु का पूजन अत्यंत आवश्यक मानी गई हैं। इस व्रत से बढ़कर पापों के नाश का कोई अन्य उपाय नहीं हैं।

कामिका एकादशी व्रत के नियम

कामिका एकादशी व्रत का नियम तीन दिन का होता हैं। अर्थात दशमी, एकादशी तथा द्वादशी के दिन कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता हैं। अतः इन तीन दिनों की अवधि तक जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज तथा मसुर की दाल का सेवन भी वर्जित हैं। मांस तथा मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए।
दशमी के दिन एक समय भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा सूर्यास्त के पश्चात कुछ भी नहीं खाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए तथा व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना चाहिए। एकादशी के दिन जागरण करना भी व्रत का ही नियम हैं। द्वादशी के दिन पूजा कर पंडित को यथाशक्ति दान देना चाहिए तथा उसके पश्चात पारण करना चाहिए।
साथ ही एकादशी के दिन दातुन नहीं करना चाहिए। अपनी उंगली से ही दांत साफ करें। क्योंकि एकादशी के दिन पेड़ पौधों को तोड़ते नहीं हैं। साथ ही इस दिन किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।

इस व्रत में क्या खाये

चावल व चावल से बनी किसी भी चीज के खाना पूर्णतः वर्जित होता हैं। व्रत के दूसरे दिन चावल से बनी हुई वस्तुओं का भोग भगवानजी को लगाकर ग्रहण करना चाहिए। व्रत के दिन नमक रहित फलाहार करें। फलाहार भी केवल दो समय ही कर सकते हैं। फलाहार में तुलसी दल का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए। व्रत में पीने वाले पानी में भी तुलसी दल का प्रयोग करना लाभकारी होता हैं।

कामिका एकादशी व्रत पूजन विधि

कामिका एकादशी व्रत के दिन व्यक्तिगत एवं घर की स्वच्छता का विशेष महत्व माना गया हैं। एकादशी तिथि पर व्रती प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर सर्वप्रथम संकल्प लें तथा श्री विष्णु के पूजन-क्रिया को प्रारंभ करें। इसके पश्चात पुज्य गणेश जी पूजा करें। क्योकि किसी भी पूजा में गौरी गणेश की पूजा पहले होती हैं। तत्पश्चात भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करायें। पंचामृत से स्नान कराने से पूर्व प्रतिमा को शुद्ध गंगाजल से स्नान करना चाहिए। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद तथा शक्कर का उपयोग होता हैं। भगवान जी को स्नान कराने के पश्चात भगवान को गंध, अच्छत इंद्र जौ का प्रयोग करे तथा पुष्प चढ़ायें। धूप, दीप, चंदन आदि सुगंधित पदार्थो से आरती उतारनी चाहिए। भगवान विष्णु जी की आरती के पश्चात, एकादशी माता जी की आरती अवश्य करें। प्रभु को फल-फूल-माला, तिल, दूध, पंचामृत, इत्र, मौसमी फल, मिष्ठान, धूप, दीप आदि नाना पदार्थ निवेदित करें। नैवेध्य का भोग लगाये। नैवेध्य मे भगवानजी को मक्खन, मिश्री तथा तुलसी-पत्र अवश्य ही चढ़ाएं तथा अन्त में श्रमा याचन करते हुए भगवान को नमस्कार करें। इस दिन कामिका एकादशी व्रत कथा अवश्य पढ़नी चाहिए एवं व्रत के दिन विष्णु सहस्त्र नाम पाठ का जप अवश्य करना चाहिए। इस दिन ब्राह्मण भोज एवं दान-दक्षिणा का विशेष महत्व होता हैं। अत: ब्राह्मण को भोज करवाकर दान-दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार विधिनुसार जो भी कामिका एकादशी का व्रत रखता हैं उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

