17 June 2019

योगिनी एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Yogini Ekadashi 2019

योगिनी एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Yogini Ekadashi 2019

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        वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती है अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जिसमें व्रत रखने से समस्त पाप-कर्मो नाश हो जाता हैं साथ ही यह एकादशी व्रत भूलोक पर परम-सुख तथा परलोक सिधारने पर मोक्ष प्रदान करता है। यह एकादशी व्रत, निर्जला एकादशी के पश्चात तथा देवशयनी एकादशी से पहले आता है जिसे योगिनी एकादशी कहते हैं। योगिनी एकादशी व्रत तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के समकक्ष फल प्रदान करता है। किसी भी श्राप से मुक्ति प्राप्त करने हेतु यह व्रत कल्प-वृक्ष के समान है। योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से प्रत्येक प्रकार के चर्म रोगों की मुक्ति प्राप्त होती है। उत्तरी भारत के पञ्चाङ्ग के अनुसार आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तथा गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिणी भारत के पञ्चाङ्ग के अनुसार ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी योगिनी एकादशी कहलाती है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में होता है।


योगिनी एकादशी व्रत का पारण

        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

ध्यान रहे,
१. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।        
२. यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही होता है।
३. द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
४. एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५. व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।
६. व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७. जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।
८. यदि, कुछ कारणों की वजह से जातक प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 28 जून, प्रातः 06 बजकर 36 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 29 जून प्रातः 06 बजकर 45 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में योगिनी एकादशी का व्रत 29 जून, शनिवार के दिन किया जाएगा। 

इस वर्ष 2019 में, योगिनी एकादशी पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 30 जून रविवार के दिन, प्रातः 05 बजकर 44 से 06 बजकर 14 मिनिट तक रहेगा।

16 June 2019

वट पूर्णिमा व्रत | वट पौर्णिमा पूजा मुहूर्त | Vat Purnima 2019 | वट पूर्णिमा पूजा टाइम | Vat Pornima

वट पूर्णिमा व्रत | वट पौर्णिमा पूजा मुहूर्त | Vat Purnima 2019 | वट पूर्णिमा पूजा टाइम | Vat Pornima


Vat Purnima vrat

सनातन हिन्दू धर्म में प्रत्येक मास की पूर्णिमा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। किन्तु, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा अन्य सभी पूर्णिमा में अति पावन मानी जाती हैं। भारत के कुछ क्षेत्रों में ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत के रूप में भी मनाया जाता हैं। यह व्रत, वट सावित्री व्रत के समान ही किया जाता हैं। स्कंद पुराण एवं भविष्योत्तर पुराण के अनुसार तो वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को रखा जाता हैं। गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत में विशेष रूप से महिलाएं ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट सावित्री व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में यह ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा का स्नान-दान आदि के लिये अत्यंत महत्व हैं तथा यह पूर्णिमा भगवान भोलेनाथ के लिए भी जानी जाती हैं। भगवान शंकर के भक्त, अमरनाथ की यात्रा के लिये गंगाजल लेकर, इसी शुभ दिवस पर अपनी यात्रा का प्रारम्भ करते हैं। मान्यता हैं कि इस दिन गंगा स्नान के पश्चात पूजा-अर्चना कर, दान दक्षिणा देने से समस्त मनोकामनाएं शीघ्र पूरी हो जाती हैं।
ज्येष्ठ पूर्णिमा को वट पूर्णिमा व्रत के रूप में मनाया जाता हैं अतः वट सावित्री व्रत पूजा विधि के अनुसार ही वट पूर्णिमा का व्रत किया जाता हैं। इस दिन वट वृक्ष की पूजा करने का विधान हैं। वट की पूजा के पश्चात कथा अवश्य सुने या पढे।

ज्येष्ठ पूर्णिमा (वट पूर्णिमा व्रत) पूजा मुहूर्त 2019

इस वर्ष, ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि 16 जून, रविवार की दोपहर 02 बजकर 01 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 17 जून सोमवार की दोपहर 02 बजे तक व्याप्त रहेगी।
        अतः ज्येष्ठ पूर्णिमा व वट पूर्णिमा उपवास 16 जून, रविवार के दिन रखा जायेगा।
        वट पूर्णिमा पूजन करने का शुभ मुहूर्त मध्याह्नपूर्व 09:06 से 10:46 तथा गोधूलि बेला में 14:08 से 15:48 तक का रहेगा।

