19 June 2021

निर्जला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2021

निर्जला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2021

 

nirjala ekadashi kab hai
Nirjala Ekadashi 

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं, चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत रखकर संपूर्ण वर्ष की प्रत्येक एकादशियों जितना पुण्य कमाया जा सकता हैं। अतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के शुभ दिवस निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता हैं। बिना जल ग्रहण किए करें गए व्रत को “निर्जला व्रत” कहते हैं। निर्जला एकादशी का व्रत किस भी प्रकार के आहार या जल के बिना ही किया जाता हैं। अतः उपवास के कठोर नियमों के कारण प्रत्येक एकादशी के व्रतों में निर्जला एकादशी का व्रत करना अति कठिन माना गया हैं। निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इस व्रत को पाण्डव एकादशी तथा भीम एकादशी या भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं।

पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से जहां व्रती की प्रत्येक मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं वहीं अनेकानेक रोगों से भी निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में अति वृद्धि होती हैं। जो श्रद्धालु वर्ष की प्रत्येक चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें केवल एक निर्जला एकादशी उपवास अवश्य करना चाहिए, क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से अन्य प्रत्येक एकादशियों का लाभ स्वतः ही व्रती को प्राप्त हो जाता हैं, साथ ही, व्रत के प्रभाव से व्रती की कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सम्पूर्ण यत्न तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ इस व्रत को अवश्य करना चाहिये।

निर्जला एकादशी व्रत को करते समय व्रती भोजन ही नहीं किन्तु जल भी ग्रहण नहीं करते हैं। इस प्रकार यह व्रत हमारे अन्तर्मन में जल संरक्षण की भावना को भी उजागर करता हैं। मान्यता यह भी हैं कि, इस दिवस व्रत रखने, पूजा तथा दान आदि करने से जातक जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता हैं तथा व्रती के प्रत्येक प्रकार के पाप-कर्मो का नाश हो जाता हैं। निर्जला एकादशी के शुभ दिवस भगवान विष्णु जी के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती हैं तथा कैरी का सागार लिया जाता हैं, साथ ही, एकादशी व्रत के सम्पूर्ण समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करना चाहिये।

 

निर्जला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 20 जून, रविवार की साँय 04 बजकर 21 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 21 जून, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में निर्जला एकादशी का व्रत 21 जून, सोमवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, निर्जला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 22 जून, मंगलवार की प्रातः 05 बजकर 58 मिनिट से 08 बजकर 36 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - 10:22


23 May 2021

रोहिणी नक्षत्र व्रत कब है 2021 लिस्ट | Rohini Nakshatra Vrat kab hai 2021 Dates List | Jain Calendar Festivals

रोहिणी नक्षत्र व्रत कब है 2021 लिस्ट | Rohini Nakshatra Vrat kab hai 2021 Dates List | Jain Calendar Festivals
 
rohini vrat 2021 dates list
Rohini Nakshatra Vrat


॥ ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय नम: ॥

 

रोहिणी व्रत

रोहिणी व्रत जैन समुदाय का एक महत्वपूर्ण दिन है। रोहिणी व्रत का पालन मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है। नक्षत्र रोहिणी, हिन्दु एवं जैन कैलेण्डर में वर्णित, सत्ताईस नक्षत्रों में से एक है।
जिस दिन सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र पड़ता है, उस दिन यह व्रत किया जाता है। ऐसा माना जाता है, कि जो भी रोहिणी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वह सभी प्रकार के दुखों एवं दरिद्रता से मुक्त हो जाते हैं। इस व्रत का पारण रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर मार्गशीर्ष नक्षत्र में किया जाता है।
प्रत्येक वर्ष में बारह रोहिणी व्रत होते हैं। आमतौर पर रोहिणी व्रत का पालन तीन, पाँच या सात वर्षों तक लगातार किया जाता है। रोहिणी व्रत की उचित अवधि पाँच वर्ष, पाँच महीने है। उद्यापन के द्वारा ही इस व्रत का समापन किया जाना चाहिए।
 