कामिका एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

कामिका एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

महाभारतकाल में एक समय कुंतीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरजी ने श्री कृष्ण ने कहा, “हे भगवन, कृपा करके श्रावण कृष्ण एकादशी का नाम तथा महत्व का वर्णन करें तथा ईसकी कथा सुनाएं।” तब श्रीकृष्णजी ने कहा कि “हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की कथा एक समय स्वयं ब्रह्माजी भी देवर्षि नारद से कह चुके हैं, अतः मैं भी तुम्हें वही बताता हूं”। एकबार देवर्षि नारदजी ने ब्रह्माजी से श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की इच्छा जताई थी। उस एकादशी का नाम, विधि, कथा तथा माहात्म्य जानना चाहा।
तब ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! श्रावण मास की कृष्ण एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं"।
जिसकी कथा इस प्रकार हैं,
प्राचीन काल में एक गांव में एक ठाकुर जी थे। वे अत्यंत ही क्रोधित हुआ करते थे। क्रोधी ठाकुर की एक दिन किसी कारण वश एक ब्राहमण से हाथापाई हो गई तथा परिणाम स्वरूप उस ब्राहमणदेव की मृत्य हो गई। अपने हाथों मरे गये ब्राहमण की क्रिया उस ठाकुर ने करनी चाही। परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में उपस्थित होने से मना कर दिया। ब्राहमणों ने बताया कि तुम पर ब्रहम हत्या का दोष हैं। पहले प्रायश्चित कर इस पाप से मुक्त हो जावों, तब हम तुम्हारे घर आएंगे व भोजन तथा अन्य पूजन-क्रिया करेंगे।
ठाकुर जी ने एक एक विधवान मुनी से अपने पापों का निवारण करने का उपाय पूछा। इस पर मुनीजी ने उन्हें श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कमिका एकदशी का व्रत पूर्ण भक्तिभाव से करने के लिए कहा तथा एकादशी पूजन कर ब्राहमणों को भोजन कराके यथाशक्ति दश्रिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति प्राप्त होगी ऐसा बताया। मुनिजी के बताये हुए निवारण पर कमिका एकदशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा एवं भक्तिभाव से किया। एकादशी के रात्री ठाकुरजी ने भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, जिसमे भगवानजी ने ठाकुर को दर्शन देकर कहा कि तुम्हें ब्रहम-हत्या के पाप से मुक्ति प्राप्त हो गई हैं तथा तुम्हें क्षमा-दान दिया गया हैं।
इस प्रकार ठाकुर जी के बड़े से बड़े पाप-कर्म का नाश हो जाता हैं।

26 July 2019

कामिका एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamika Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

कामिका एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamika Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

kamikaa ekadasi shubh Muhurt 2019
kamikaa ekadasi shubh Muhurt 2019
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसकी कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं। गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में कामिका एकादशी का व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण एकादशी के दिन किया जाता हैं। इस एकादशी के पालक देवता भगवान विष्णु जी के अवतार “वामन देवता” को माना जाता हैं। जिस व्यक्ति ने कभी कोई पापकर्म किया हैं, तथा उसे इसका भय सताता हो, ऐसे व्यक्ति को कामिका एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धाभाव तथा विधि-विधान से अवश्य करना चाहिए। कामिका एकादशी का व्रत भगवान विष्णु जी की आराधना एवं पूजा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर होता हैं। ऐसा करने से, जातक पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की प्राप्ति करने में समर्थ हो पाता हैं। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होती हैं। एकादशी के प्रत्येक व्रतों में कामिका एकादशी को सर्वोत्तम व्रत माना जाता हैं। सुवर्ण, लालमणी मोती, दूर्वा आदि से पूजा होने पर भी भगवान श्री हरी उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के पश्चात हो जाते हैं। जो जातक तुलसी पत्र से श्री माधव की पूजा करता हैं। उसके प्रत्येक जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। कामिका एकादशी को श्री विष्णु का उत्तम व्रत कहा गया हैं, कहा जाता हैं कि इस एकादशी की कथा स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। साथ ही, इससे पूर्व वशिष्ठ मुनि जी ने इस व्रत की कथा राजा दिलीप को भी सुनायी थी, जिसे सुनकर उन्हें समस्त पापों से मुक्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। धर्म-ग्रंथों के अनुसार, यह एकादशी उपासकों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित इच्छापूर्ति करने वाली मानी गई हैं। इस एकादशी के व्रत को करने से पूर्वजन्म की बाधाएं भी दूर होती हैं। कामिका एकादशी भगवान विष्णु की आराधना तथा पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय होता हैं। अतः कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु का व्रत करने से व्रती को उनके समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त होती हैं। इस एकादशी के विषय में यह भी मान्यता हैं कि, जो साधक सावन के पवित्र मास में भगवान विष्णु जी की पूजा तथा व्रत करता हैं, उसके द्वारा गंधर्वों तथा समस्त नागों की भी पूजा हो जाती हैं। कामिका एकादशी के दिन “गौ दुग्ध” का सागार लेना चाहिए तथा इस दिन भगवान विष्णु के उपेन्द्र स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।

कामिका एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष, श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 27 जुलाई, शनिवार की साँय 07 बजकर 45 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 28 जुलाई रविवार की साँय 06 बजकर 49 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में कामिका एकादशी का व्रत 28 जुलाई, रविवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, कामिका एकादशी का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 29 जुलाई, सोमवार की प्रातः बजकर 05 बजकर 56 मिनिट से सायं 08 बजकर 24 मिनिट तक का रहेगा।
(द्वादशी समाप्त होने का समय - 17:10 Hrs)