पूर्णिमा तिथि यदि चतुर्दशी के दिन दोपहर से पहले व सूर्योदय के पश्चात आरंभ हो रही हो तो पूर्णिमा उपवास इसी तिथि को रखा जाता हैं, जबकि पूर्णिमा तिथि अगले दिन अर्थात सूर्योदय के समय जो तिथि हो वही ग्रहण की जाती हैं।

12 June 2019

निर्जला एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

निर्जला एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

nirjala ekadashi kab hai
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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत रखकर संपूर्ण वर्ष की सभी एकादशियों जितना पुण्य कमाया जा सकता हैं। अतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता हैं। निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी तथा भीमसेनी एकादशी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं। पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से जहां व्रती की प्रत्येक मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं वहीं अनेकानेक रोगों से निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में वृद्धि होती हैं। जो श्रद्धालु वर्ष की प्रत्येक चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं हैं, उन्हें केवल एक निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से अन्य प्रत्येक एकादशियों का लाभ स्वतः ही प्राप्त हो जाता हैं। मान्यता यह भी हैं कि इस दिन व्रत रखने, पूजा तथा दान करने से जातक जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता हैं। निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के शुभ दिवस किया जाता हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में आता हैं। यह व्रत प्रत्येक पापों का नाश करने वाला तथा मन में जल संरक्षण की भावना को उजागर करता हैं।

निर्जला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 12 जून, बुधवार की साँय 06 बजकर 27 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 13 जून, गुरुवार की साँय 04 बजकर 49 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में निर्जला एकादशी का व्रत 13 जून, गुरुवार के शुभ दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, निर्जला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 14 जून, शुक्रवार की प्रातः 05 बजकर 47 मिनिट से 08 बजकर 25 मिनिट तक का रहेगा।

31 May 2019

श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजन सामग्री | Satya Narayan Pujan Samagri List Hindi

श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजन सामग्री | Satya Narayan Pujan Samagri List Hindi

Satya Narayan Pujan Samagri List Hindi
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा पूजन सामग्री