रोहिणी उपवास 2021

विक्रम सम्वत 2077 - 2078
 
24 जनवरी 2021
रविवार
रोहिणी व्रत
 
20 फरवरी 2021
शनिवार
रोहिणी व्रत
 
20 मार्च 2021
शनिवार
रोहिणी व्रत
 
16 अप्रैल 2021
शुक्रवार
रोहिणी व्रत
 
13 मई 2021
गुरुवार
रोहिणी व्रत
 
10 जून 2021
गुरुवार
रोहिणी व्रत
 
07 जुलाई 2021
बुधवार
रोहिणी व्रत
 
03 अगस्त 2021
मंगलवार
रोहिणी व्रत
 
31 अगस्त 2021
मंगलवार
रोहिणी व्रत
 
27 सितम्बर 2021
सोमवार
रोहिणी व्रत
 
24 अक्तूबर 2021
रविवार
रोहिणी व्रत
 
20 नवम्बर 2021
शनिवार
रोहिणी व्रत
 
18 दिसम्बर 2021
शनिवार
रोहिणी व्रत
 
 
 
Om Shri Srivasupujya Jinendraya Namah
 

Rohini fast

Rohini Vrat is an important day for the Jain community. The Rohini Vrat is mainly observed by women for the longevity of their husbands. Nakshatra Rohini is one of the twenty-seven Nakshatras mentioned in the Hindu and Jain calendar.
On the day Rohini Nakshatra falls after sunrise, this fast is observed. It is believed that whoever follows the Rohini fast devotedly, gets rid of all kinds of sorrows and impoverishment. This fast is observed in Margashirsha Nakshatra at the end of Rohini Nakshatra.
There are twelve Rohini fasts in each year. The Rohini Vrat is generally observed continuously for three, five or seven years. The proper duration of Rohini fast is five years, five months. This fast should be concluded by Udipana.
 

Rohini fasting 2021

Vikram Samvat 2077 - 2078
 
24 January 2021
Sunday
Rohini fast
 
20 February 2021
Saturday
Rohini fast
 
20 March 2021
Saturday
Rohini fast
 
16 April 2021
Friday
Rohini fast
 
13 May 2021
Thursday
Rohini fast
 
10 June 2021
Thursday
Rohini fast
 
07 July 2021
Wednesday
Rohini fast
 
03 August 2021
Tuesday
Rohini fast
 
31 August 2021
Tuesday
Rohini fast
 
27 September 2021
Monday
Rohini fast
 
24 October 2021
Sunday
Rohini fast
 
20 November 2021
Saturday
Rohini fast
 
18 December 2021
Saturday
Rohini fast

12 April 2021

चैत्र नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | Ghatasthapana kab hai | Chaitra Navratra Kalash Sthapana 2021

चैत्र नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | Ghatasthapana kab hai | Chaitra Navratra Kalash Sthapana 2021

navratri kalash sthapana shubh muhurat 2021
Chaitra Navratra Kalash Sthapana


 

🚩 ॥ जय माता दी ॥ 🚩

🌺 जय श्री कालका माँ 🙏

 

नमो देवी महाविद्ये नमामि चरणौ तव।

सदा ज्ञानप्रकाशं में देहि सर्वार्थदे शिवे॥

 

सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।

त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥

 

वर्ष में ४ नवरात्रियाँ होती हैं 🌷

🙏🏻 जिनमें से २ नवरात्रियाँ गुप्त होती हैं -

माघ शुक्ल पक्ष की प्रथम ९ तिथियाँ

चैत्र मास की रामनवमी के समय आती हैं वो ९ तिथियाँ

आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष के ९ दिन

अश्विन महीने की दशहरे के पहले आने वाली ९ तिथियाँ

  

नवरात्र हिन्दुओं का अत्यंत पवित्र तथा प्रमुख त्यौहार हैं। नवरात्र की पूजा नौ दिनों तक होती हैं तथा इन नौ दिनों में माताजी के नौ भिन्न-भिन्न स्वरुपों की पूजा की जाती हैं। माताजी के नौ रूप इस प्रकार हैं- माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा माँ, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, माँ महागौरी तथा सिद्धिदात्रि माँ। प्रत्येक वर्ष में मुख्य दो बार नवरात्र आते हैं, तथा गुप्त नवरात्र भी आते हैं। प्रथम नवरात्र का प्रारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से होता हैं। तथा अगले नवरात्र शारदीय नवरात्रे कहलाते हैं, जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक रहते हैं।