21 July 2019

श्रावण मास 2019 | सावन कब से शुरू हैं | सावन का महीना कब हैं 2019 | श्रावण सोमवार व्रत कब से हैं 2019

श्रावण मास 2019 | सावन कब से शुरू हैं | सावन का महीना कब हैं 2019 | श्रावण सोमवार व्रत कब से हैं 2019

sawan mahina kab hoga
sawan mahina kab se shuru hoga
करपूर गौरम करूणावतारम, संसार सारम भुजगेन्द्र हारम ।
सदा वसंतम हृदयारविंदे, भवम भवानी सहितं नमामि ॥
जिनका शरीर कपूर के समान गोरा हैं, जो करुणा के अवतार हैं, जो शिव संसार के सार अर्थात मूल हैं। तथा जो महादेव सर्पराज को गले के हार के रूप में धारण करते हैं, ऐसे सदैव प्रसन्न रहने वाले भगवान शिव को मैं अपने हृदय कमल में शिव तथा पार्वती के साथ नमस्कार करता हूँ।

सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी-प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा आदि जैसे अनेक व्रत तथा उपवास किए जाते हैं। किन्तु चातुर्मास को व्रतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। चातुर्मास का समय 4 मास की अवधि में होता हैं, जो की आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात प्रबोधिनी एकादशी तक चलता हैं। चातुर्मास के चार मास इस प्रकार हैं:- श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक।
चातुर्मास के प्रथम मास को ही श्रावण मास कहा जाता हैं। श्रावण शब्द, श्रवण से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं सुनना, अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों के ज्ञान को ईश्वर से सुनकर ही ऋषियों ने समस्त प्राणियों को सुनाया था। सावन का महीना भक्तिभाव तथा सत्संग के लिए विशेष होता हैं। सावन के मास में विशेष रूप से भगवान शिव, माता पार्वती तथा श्री कृष्णजी की पूजा-अर्चना की जाती हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण सावन के मास को अत्यंत शुभ व फलदायक माना जाता हैं। अतः भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु समस्त भक्तगण श्रावण मास के दौरान विभिन्न प्रकार से व्रत तथा उपवास रखते हैं।
श्रावण मास के दौरान समस्त उत्तरी भारत के राज्यों में सोमवार का व्रत अत्यंत शुभ माना जाता हैं। कई भक्त सावन मास के प्रथम सोमवार के दिन से ही सोलह सोमवार उपवास का प्रारम्भ करते हैं। श्रावण मास में प्रत्येक मंगलवार भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती माँ को समर्पित होते हैं। श्रावण मास के दौरान मंगलवार का उपवास मंगल-गौरी व्रत के रूप में जाना जाता हैं।
वैसे तो प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की उपासना के लिये उपयुक्त माना जाता हैं किन्तु सावन के सोमवार का महत्व अधिक माना गया हैं। श्रावण के सोमवार व्रत की पूजा भी अन्य सोमवार व्रत के अनुसार की जाती हैं। इस व्रत में केवल एकाहार अर्थात एक समय भोजन ग्रहण करने का संकल्प लिया जाता हैं। भगवान भोलेनाथ तथा माता पार्वती जी की धूप, दीप, जल, पुष्प आदि से पूजा करने का विधान हैं। शिव पूजा के लिये सामग्री में उनकी प्रिय वस्तुएं भांग, धतूरा आदि भी रख सकते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को जल अवश्य अर्पित करना चाहिये। रात्रि में भूमि पर आसन बिछा कर शयन करना चाहिये। सावन के पहले सोमवार से आरंभ कर 9 या 16 सोमवार तक लगातार उपवास करना चाहिये तथा उसके पश्चात 9वें या 16वें सोमवार पर व्रत का उद्यापन अर्थात पारण किया जाता हैं। यदि लगातार 9 या 16 सोमवार तक उपवास करना संभव न हो तो आप केवल सावन के चार सोमवार इस व्रत को कर सकते हैं।

सावन के सोमवार का व्रत 2019

इस वर्ष, श्रावण सोमवार का व्रत कब से प्रारम्भ हैं तथा कब तक किया जाएगा?
भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में चंद्र पंचांग के आधार पर श्रावण मास के प्रारम्भ के समय में पंद्रह दिनों का अंतर आ जाता हैं। पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण मास अमांत पंचांग से पंद्रह दिन पहले प्रारम्भ हो जाता हैं। अमांत चंद्र पंचांग का प्रयोग गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में किया जाता हैं, वहीं पूर्णिमांत चंद्र पंचांग का उपयोग उत्तरी भारत के राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखंड में किया जाता हैं। साथ ही, नेपाल तथा उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में तो सावन के सोमवार को सौर पंचांग के अनुसार मनाया जाता हैं। अतः सावन सोमवार की आधी तारीखें दोनों पंचांग में भिन्न-भिन्न होती हैं।