                                - पंडित विनोद पांडे http://www.vkjpandey.in

1)               भगवान जी प्रतिमा या तस्वीर
2)               लकड़ी की चौकी - 1
3)               केले के पत्ते
4)               मिट्टी या तांबे का कलश व ढक्कन - 01
5)               श्री फल/नारियल - 1 साबुत व 1 छिला हुआ
6)               तुलसी-पत्र  
7)               लोटा - 02
8)               चम्मच - 03
9)               कटोरी - 05
10)         थाली - 03 बड़ी
11)         सुपारी - 02 बड़ी व 05 छोटी
12)         लौंग व इलायची - 10 ग्राम
13)         पान के पत्ते - 07 कपूरी
14)         रोली - 50 ग्राम
15)         मोली - 1 गोली
16)         जनेऊ - 02
17)         कच्चा दूध - 250 ग्राम
18)         दही - 150 ग्राम
19)         देशी घी - 500 ग्राम
20)         शहद - 50 ग्राम
21)         शक्कर/खांड - 250 ग्राम
22)         गुड- 100 ग्राम
23)         साबुत चावल - 3 कटोरी
24)         मिठाई/प्रसाद - श्रद्धा अनुसार
25)         पंच मेवा (गरी/नारियल), चिरौंजी, बादाम, छुहारा और किशमिश का मिश्रण) - 100 ग्राम
26)         ऋतु फल - श्रद्धा अनुसार
27)         फूल/फूल माला - एक माला
28)         धूप/अगरबत्ती -1 पैकेट
29)         जौ - 500 ग्राम
30)         काले तिल -100 ग्राम
31)         हल्दी - 50 ग्राम
32)         हल्दी की गांठ - 01 गांठ
33)         लाल चन्दन - 10 रू
34)         मिट्टी/तांबे का बड़ा दीया - 02
35)         मिट्टी के छोटे दीये - 02
36)         रूई/बाती (साबुत) - 1 पैकेट छोटा
37)         पीला/लाल कपड़ा - सवा मीटर
38)         सफ़ेद कपड़ा- सवा मीटर
39)         कपूर - 20 टिक्की
40)         साबुत उडद की दाल - 250 ग्राम
41)         गंगाजल- 250 मिली
42)         इत्र- छोटी सीसी
43)         दूर्वा/दुप- थोड़ा सा
44)         आम के पत्ते - 11 पत्ते
45)         आम की लकडियां - 1.25 किलो
46)         हवन कुंड- 01
47)         हवन सामग्री - 1 छोटा पेक
नोट -  शक्कर गुड वाली होनी चाहिए। चावल टूटे हुए न हो। पंच मेवा में बादाम, छुहारे, किशमिश, मखाने, काजू पांच होने चाहिए। पंच मिठाई में बुन्दी के लड्डू, बर्फी, बेसन के लड्डू या बर्फी, मिल्क केक, कलाकन्द, नारियल की बर्फी या कोई भी सुखी मिठाई लेनी है। ऋतु फल मौसम के कोई भी पांच फल लेने है। जिसमें केला, अनार लेना जरूरी है। तीन फल कुछ भी मौसम वाले फल ले सकते है। सूखा बेल फल बिल्व पत्री वाले फल को कहते है। भगवती श्रृंगार में अपने हाथ की चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मेहंदी, हार, माला, कंघा, दर्पण, सैंट, जो आप उपयोग में स्वयं के लिए लाते है। भगवती की साड़ी काले, नीले रंग की ना हो। सुनार से चांदी की देवी की मूर्ति में सोने की बिंदी मस्तक में लगवा दे। पूजन कोई भी हो लकडी की चौकी जरूर होनी चाहिए। अगर आप स्वयं भी पूजन कर रहे हो या करवा रहे हो। कुण्डली लगा के बैठे हुए 9 नाग (सर्प) होने चाहिए। आटे का घी में चूर्ण (कषार, महाभोग) सूखा प्रसाद बनाना है।
                         - पंडित विनोद पांडे http://www.vkjpandey.in
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29 May 2019

अपरा एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Achala Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

अपरा एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Achala Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

Achala Ekadashi
अपरा एकादशी


वैदिक विधान कहता हैं की
, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसके व्रत को करने से जातक को अपार धन-संपदा तथा प्रसिद्धि प्राप्त होती हैं। अतः ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अपरा या अचला एकादशी कहा जाता हैं। अपरा एकादशी के प्रभाव से पाप कर्मों से छुटकारा प्राप्त होता हैं तथा इस दिन व्रत करने से कीर्ति, पुण्य एवं धन में अभिवृद्धि होती हैं। यह व्रत उत्तम पुण्यों को प्रदान करने वाला तथा समस्त प्रकार के पापों को नष्ट करने वाला माना गया हैं। समस्त एकादशियों में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे निर्जला एकादशी कहते हैं, वह सर्वोत्तम मानी जाती हैं, किन्तु ज्येष्ठ मास की ही कृष्ण पक्ष की एकादशी अर्थात अपरा एकादशी या अचला एकादशी भी प्रत्येक मनुष्यों को ब्रह्म हत्या, परनिंदा तथा भूत-प्रेत योनि आदि जैसे अनेक पाप-कर्मों से मुक्ति प्रदान करने में सहायक मानी जाती हैं। अपरा एकादशी व्रत के प्रभाव से व्रती को अपार खुशियों की प्राप्ति हैं। अपरा एकादशी का एक अर्थ यह भी हैं की, इस एकादशी के व्रत का पुण्य भी अपार हैं। अपरा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती हैं। इस दिन कच्चे आम अर्थात कैरी का सागार लेना चाहिए।

अपरा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 29 मई, बुधवार की दोपहर 03 बजकर 21 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 30 मई, गुरुवार की साँय 04 बजकर 37 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में अपरा एकादशी का व्रत 30 मई, गुरुवार के शुभ दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, अपरा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 31 मई, शुक्रवार की प्रातः 05 बजकर 44 मिनिट से 08 बजकर 22 मिनिट तक का रहेगा।