सम्पूर्ण उत्तरी भारत-वर्ष में चैत्र नवरात्र को अत्यंत श्रद्धा तथा विश्वास के साथ, पूर्ण भक्तिभाव से मनाया जाता हैं। चैत्र नवरात्र को प्रत्येक नवरात्रों में सर्वाधिक प्रमुख तथा महत्वपूर्ण माना जाता हैं। चैत्र नवरात्र से ठंडी की ऋतु समाप्त होती हैं तथा गर्मियों के मौसम का प्रारम्भ होता हैं। इस प्रकार इस नवरात्र समय पर प्रकृति माँ, एक प्रमुख जलवायु के परिवर्तन से गुजरती हैं। अतः यह नवरात्र वह समय हैं, जब दो विपरीत ऋतुओ का मिलन होता हैं। इस संधि काल मे ब्रह्मांड से असीम शक्तियां ऊर्जा के स्वरूप में हम तक भूलोक पर पहुँचती हैं। इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के स्वरूपों की साधना पूर्ण श्रद्धा से की जाती हैं। अतः नवरात्रों में माताजी का पूजन विधिवत् किया जाता हैं। देवी के पूजन करने की विधि दोनों ही नवरात्रों में लगभग एक समान ही रहती हैं। इस त्यौहार पर सुहागन या कन्या, सभी महिलाए अपने सामर्थ्य अनुसार दो, तीन या सम्पूर्ण नौ दिनों तक का व्रत रखते हैं तथा दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात व्रत खोला जाता हैं अर्थात व्रत का पारण किया जाता हैं। नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का संकल्प किया जाता हैं। अतः व्रत का संकल्प लेते समय उसी प्रकार संकल्प लें, जीतने दिन आपको व्रत रखना हैं। व्रत-संकल्प के पश्चात ही घट-स्थापना की विधि प्रारंभ की जाती हैं। घट-स्थापना सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में ही करना चाहिए, ऐसा करने से घर में सुख, शांति तथा समृद्धि व्याप्त रहती हैं।

हिन्दू धर्म में प्रत्येक पूजा से पूर्व भगवान गणेश जी की पूजा का विधान हैं, अतः नवरात्र की शुभ पूजा से पहले कलश के रूप में श्री गणेश महाराज को स्थापित किया जाता हैं। नवरात्र के आरंभ की प्रतिपदा तिथि के दिन कलश या घट की स्थापना की जाती हैं। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता हैं।

 

कलश स्थापना करते समय इन विशेष नियमो का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

कृपया ध्यान दे:-

1. नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता हैं, वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में नहीं करना चाहिए।

2. नवरात्र में कलश स्थापना किसी भी समय किया जा सकता हैं। नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा समय प्रारंभ हो जाता हैं, अतः यदि जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाते हैं तो वे सम्पूर्ण दिवस किसी भी समय कलश स्थापित कर सकते हैं।

3. कलश स्थापना करने से पूर्व, अपने घर में देवी माँ का स्वागत करने के लिए, घर की साफ-सफाई अच्छे से करनी चाहिए।

4. नवरात्रों में माँ भगवती की आराधना “दुर्गा सप्तसती” से की जाती हैं, परन्तु यदि समयाभाव हैं तो भगवान् शिव रचित “सप्तश्लोकी दुर्गा” का पाठ अत्यंत ही प्रभाव शाली हैं एवं दुर्गा सप्तसती का पाठ सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाला हैं।

5. नवरात्रि के दौरान सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। अतः नवरात्रि के दौरान भूमि शयन करना चाहिए तथा सात्त्विक आहार, जैसे कि आलू, कुट्टू का आटा, दूध-दही तथा फल आदि ग्रहण करना चाहिए।

 

चैत्र नवरात्रि 2021 कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 12 अप्रैल, सोमवार की प्रातः 08 बजकर 01 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 13 अप्रैल, मंगलवार के दिन 10 बजकर 16 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ 13 अप्रैल, मंगलवार के शुभ दिवस से हो रहा हैं। तथा यह नवरात्र 21 अप्रैल, बुधवार तक रहेंगे।

 

शुभारंभ/प्रारंभ:- 13 अप्रैल, मंगलवार

समापन/समाप्त:- 21 अप्रैल, बुधवार

 

नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात 13 अप्रैल, मंगलवार के दिन को माता दुर्गाजी के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा होगी। पार्वती तथा हेमवती भी माँ शैलपुत्री के अन्य नाम हैं।

 

इस वर्ष 2021 में देवी दुर्गा माताजी का आगमन घोड़े की सवारी पर होगा तथा उनका प्रस्थान हाथी की सवारी पर होगा।

 

चैत्र नवरात्रि घटस्थापना (कलश स्थापना) मुहूर्त

इस वर्ष, चैत्र नवरात्रि कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त, 13 अप्रैल, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 11 मिनिट से 10 बजकर 16 मिनिट तक विष्कम्भ योग में रहेगा। यदि इस समय आप कलश स्थापना करेंगे तो यह अति शुभ फलदायक सिद्ध होगा।