सावन सोमवार व्रत 2019

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखण्ड के लिए सावन के सोमवार का व्रत

श्रावण मास प्रारम्भ
17 जुलाई 2019
बुधवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत
22 जुलाई 2019
सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत
29 जुलाई 2019
सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत
05 अगस्त 2019
सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत
12 अगस्त 2019
सोमवार

श्रावण मास की समाप्ति
15 अगस्त 2019
गुरुवार


सावन सोमवार व्रत 2019

गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के लिए सावन के सोमवार का व्रत

श्रावण मास प्रारम्भ
02 अगस्त 2019
शुक्रवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत
05 अगस्त 2019
सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत
12 अगस्त 2019
सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत
19 अगस्त 2019
सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत
26 अगस्त 2019
सोमवार

श्रावण मास की समाप्ति
30 अगस्त 2019
शुक्रवार

18 July 2019

आयकर रिटर्न (Returns) में गलत जानकारी दी तो मुकदमा दर्ज कर सकता हैं इनकम टैक्स (Tax) विभाग


आयकर रिटर्न (Returns) में गलत जानकारी दी तो मुकदमा दर्ज कर सकता हैं इनकम टैक्स (Tax) विभाग

income tax return
income tax return 2019-20
आयकर रिटर्न (Returns) में गलत जानकारियां देना करदाता को अब भारी पड़ सकता हैं। आयकर विभाग ने करदाताओं को चेतावनी दी हैं कि वे रिटर्न (Returns) फाइल करते समय गलत जानकारी न दें।

इनकम टैक्स (Tax) विभाग ने कहा हैं कि यदि कोई वेतन पाने वाला इम्पलॉई आयकर रिटर्न (Returns) में आय कम दिखाता हैं या डिडक्शन को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाता हैं तो उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के साथ-साथ उसके नियोक्ता को भी उसके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा जाएगा।

आईटीआर (ITR) की जांच-पड़ताल करने वाले बेंगलुरु स्थित आयकर विभाग के केंद्रीय प्रोसेसिंग सेंटर (CPC) ने करदाताओं को यह चेतावनी दी हैं।

CPC ने कहा हैं कि करदाता टैक्स (Tax) सलाहकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट की गलत सलाह में नहीं पड़ें। ऐसे कर सलाहकार गलत दावों के जरिये करदाताओं को टैक्स (Tax) में छूट का लालच देते हैं, जिससे लोग इनकम टैक्स (Tax) रिटर्न (Returns) में गलत जानकारी देते हैं।

विभाग ने कहा हैं कि ऐसी कई शिकायतें सामने आई हैं, जिनमें सलाहकारों के कहने पर आईटीआर (ITR) फाइल करने में करदाता ने गड़बड़ी की। आयकर कानून के तहत ऐसी गलतियों पर जुर्माना और सजा हो सकती हैं। इससे करदाता का रिकॉर्ड खराब होने पर टैक्स (Tax) रिफंड (Refund) में भी समस्या आ सकती हैं।

आयकर विभाग ने इस साल की शुरुआत में ही ऐसे एक रैकेट का भंडाफोड़ किया था, जिसमें कर सलाहकार और आईटी कंपनियों के कर्मियों की मिलीभगत से गलत रिटर्न (Returns) भरकर टैक्स (Tax) रिफंड (Refund) लिया जाता था। अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) इस मामले की जांच कर रही हैं।

गलत दावे को माना जाएगा कर चोरी

आयकर विभाग ने कहा कि इम्पलॉई कर सलाहकारों की गलत सलाह के आधार पर भ्रामक दावे न करें। इसे भी आयकर चोरी का मामला माना जाएगा। आयकर विभाग का कहना हैं कि उसके पास कर चोरी की पड़ताल करने के लिए स्वचालित सिस्टम हैं, जो आईटीआर (ITR) की प्रोसेसिंग के काम आता हैं। कोई भी व्यक्ति इसमें हेर-फेर नहीं कर सकता।

सतर्कता विभाग की जांच

आयकर विभाग ने कहा हैं कि सरकारी विभागों या सार्वजनिक उपक्रमों के इम्पलॉई के ऐसे गलत दावों की जानकारी संबंधित विजिलेंस को दी जाएगी।

16 July 2019

चन्द्र ग्रहण 2019 | खग्रास चन्द्र ग्रहण सूतक समय | चन्द्र ग्रहण कब लगेगा | Chandra Grahan 2019 | Lunar Eclipse