10 May 2019

स्कंद षष्ठी व्रत | कन्द षष्ठी व्रतम | स्कन्द षष्ठी 2019 | Skanda Shashti Vrat 2019 | Skanda Sashti Fast | Sri Kandha Sashti vratam

स्कंद षष्ठी व्रत | कन्द षष्ठी व्रतम | स्कन्द षष्ठी 2019

sri kandha shashti kavasam
skanda shashti vrat 
भगवान कार्तिकेय को स्कन्द देव के नाम से भी जाना जाता हैं जिनको हिन्दू देवताओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। स्कन्द देव भगवान शिव तथा माँ पार्वती के पुत्र तथा भगवान श्री गणेश के बड़े भाई हैं। भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय तथा सुब्रहमन्य के नाम से जाना जाता हैं।
प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान स्कन्द के लिए उपवास रखा जाता हैं तथा पूजा अर्चना की जाती हैं। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन उपवास रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं। स्कन्द षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को विशेष रूप से किया जाता हैं। 'तिथितत्त्व' ने चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को 'स्कन्द षष्ठी' के लिए विशेष कहा हैं। साथ मे कुछ लोग आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी श्रद्धा-पूर्वक मानते हैं। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति तथा संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया हैं। अतः यह व्रत 'संतान षष्ठी' नाम से भी जाना जाता हैं। एक दिन पूर्व से उपवास करके षष्ठी को 'कुमार' अर्थात् “कार्तिकेय” भगवान की पूजा करनी चाहिए। तमिल एवम तेलुगु हिन्दुओं मे स्कन्द एक प्रसिद्ध देवता हैं। अतः बहरत के दक्षिणी राज्यो में स्कन्दषष्ठी महत्त्वपूर्ण हैं।
षष्ठी तिथि जिस दिन पंचमी तिथि के साथ मिल जाती हैं उस दिन स्कन्द षष्ठी का व्रत करना शुभ होता हैं। इसलिए स्कन्द षष्ठी का व्रत पंचमी तिथि के दिन भी रखा जाता हैं। अन्य क्षेत्रों की तुलना में दक्षिण भारत में स्कन्द षष्ठी को बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता हैं। इस दिन लोग भगवान् कार्तिकेय के लिए उपवास रखते हैं, उनकी पूजा करते हैं तथा आशीर्वाद मांगते हैं। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं। यहाँ हम स्कन्द षष्ठी 2019 की तिथियां दे रहे हैं। जिनकी मदद से आप जान पाएंगे की किस महीने की स्कन्द षष्ठी कौन से दिन पड़ रही हैं।
स्कन्द देव भगवान शिव तथा देवी पार्वती के पुत्र तथा भगवान गणेश के छोटे भाई हैं। भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय तथा सुब्रहमन्य के नाम से भी जाना जाता हैं।
षष्ठी तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित हैं। शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन श्रद्धालु लोग उपवास करते हैं। षष्ठी तिथि जिस दिन पञ्चमी तिथि के साथ मिल जाती हैं उस दिन स्कन्द षष्ठी के व्रत को करने के लिए प्राथमिकता दी गयी हैं। इसीलिए स्कन्द षष्ठी का व्रत पञ्चमी तिथि के दिन भी हो सकता हैं।