 
चैत्र नवरात्रि के महत्वपूर्ण मुहूर्त-

13 अप्रैल 2021

अभिजित मुहूर्त:- 12:02 से 12:53

राहुकाल:- 15:37 से 17:12

सूर्योदय:- 06:08 सूर्यास्त:- 18:47

चन्द्रोदय:- 06:55 चन्द्रास्त:- 19:55

 

आशा करता हु मेरे द्वारा दी गयी जानकारी आपको अच्छी लगी होगी, यह जानकारी अपने दोस्तों के साथ इस विडियो के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा शेयर करे तथा हमारे चेंनल को सब्सक्राइब जरूर करे

धन्यवाद!

 

06 February 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021 

shattila ekadashi vrat
shattila ekadashi vrat 

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसके व्रत के दिन “तिल” का विशेष रूप से छ: प्रकार से उपयोग किया जाता हैं। जो की इस प्रकार हैं-

1- तिल से स्नान करना

2- तिल का उबटन लगाना

3- तिल से हवन करना

4- तिल से तर्पण करना

5- तिल का भोजन करना तथा

6- तिलों का दान करना

इस प्रकार, तिलों का छह प्रकार से उपयोग करने के कारण माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता हैं। अपने नाम के अनुसार यह व्रत तिलों से जुडा हुआ हैं, तिल का महत्व सर्वव्यापक हैं तथा हिन्दु धर्म में तिल अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। पूजा में भी तिल का विशेष महत्व होता हैं। माघ मास में शरद ऋतु अपने चरम पर होती हैं तथा यह मास के अंत के साथ ही सर्दियाँ जाने लगती हैं। इस मौसम में तिलों का व्यवहार अत्यंत बढ़ जाता हैं क्योंकि तिल का सेवन सर्दियों में अत्यंत लाभदायक रहता हैं। अतः स्नान, दान, तर्पण, आहार आदि में तिलों का विशेष महत्व होता हैं। जो जातक इस एकादशी का व्रत करता हैं, उसे यथासंभव तिलों से भरा घडा़, लोटा, या गिलास उचित ब्राह्मण को दान करना चाहिए। ऐसी मान्यता हैं की, इस एकदशी के दिन जातक जितने तिलों का दान करेगा उतने ही हज़ार वर्ष तक वह स्वर्गलोक का अधिकारी रहेगा।

 

षटतिला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी, रविवार की प्रातः 06 बजकर 26 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 08 फरवरी, सोमवार की प्रातः 04 बजकर 47 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में षटतिला एकादशी का व्रत 07 फरवरी, रविवार के दिन किया जाएगा।

साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत 08 फरवरी, सोमवार के दिवस किया जाएगा।

 

इस वर्ष, षटतिला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 08 फरवरी, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 51 मिनिट से 04 बजकर 02 मिनिट तक का रहेगा।

हरि वासर समाप्त होने का समय - प्रातः 10 बजकर 25 मिनिट का रहेगा।

 साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत का पारण 9 फरवरी, मंगलवार की प्रातः 07 बजकर 04 मिनिट से 09 बजकर 18 मिनिट तक का रहेगा।

31 January 2021

संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चन्द्रोदय का समय 2021 | Aaj Chand Nikalne kitne baje niklega | Chandrodaya ka Samay

संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चन्द्रोदय का समय 2021 Aaj Chand Nikalne kitne baje niklega | Chandrodaya ka Samay 


sakat chauth 2021
sakat chauth  2021

🌷 विघ्नों तथा मुसीबते दूर करने के लिए 🌷
👉 कृष्ण पक्ष की चतुर्थी।
🙏🏻 शिव पुराण में आता है कि प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (पूनम के पश्चात) के दिन प्रातः श्री गणेशजी का पूजन करें तथा रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें तथा ये मंत्र बोलें :
🌷 ॐ गं गणपते नमः ।
🌷 ॐ सोमाय नमः ।
 
 
🌷 चतुर्थी तिथि विशेष 🌷
🙏🏻 चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेशजी हैं।
📆 हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो चतुर्थी होती हैं।
🙏🏻 पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
🙏🏻 शिवपुराण के अनुसार महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥
➡ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली तथा एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।
 