चन्द्र ग्रहण 2019 | खग्रास चन्द्र ग्रहण सूतक समय | चन्द्र ग्रहण कब लगेगा | Chandra Grahan 2019 | Lunar Eclipse

chandra grahan in india
chandra grahan july 2019 in india

ग्रहण के समय इस मंत्र का जाप करें

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै



सनातन हिन्दु धर्म के अनुसार चन्द्रग्रहण एक धार्मिक घटना हैं जिसका धार्मिक दृष्टिकोण से विशेष महत्व हैं। जो चन्द्रग्रहण खुली आँखों से स्पष्ट दृष्टिगत न हो तो उस चन्द्रग्रहण का धार्मिक महत्व नहीं होता हैं। केवल प्रच्छाया वाले चन्द्रग्रहण, जो कि नग्न आँखों से दृष्टिगत होते हैं, ऐसे चंद्रग्रहण धार्मिक कर्मकाण्ड हेतु विचारणीय होते हैं।
ज्योतिष तथा खगोलीय शास्त्र में किसी भी ग्रहण को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं। चंद्र ग्रहण पूर्णिमा के दिन तथा सूर्य ग्रहण अमावस्या के दिन होता हैं। ज्योतिष शास्त्रियों तथा पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ग्रहण तब होता हैं जब राहु तथा केतु सूर्य एवं चन्द्रमा का ग्रास करते हैं। स्कन्द पुराण के अवन्ति खंड के अनुसार उज्जैन राहु तथा केतु की जन्म भूमि हैं, अर्थात सूर्य तथा चन्द्रमा को ग्रसित करने वाले यह दोनों छाया ग्रह उज्जैन में ही जन्मे थे।
आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का विशेष पर्व मनाया जाता हैं। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई अर्थात मंगलवार के दिवस मनाई जाएगी। भारतीय संस्कृति में गुरु को देवता तुल्य माना गया हैं। वहीं, 16 जुलाई अर्थात मंगलवार की मध्यरात्रि को चंद्र ग्रहण रहेगा। अतः चंद्र ग्रहण के नौ घंटे पूर्व 16 जुलाई से ही सूतक प्रारम्भ होने के कारण साँय 4:30 बजे से मंदिरों के कपाट बंद हो जाएंगे। अतः गुरु पूर्णिमा का पर्व साँय 4:30 बजे से पूर्व मना लेना चाहिये।

कृपया ध्यान दें-
chandra grahan in india
chandra grahan
जब चन्द्र ग्रहण मध्यरात्रि अर्थात 12 बजे से पूर्व लग जाता हैं किन्तु मध्यरात्रि के पश्चात समाप्त होता हैं अर्थात जब चन्द्र ग्रहण अंग्रेजी कैलेण्डर में दो दिनों का अधिव्यापन करता हैं, तो जिस दिन चन्द्रग्रहण अधिकतम रहता हैं उस दिन की दिनांक चन्द्रग्रहण हेतु दर्शायी जाती हैं। ऐसी स्थिति में चन्द्रग्रहण की उपच्छाया तथा प्रच्छाया का स्पर्श पिछले दिवस अर्थात मध्यरात्रि से पूर्व हो सकता हैं।
चन्द्रग्रहण आपके नगर में दर्शनीय नहीं हो किन्तु दूसरे देशों अथवा शहरों में दर्शनीय हो तो कोई भी ग्रहण से सम्बन्धित कर्मकाण्ड नहीं किया जाता हैं। किन्तु यदि मौसम के कारण चन्द्रग्रहण दर्शनीय न हो तो ऐसी स्थिति में चन्द्रग्रहण के सूतक का अनुसरण किया जाता हैं तथा ग्रहण से सम्बन्धित सभी सावधानियों का पालन किया जाता हैं।

खग्रास चन्द्र ग्रहण विवरण
इस वर्ष 16 जुलाई 2019 के दिवस आषाढ़ पूर्णिमा का चन्द्र ग्रहण हैं।
जो कि सम्पूर्ण भारत में खग्रास के रूप में दिखाई देगा।
यह आंशिक चन्द्र ग्रहण अटलांटिक महासागर, अंटार्कटिका, हिन्द महासागर, प्रशान्त महासागर, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अमेरिका, एशिया तथा यूरोप के अधिकांश देश तथा उत्तरी अमेरिका के कुछ पूर्वी हिस्सों से दर्शनीय होगा।
यह आंशिक चन्द्र ग्रहण वर्ष 2019 में द्वितीय चन्द्र ग्रहण होगा।
यह 0.65 परिमाण का आंशिक ग्रहण हैं, अतः अधिकतम ग्रहण के दौरान चन्द्रमा का लगभग आधा भाग पृथ्वी की उपच्छाया से छिप जायेगा।
उपच्छाया के अन्दर चन्द्रमा का हिस्सा केवल पृथ्वी के वायुमण्डल के माध्यम से अपवर्तित सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित होगा।
आंशिक चन्द्र ग्रहण भारत, पाकिस्तान, नेपाल, मॉरीशस तथा सिंगापुर से दिखाई देगा।
अधिकांश उत्तरी अमेरिका तथा ग्रीनलैंड से कोई भी ग्रहण दिखाई नहीं देगा।