स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं।
सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य में जब पञ्चमी तिथि समाप्त होती हैं या षष्ठी तिथि प्रारम्भ होती हैं तब यह दोनों तिथि आपस में संयुक्त हो जाती हैं तथा इस दिन को स्कन्द षष्ठी व्रत के लिए चुना जाता हैं। इस नियम का धरमसिन्धु तथा निर्णयसिन्धु में उल्लेख किया गया हैं। तिरुचेन्दुर में प्रसिद्ध श्री सुब्रहमन्य स्वामी देवस्थानम सहित तमिल नाडु में कई मुरुगन मन्दिर इसी नियम का अनुसरण करते हैं। अगर एक दिन पूर्व षष्ठी तिथि पञ्चमी तिथि के साथ संयुक्त हो जाती हैं तो सूरसम्हाराम का दिन षष्ठी तिथि से एक दिन पहले देखा जाता हैं।
हालाँकि सभी षष्ठी तिथि भगवान मुरुगन को समर्पित हैं किन्तु कार्तिक चन्द्र मास (ऐप्पासी या कार्तिकाई सौर माह) के दौरान शुक्ल पक्ष की षष्ठी सबसे मुख्य होती हैं। श्रद्धालु इस दौरान छः दिन का उपवास करते हैं जो सूरसम्हाराम तक चलता हैं। सूरसम्हाराम के बाद अगला दिन तिरु कल्याणम के नाम से जाना जाता हैं।
सूरसम्हाराम के बाद आने वाली अगली स्कन्द षष्ठी को सुब्रहमन्य षष्ठी के नाम से जाना जाता हैं जिसे कुक्के सुब्रहमन्य षष्ठी भी कहते हैं तथा यह मार्गशीर्ष चन्द्र मास के दौरान पड़ती हैं।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष तथा कार्तिक मास कृष्णपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-षष्ठी के नाम से किया जाता हैं। पुराणों के अनुसार षष्ठी तिथि को कार्तिकेय भगवान का जन्म हुआ था इसलिए इस दिन स्कन्द भगवान की पूजा का विशेष महत्व हैं, पंचमी से युक्त षष्ठी तिथि को व्रत के श्रेष्ठ माना गया हैं व्रती को पंचमी से ही उपवास करना आरंभ करना चाहिए तथा षष्ठी को भी उपवास रखते हुए स्कन्द भगवान की पूजा का विधान हैं।
इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता स्वयं परिलक्षित होती हैं। इस कारण यह व्रत श्रद्धाभाव से मनाया जाने वाले पर्व का रूप धारण करता हैं। स्कंद षष्ठी के संबंध में मान्यता हैं कि राजा शर्याति तथा भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक जुड़ा हैं कहते हैं कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया हैं कि स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता हैं। स्कन्द षष्ठी पूजा की पौरांणिक परम्परा जुड़ी हैं, भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी इनके छह मुख हैं तथा उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। पुराण व उपनिषद में इनकी महिमा का उल्लेख मिलता हैं।

स्कन्दा षष्ठी तथा कंद षष्टी 2019 त्यौहार का इतिहास

स्कन्दा षष्ठी यह त्यौहार  दक्षिण भारत में महत्वपूर्णतौर पर तमिल में मनाया जाता हैं। अधिकांश अन्य हिंदू त्योहारों की तरह स्कंद षष्ठी भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक हैं। स्कंद जिन्हें हम  भगवान मुरूगन, सुब्रमण्य तथा कार्तिकेय के रूप में जानते हैं। स्कन्द पुराण में स्कन्द षष्टि का उपवास का महत्व मिलता हैं।