 
🌷 कोई कष्ट हो तो 🌷
🙏🏻 हमारे जीवन में बहुत समस्याएँ आती रहती हैं, मिटती नहीं हैं ।, कभी कोई कष्ट, कभी कोई समस्या | ऐसे लोग शिवपुराण में बताया हुआ एक प्रयोग कर सकते हैं कि, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (मतलब पुर्णिमा के बाद की चतुर्थी ) आती है | उस दिन सुबह छः मंत्र बोलते हुये गणपतिजी को प्रणाम करें कि हमारे घर में ये बार-बार कष्ट तथा समस्याएं आ रही हैं वो नष्ट हों |
👉🏻 छः मंत्र इस प्रकार हैं
🌷 ॐ सुमुखाय नम: : सुंदर मुख वाले; हमारे मुख पर भी सच्ची भक्ति प्रदान सुंदरता रहे ।
🌷 ॐ दुर्मुखाय नम: : मतलब भक्त को जब कोई आसुरी प्रवृत्ति वाला सताता है तोभैरव देख दुष्ट घबराये ।
🌷 ॐ मोदाय नम: : मुदित रहने वाले, प्रसन्न रहने वाले । उनका सुमिरन करने वाले भी प्रसन्न हो जायें ।
🌷 ॐ प्रमोदाय नम: : प्रमोदाय; दूसरों को भी आनंदित करते हैं । भक्त भी प्रमोदी होता है तथा अभक्त प्रमादी होता है, आलसी । आलसी आदमी को लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है । तथा जो प्रमादी न हो, लक्ष्मी स्थायी होती है ।
🌷 ॐ अविघ्नाय नम:
🌷 ॐ विघ्नकरत्र्येय नम:
हिन्दु के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। सनातन हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार चतुर्थी तिथि भगवान गणेश की तिथि हैं। अमावस के पश्चात आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं तथा पूर्णिमा के पश्चात आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं।
चतुर्थी के दिन सुबह में गणपतिजी का पूजन करें तथा रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें तथा ये मंत्र बोलें :
🌷 ॐ गं गणपते नमः ।
🌷 ॐ सोमाय नमः ।
 
‪🌷 चतुर्थी तिथि विशेष 🌷
🙏🏻 चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेशजी हैं।
📆 हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो #चतुर्थी होती है।
🙏🏻 पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
🙏🏻 शिवपुराण के अनुसार महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥
➡ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली तथा एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।
 
 

संकष्टी चतुर्थी व्रत 2020 चन्द्रोदय का समय

 
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी
02 जनवरी, 2021, शनिवार
चन्द्रोदय - 08:59 PM
पौष, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 09:09 AM, जनवरी 02
समाप्त - 08:22 AM, जनवरी 03
 
सकट चौथ, लम्बोदर संकष्टी चतुर्थी
31 जनवरी, 2021, रविवार
चन्द्रोदय - 08:51 PM
माघ, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 08:24 PM, जनवरी 31
समाप्त - 06:24 PM, फरवरी 01
 
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी
02 मार्च, 2021, मंगलवार
चन्द्रोदय - 09:43 PM
फाल्गुन, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 05:46 AM, मार्च 02
समाप्त - 02:59 AM, मार्च 03
 
भालचन्द्र संकष्टी चतुर्थी
31 मार्च, 2021, बुधवार
चन्द्रोदय - 09:37 PM
चैत्र, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 02:06 PM, मार्च 31
समाप्त - 10:59 AM, अप्रैल 01
 
विकट संकष्टी चतुर्थी
30 अप्रैल, 2021, शुक्रवार
चन्द्रोदय - 10:40 PM
वैशाख, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 10:09 PM, अप्रैल 29
समाप्त - 07:09 PM, अप्रैल 30
 
एकदन्त संकष्टी चतुर्थी
29 मई, 2021, शनिवार
चन्द्रोदय - 10:27 PM
ज्येष्ठ, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 06:33 AM, मई 29
समाप्त - 04:03 AM, मई 30
 
कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी
27 जून, 2021, रविवार
चन्द्रोदय - 09:58 PM
आषाढ़, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 03:54 PM, जून 27
समाप्त - 02:16 PM, जून 28
 
गजानन संकष्टी चतुर्थी
27 जुलाई, 2021, मंगलवार
चन्द्रोदय - 09:52 PM
श्रावण, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 02:54 AM, जुलाई 27
समाप्त - 02:28 AM, जुलाई 28
 
हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी, बहुला चतुर्थी
25 अगस्त, 2021, बुधवार
चन्द्रोदय - 08:56 PM
भाद्रपद, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 04:18 PM, अगस्त 25
समाप्त - 05:13 PM, अगस्त 26
 
विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी
24 सितम्बर, 2021, शुक्रवार
चन्द्रोदय - 08:33 PM
आश्विन, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 08:29 AM, सितम्बर 24
समाप्त - 10:36 AM, सितम्बर 25
 
वक्रतुण्ड संकष्टी चतुर्थी, करवा चौथ
24 अक्तूबर, 2021, रविवार
चन्द्रोदय - 08:26 PM
कार्तिक, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 03:01 AM, अक्तूबर 24
समाप्त - 05:43 AM, अक्तूबर 25
 
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी
23 नवम्बर, 2021, मंगलवार
चन्द्रोदय - 08:46 PM
मार्गशीर्ष, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 10:26 PM, नवम्बर 22
समाप्त - 12:55 AM, नवम्बर 24
 
अखुरथ संकष्टी चतुर्थी
22 दिसम्बर, 2021, बुधवार
चन्द्रोदय - 08:30 PM
पौष, कृष्ण चतुर्थी
प्रारम्भ - 04:52 PM, दिसम्बर 22
समाप्त - 06:27 PM, दिसम्बर 23
 

Sankashti Chaturthi fast 2020 moonrise time

 
Akhurath Sankashti Chaturthi
02 January 2021, Saturday
Moonrise - 08:59 PM
Paush, Krishna Chaturthi
Start - 09:09 AM, January 02
Ends - 08:22 AM, January 03
 
Sakat Chauth, Lambodar Sankashti Chaturthi
January 31, 2021, Sunday
Moonrise - 08:51 PM
Magha, Krishna Chaturthi
Start - 08:24 PM, January 31
Ends - 06:24 PM, February 01
 
Dwijpari Sankashti Chaturthi
02 March 2021 Tuesday
Moonrise - 09:43 PM
Phalgun, Krishna Chaturthi
Start - 05:46 AM, March 02
Ends - 02:59 AM, March 03
 
Bhalchandra Sankashti Chaturthi
March 31, 2021, Wednesday
Moonrise - 09:37 PM
Chaitra, Krishna Chaturthi
Start - 02:06 PM, March 31
Ends - 10:59 AM, April 01
 
Heavy Sankashti Chaturthi
April 30, 2021, Friday
Moonrise - 10:40 PM
Vaisakh, Krishna Chaturthi
Start - 10:09 PM, April 29
Ends - 07:09 PM, April 30
 
Ekadant Sankashti Chaturthi
May 29, 2021, Saturday
Moonrise - 10:27 PM
Jyeshtha, Krishna Chaturthi
Start - 06:33 AM, May 29
Ends - 04:03 AM, May 30
 
Krishnapingal Sankashti Chaturthi
June 27, 2021, Sunday
Moonrise - 09:58 PM
Ashada, Krishna Chaturthi
Start - 03:54 PM, June 27
Ends - 02:16 PM, June 28
 
Gajanan Sankashti Chaturthi
27 July 2021 Tuesday
Moonrise - 09:52 PM
Shravan, Krishna Chaturthi
Start - 02:54 AM, July 27
Ends - 02:28 AM, July 28
 
Herumb Sankashti Chaturthi, Bahula Chaturthi
August 25, 2021, Wednesday
Moonrise - 08:56 PM
Bhadrapada, Krishna Chaturthi
Start - 04:18 PM, August 25
Ends - 05:13 PM, August 26
 
Vighnaraj Sankashti Chaturthi
September 24, 2021, Friday
Moonrise - 08:33 PM
Ashwin, Krishna Chaturthi
Start - 08:29 AM, September 24
Ends - 10:36 AM, September 25
 
Vakratund Sankashti Chaturthi, Karva Chauth
October 24, 2021, Sunday
Moonrise - 08:26 PM
Karthik, Krishna Chaturthi
Start - 03:01 AM, October 24
Ends - 05:43 AM, October 25
 
Ganadhip Sankashti Chaturthi
November 23, 2021, Tuesday
Moonrise - 08:46 PM
Margashirsha, Krishna Chaturthi
Start - 10:26 PM, November 22
Ends - 12:55 AM, November 24
 
Akhurath Sankashti Chaturthi
December 22, 2021, Wednesday
Moonrise - 08:30 PM
Paush, Krishna Chaturthi
Start - 04:52 PM, December 22
Ends - 06:27 PM, December 23


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