ग्रहण का स्थानीय सूतक, स्पर्श, मोक्ष आदि के समय इस प्रकार हैं

सूतक प्रारम्भ 16:32 दोपहर सभी हेतु
सूतक प्रारम्भ 20:32 रात्रि केवल बच्चों, गर्भवती स्त्री, अस्वस्थ तथा अशक्त व्यक्ति तथा वृद्धजनों हेतु
ग्रहण स्पर्श 01:32 मध्यरात्रि
परमग्रास ग्रहण मध्य 03:01 रात्रि
प्रच्छाया से अन्तिम स्पर्श 04:29
ग्रहण मोक्ष 04:30 रात्रि
उपच्छाया से प्रथम स्पर्श - 12:15 मध्यरात्रि
ग्रहणकाल की अवधि 2 घण्टे 58 मिनट
उपच्छाया की अवधि 05 घण्टे 33 मिनट
चन्द्र ग्रहण का परिमाण - 0.65
उपच्छाया चन्द्र ग्रहण का परिमाण 1.70
सूतक समाप्त - 04:30 सभी हेतु

यह चंद्रग्रहण प्रत्येक राशि के जातकों को इस प्रकार फल प्रदान करेगा।

मेष - मिश्र            वृष    - अशुभ
मिथुन - मिश्र        कर्क - शुभ
सिंह - मिश्र          कन्या - अशुभ
तुला - शुभ          वृश्चिक - मिश्र
धनु - अशुभ         मकर - अशुभ
कुंभ - शुभ           मीन - शुभ





13 July 2019

चातुर्मास 2019 | चातुर्मास व्रत के नियम | चातुर्मास व्रत विधि | Chaturmas Kya hai | Chaturmas ke Niyam

चातुर्मास 2019 | चातुर्मास व्रत के नियम | चातुर्मास व्रत विधि | Chaturmas Kya hai | Chaturmas ke Niyam

chaturmas me kya nahi khana chahiye
Chaturmas Kya hai 
पद्म पुराण के उत्तर खंड, स्कंद पुराण के ब्राह्म खंड एवं नागर खंड के उत्तरार्ध के अनुसार व्रत, भक्ति तथा शुभ कर्म करने के लिए विशेष चार मास को हिन्दू धर्म में 'चातुर्मास' कहा जाता हैं। एक हजार अश्वमेध यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता हैं, वही चातुर्मास व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता हैं। इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं। ध्यान तथा साधना करने वाले जातकों के लिए यह चार मास अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान शारीरिक तथा मानसिक स्थिति तो सही होती ही हैं, साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता हैं। चातुर्मास 4 मास की अवधि हैं, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात प्रबोधिनी तक चलता हैं।
हिंदी कैलंडर के अर्ध आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन एवं अर्ध कार्तिक मास ही चातुर मास कहलाते हैं। इन दिनों कोई शुभ कार्य, जैसे की विवाह संबंधी कार्य, मुंडन विधि, नाम करण आदि, करना अच्छा नहीं माना जाता, किन्तु इन दिनों धार्मिक अनुष्ठान बहुत अधिक किये जाते हैं, जैसे भागवत कथा, रामायण, सुंदरकांड पाठ, भजन संध्या एवं सत्य नारायण की पूजा आदि। इसके अलावा इस समय कई तरह के दानों का भी महत्व हैं, जिसे व्यक्ति अपनी श्रद्धा एवं हैसियत के हिसाब से करता हैं।
जिन दिनों में भगवान् विष्णुजी शयन करते हैं उन्हीं चार महीनों को चातुर्मास या चौमासा भी कहते हैं, देवशयनी एकादशी से हरिप्रबोधनी एकादशी तक चातुर्मास के इन चार महीनों की अवधि में विभिन्न धार्मिक कर्म करने पर मनुष्य को विशेष पुण्य लाभ की प्राप्ति होती हैं, क्योंकि इन दिनों में किसी भी जीव की ओर से किया गया कोई भी पुण्यकर्म व्यर्थ नहीं जाता। साथ ही, देवशयन के चातुर्मासीय व्रतों में पलंग पर सोना, स्त्री संघ करना, मिथ्या वचन कहना, मांस, शहद, मूली, बैंगन आदि का सेवन वर्जित माना जाता हैं।
वैसे तो चातुर्मास का व्रत देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ होता हैं, आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी के दिन उपवास करके जातक भक्तिपूर्वक चातुर्मास व्रत प्रारंभ कर सकता है, किन्तु जैन धर्म में चतुर्दशी से प्रारंभ माना जाता हैं, द्वादशी, पूर्णिमा से भी यह व्रत प्रारम्भ किया जा सकता हैं, भगवान् को पीले वस्त्रों से श्रृंगार करें तथा सफेद रंग की शय्या पर सफेद रंग के ही वस्त्र द्वारा ढक कर उन्हें शयन करायें।