स्कन्दा षष्ठी त्यौहार इतिहास

स्कन्द पुराण सभी अठारह पुराणों की भांति ही विशाल हैं जिसमे तारकासुर, सुरपद्मा, सिम्हामुखा ने देवताओं को हराया तथा उन्हें पृथ्वी पर लाकर खड़ा कर दिया। उन राक्षसों ने पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। उन्हें देवताओं तथा मनुष्यों को प्रताड़ित करने उत्साह मिलता था, उन्होंने सब कुछ नष्ट कर दिया, जो भी देवताओं का था, जो भी उन्हें पूजता था, उन्होंने उन्हें भी नष्ट कर दिया। उन्ही राक्षसों में से एक सुरपद्मा को वरदान प्राप्त था, कि उसे भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता हैं। तथा उस समय देवी सती के अग्नि को प्राप्त हो जाने के कारण भगवान शिव नाराज थे तथा घोर तप में लीन थे, यही कारण था कि वे सभी राक्षसों को किसी का भय नहीं था।
राक्षसों के आतंक से परेशान होकर देवता ब्रह्मा जी के पास गए तथा इस विपदा के लिये सहायता की मांग की। तब ब्रह्मा जी ने काम देव से कहा, कि तुम्हे भगवान शिव को योग निंद्रा से जगाना होगा। इस कार्य में अत्यंत संकट था, क्यूंकि भगवान शिव के क्रोध से बच पाना मुश्किल था। किन्तु संकट अत्यंत बड़ा था, इसलिए काम देव ने इस कार्य को किया। जिसमे वे सफल हुये, किन्तु भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुल जाने के कारण, उनकी क्रोधाग्नि से काम देव को भस्म कर दिया।
उस समय भगवान शिव का अंश छह भागों में बंट गया, जो कि गंगा नदी में गिरा। देवी गंगा ने उन छह अंशों को जंगल में रखा तथा उनसे छह पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें कई वर्षों बाद देवी पार्वती ने एक कर भगवान मुरुगन को बनाया। पुराण के अनुसार भगवान मुरुगन स्वामी के कई रूप हैं, जिनमे एक चेहरा दो हाथ, एक चेहरा चार हाथ,छह चेहरे तथा बारह हाथ हैं।
दूसरी तरह राक्षसों का आतंक बढ़ता जा रहा था। उन्होंने कई देवताओं को बंदी बना लिया था। उनके इसी आतंक के कारण भगवान ने इनके संहार का निर्णय लिया। कई दिनों तक यह युद्ध चलता रहा। तथा अंतिम दिन भगवान मुरुगन ने सुरपद्मा राक्षस का वध कर दिया, साथ ही संसार का तथा देवताओं का उद्धार किया। तथा राक्षसों के आतंक से सभी को मुक्त कराया।
यह दिन था स्कंदा षष्टि जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक माना जाता हैं तथा उत्साह से मनाया जाता हैं आज भी इसे बड़ी श्रद्धा से दक्षिण भारत में मनाया जाता हैं।
भगवान मुरुगन को कई नामों से जाना जाता हैं जैसे कार्तिकेय, मुरुगन स्वामी उन्ही में से एक हैं स्कन्द। इसलिए इस दिवस को सक्न्दा षष्ठी के नाम से जाना जाता हैं।

स्कंदा षष्टि 2019 में कब मनाया जाता हैं?

यह त्यौहार तमिल एवम तेलुगु लोगो द्वारा मनाया जाता हैं। यह प्रति मास मनाया जाता हैं जब शुक्ल पक्ष की पंचमी तथा षष्ठी एक साथ आती हैं तब स्कन्दा षष्ठी या कंद षष्टी मनाई जाती हैं।
जब पंचमी तिथी खत्म होकर षष्ठी तिथी शुरू होती हैं, तब सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य यह स्कन्दा तिथी की शुरुवात होती हैं। यह नियम धर्मसिंधु तथा निर्णयसिंधु से लिया गया हैं। इसे तमिल एवम तेलुगु प्रान्त में भगवान मुरुगन के मंदिर में मनाया जाता हैं। इसमें श्रद्धालु उपवास रखते हैं।
यह त्यौहार तमिल कैलेंडर के अनुसार ऐप्पसी मास में मनाया जाता हैं, यह त्यौहार छः दिनों तक मनाया जाता हैं इनमे कई नियमों का पालन किया जाता हैं।

स्कंद षष्ठी महत्व

स्कंद शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया मयूरा पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती हैं, यहां पर यह मुरुगन नाम से विख्यात हैं। प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न  होते हैं।  स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल हैं।
स्कंद भगवान हिंदु धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं, स्कंद को कार्तिकेय तथा मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता हैं। दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव पार्वती के पुत्र हैं, कार्तिकेय भगवान  के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों तथा विशेषकर तमिलनाडु में होती हैं। भगवान स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

कैसे मनाते हैं स्कन्दा षष्ठी? स्कंद षष्ठी पूजन
स्कंद षष्ठी इस अवसर पर शंकर-पार्वती को पूजा जाता हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती हैं।इसमें स्कंद देव स्थापना करके पूजा की जाती हैं तथा अखंड दीपक जलाए जाते हैं। भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी महात्म्य का नित्य पाठ किया करते हैं। भगवान को स्नान, पूजा, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं।  इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती हैं। इस में साधक तंत्र साधना भी करते हैं, इस में मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए तथा ब्रह्मचार्य का संयम रखना आवश्यक होता हैं।