चातुर्मास के नियम

चातुर्मास या चौमासा के कई नियम बताए गए हैं, जो प्रत्येक मनुष्य अपनी मान्यता, श्रद्धा तथा सामर्थ्य के अनुसार निभाते हैं।
1- चौमासा के दिनों में महिलायें सूर्योदय के पूर्व उठकर स्नान करती हैं, साथ ही श्रावण एवं कार्तिक के मास में नित्य मंदिर जा कर पूजा करती हैं। कार्तिक में कृष्ण जी एवं तुलसी जी की पूजा की जाती हैं।
2- कई जातक सम्पूर्ण चार मास तक उपवास या एक समय भोजन कर के रात्रि में फलाहार ग्रहण करते हैं।
3- चातुर्मास में कई जातक प्याज, लहसुन, बैंगन, मसूर जैसे भोज्य पदार्थ का अपने भोजन में उपयोग नहीं करते हैं।
4- देखा गया हैं की, कई जातक नव-दुर्गा के समय चप्पल भी नहीं पहन कर व्रत का पालन करते हैं।
5- श्रावण एवं नव दुर्गा के व्रत में कई पुरुष अपने बाल तथा दाढ़ी नहीं कटवाते हैं।
6- सम्पूर्ण चौमासा गीता पाठ, सुंदर कांड का पाठ, भजन तथा रामायण का पाठ प्रत्येक जातक अपनी-अपनी श्रद्धा तथा क्षमता के अनुसार करते हैं।
7- चातुर्मास के समय कई जातक दान पुण्य एवं धार्मिक स्थलों की यात्रा भी करते हैं।

चातुर्मास में श्री विष्णु भगवान् को क्या भोग लगायें?

१. अच्छी वाणी के लिए गुड व मिश्री का भोग लगायें।
२. दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए मुंफली तेल का भोग लगायें।
३.  अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए कड़वे तेल अर्थात सरसों के तेल का भोग लगाये।
४. सौभाग्य के लिए मीठे खाद्य तेल का भोग लगायें।
५. मृत्यु के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति के लिए पीले पुष्पों का भोग लगावे।
इसके अलावा, व्यक्ति को चातुर्मास के इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि एवं श्रद्धा के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग तथा ग्रहण करना चाहिए, जो की इस प्रकार हैं।

चातुर्मास में क्या ग्रहण करें?
१.  मनोवांछित वर प्राप्त करने के लिए बर्तन की जगह केले के पत्ते में भोजन करें।
२.  देह शुद्धि या सुंदरता के लिए निश्चित प्रमाण के पंचगव्य का ग्रहण करें।
३.  आत्म शुद्धि के लिए पंचमेवा का सेवन करें।
४.  वंश वृद्धि के लिए नियमित रूप से गाय के दूध का सेवन करें।
५.  सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या     सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।
६.  भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए दिन में केवल एक ही बार भोजन करें या उपवास रखें।

चातुर्मास में क्या त्याग करें?
१.  प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य न करें।
२. चारपाई पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस-मदिरा सेवन, शहद तथा दूसरे का      दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का त्याग करना चाहिए।
३. मधुर स्वर के लिए गुड़ व मिश्री का त्याग करें।
४. दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए मुंफली तेल का त्याग करें।
५.  शत्रु नाश आदि के लिए सरसों तेल का त्याग करें।
६.  सौभाग्य के लिए मीठे तेल का त्याग करें।
७.  स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगो का त्याग करें।
यह भी ध्यान दे - देवशयन के पश्चात चार महीनों तक योगी व तपस्वी कही भ्रमण नहीं करते तथा एक ही स्थान पर रहकर तप करते रहते हैं। इस समय में केवल ब्रज-नगर की यात्रा की जा सकती हैं। क्योंकि चातुर्मास के समय पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज-धाम में आकार निवास करते हैं।

पद्मपुराण के अनुसार जो मनुष्य इन चार महीनों में मंदिर में झाडू लगाते हैं तथा मंदिर को धोकर साफ करते हैं, कच्चे स्थान को गोबर से लीपते हैं, उन्हें सात जन्म तक ब्राह्मण योनि प्राप्त होती हैं, जो भगवान को दूध, दही, घी, शहद, तथा मिश्री से स्नान कराते हैं, वह संसार में वैभवशाली होकर स्वर्ग में जाकर इन्द्र के समान सुख भोगते हैं।
Chaturmas ke Niyam
Chaturmas
धूप, दीप, नैवेद्य तथा पुष्प आदि से पूजन करने वाला प्राणी अक्षय सुख भोगता हैं, तुलसीदल अथवा तुलसी मंजरियों से भगवान का पूजन करने, स्वर्ण की तुलसी ब्राह्मण को दान करने पर वैकुंठ लोक प्राप्त होता हैं, गूगल की धूप तथा दीप अर्पण करने वाला मनुष्य जन्म जन्मांतरों तक धनवान रहता हैं, पीपल का पेड़ लगाने, पीपल पर प्रति दिन जल चढ़ाने, पीपल की परिक्रमा करने, उत्तम ध्वनि वाला घंटा मंदिर में चढ़ाने, ब्राह्मणों का उचित सम्मान करने वाले व्यक्ति पर भगवान् श्री हरि विष्णु जी की विशेष कृपा दृष्टि सदा बनी रहती हैं।
किसी भी प्रकार का दान देने जैसे- कपिला गौ का दान, शहद से भरा चांदी का बर्तन तथा तांबे के पात्र में गुड़ भरकर दान करने, नमक, सत्तू, हल्दी, लाल वस्त्र, तिल, जूते, तथा छाता आदि का यथाशक्ति दान करने वाले मनुष्य को कभी भी किसी वस्तु की कमी जीवन में नहीं आती तथा वह सदा ही सर्व साधन सम्पन्न रहता हैं।
जो व्रत की समाप्ति अर्थात उद्यापन करने पर अन्न, वस्त्र तथा शय्या का दान करते हैं वह अक्षय सुख को प्राप्त करते हैं तथा सदा धनवान रहते हैं, वर्षा ऋतु में गोपीचंदन का दान करने वालों को सभी प्रकार के भोग एवं मोक्ष मिलते हैं, जो नियम से भगवान् श्री गणेशजी तथा सूर्य भगवान् का पूजन करते हैं वह उत्तम गति को प्राप्त करते हैं, तथा जो शक्कर का दान करते हैं उन्हें यशस्वी संतान की प्राप्ति होती हैं।
माता लक्ष्मी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के लिए चांदी के पात्र में हल्दी भर कर दान करनी चाहिये तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बैल का दान करना श्रेयस्कर हैं, चातुर्मास में फलों का दान करने से नंदन वन का सुख मिलता हैं, जो लोग नियम से एक समय भोजन करते हैं, भूखों को भोजन खिलाते हैं, स्वयं भी नियमबद्ध होकर चावल अथवा जौ का भोजन करते हैं, भूमि पर शयन करते हैं उन्हें अक्षय कीर्ति प्राप्त होती हैं।
इन दिनों में आंवले से युक्त जल से स्नान करना तथा मौन रहकर भोजन करना श्रेयस्कर हैं, श्रावण अर्थात सावन के मास में साग एवम् हरि सब्जियां, भादों में दही, आश्विन में दूध तथा कार्तिक में दालें खाना वर्जित हैं, किसी की निंदा चुगली न करें तथा न ही किसी से धोखे से उसका कुछ हथियाना चाहिये, चातुर्मास में शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिये तथा कांसे के बर्तन में कभी भोजन नहीं करना चाहिये।
जो अपनी इन्द्रियों का दमन करता हैं वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता हैं, शास्त्रानुसार चातुर्मास एवं चौमासे के दिनों में देवकार्य अधिक होते हैं जबकि विवाह आदि उत्सव नहीं किये जाते, इन दिनों में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा दिवस तो मनाए जाते हैं किन्तु नवमूर्ति प्राण प्रतिष्ठा व नवनिर्माण कार्य नहीं किये जाते, जबकि धार्मिक अनुष्ठान, श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ, श्री रामायण  तथा श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, हवन यज्ञ आदि कार्य अधिक होते हैं।
गायत्री मंत्र के पुरश्चरण व सभी व्रत सावन मास में सम्पन्न किए जाते हैं, सावन के मास में मंदिरों में कीर्तन, भजन, जागरण आदि कार्यक्रम अधिक होते हैं, स्कन्दपुराण के अनुसार संसार में मनुष्य जन्म तथा विष्णु भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं, किन्तु चार्तुमास में भगवान विष्णु का व्रत करने वाला मनुष्य ही उत्तम एवं श्रेष्ठ माना गया हैं।
चौमासे के इन चार मासों में सभी तीर्थ, दान, पुण्य, तथा देव स्थान भगवान् विष्णु जी की शरण लेकर स्थित होते हैं तथा चातुर्मास में भगवान विष्णु को नियम से प्रणाम करने वाले का जीवन भी शुभ फलदायक बन जाता हैं, भाई-बहनों! चौमासे के इन चार महीनों में नियम से रहते हुये, शुभ कार्य करते हुये, भगवान् श्री हरि विष्णुजी की भक्ति से जन्म जन्मांतरों के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करें।

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