1      इन दिनों मांसाहार का सेवन नही किया जाता
2      कई लोग प्याज, लहसन का प्रयोग नहीं करते
3      जो भी श्रद्धालु यह उपवास करते हैं वो मुरुगन का पाठ, कांता षष्ठी कवसम एवम सुब्रमणियम भुजंगम का पाठ करते हैं
4      कई लोग सुबह से स्कन्दा मंदिर जाते हैं
5      कई लोग स्कन्दा उपवास के दिनों में एक वक्त का उपवास भी करते हैं जिनमे कई दोपहर में भोजन करते हैं एवम कई रात्रि में
6      कई श्रद्धालु पुरे छः दिनों में फलाहार करते हैं
यह उपवास कई तरह से किया जाता हैं कई लोग इसे शरीर के शुद्धिकरण के रूप में भी करते हैं जिससे शरीर के सभी टोक्सिन शरीर से बाहर निकल जाते हैं। कई लोग नारियल पानी पीकर भी छः दिनों तक रहते हैं।
व्रत एक नियंत्रण के रूप में भी किया जाता हैं जिसमे मनुष्य स्वयं को कई व्यसनों से दूर रखता हैं। झूठ बोलने, लड़ने- झगड़ने का परहेज रखता हैं तथा ध्यान करके अपने आपको मजबूत बनाते हैं।
अगर श्रद्दालु को किसी भी तरह की बीमारी हैं तो उसे कभी उपवास नहीं करना चाहिए क्यूंकि ईश्वर कभी अपने बच्चो को कष्ट में नहीं देखना चाहता।

स्कंद कथा
कार्तिकेय की जन्म कथा के विषय में पुराणों में ज्ञात होता हैं कि जब दैत्यों का अत्याचार तथा आतंक फैल जाता हैं तथा देवताओं को पराजय का समाना करना पड़ता हैं जिस कारण सभी देवता भगवान ब्रह्मा जी के पास पहुंचते हैं तथा अपनी रक्षार्थ उनसे प्रार्थना करते हैं ब्रह्मा उनके दुख का जानकर उनसे कहते हैं कि तारक का अंत भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव हैं परंतु सती के अंत के पश्चात भगवान शिव गहन साधना में लीन हुए रहते हैं।
इंद्र तथा अन्य देव भगवान शिव के पास जाते हैं, तब भगवान शिव उनकी पुकार सुनकर पार्वती से विवाह करते हैं। शुभ घड़ी तथा शुभ मुहूर्त में शिव जी तथा पार्वती का विवाह हो जाता हैं। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता हैं तथा कार्तिकेय तारकासुर का वध करके देवों को उनका स्थान प्रदान करते हैं।

भगवान मुरुगन के प्रसिद्ध मन्दिर
निम्नलिखित छः आवास जिसे आरुपदै विदु के नाम से जाना जाता हैं, इण्डिया के तमिल नाडु प्रदेश में भगवान मुरुगन के भक्तों के लिए अत्यंत ही मुख्य तीर्थस्थानों में से हैं।
पलनी मुरुगन मन्दिर (कोयंबटूर से १०० किमी पूर्वी-दक्षिण में स्थित)
स्वामीमलई मुरुगन मन्दिर (कुंभकोणम के पास)
तिरुत्तनी मुरुगन मन्दिर (चेन्नई से ८४ किमी)
पज्हमुदिर्चोलाई मुरुगन मन्दिर (मदुरई से १० किमी उत्तर में स्थित)
श्री सुब्रहमन्य स्वामी देवस्थानम, तिरुचेन्दुर (तूतुकुडी से ४० किमी दक्षिण में स्थित)
तिरुप्परनकुंद्रम मुरुगन मन्दिर (मदुरई से १० किमी दक्षिण में स्थित)
मरुदमलै मुरुगन मन्दिर (कोयंबतूर का उपनगर) एक तथा प्रमुख तीर्थस्थान हैं।

इण्डिया के कर्णाटक प्रदेश में मंगलौर शहर के पास कुक्के सुब्रमण्या मन्दिर भी अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं जो भगवान मुरुगन को समर्पित हैं किन्तु यह भगवान मुरुगन के उन छः निवास स्थान का हिस्सा नहीं हैं जो तमिल नाडु में स्थित हैं।

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