03 October 2018

इन्दिरा एकादशी व्रत विधि | पौराणिक व्रत कथा | Indira Ekadashi 2018 | Ekadashi Vrat in Hindi #EkadashiVrat

इन्दिरा एकादशी व्रत विधि | पौराणिक व्रत कथा | Indira Ekadashi 2018 | Ekadashi Vrat in Hindi #EkadashiVrat

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         वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता है तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती है। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता है। भगवानजी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती है, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, एवं रात्री जागरण करते है। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जो की श्राद्ध पक्ष की एकादशी दिन आती है, तथा इस एकादशी के व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती हैं। यह पितरों को सद्गति देनेवाली एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। जो की, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। इस एकादशी की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पितृपक्ष में आती है जिस कारण इसका महत्व अत्यंत अधिक हो जाता है। मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज़ जाने-अंजाने हुए अपने पाप कर्मों के कारण यमदेव के पास अपने कर्मों का दंड भोग रहे हैं, तो इस एकादशी पर विधिपूर्वक व्रत कर इसके पुण्य को उनके नाम पर दान कर दिया जाये तो उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है तथा मृत्यु के उपरांत व्रती भी बैकुण्ठ में निवास करता है।


       इन्दिरा एकादशी व्रत का महत्व
       आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी इंदिरा एकादशीकहलाती है। शास्त्रों के अनुसार पितरो की मुक्ति के लिए, उन्हें मोक्ष प्रदान कराने का तथा उन्हें स्वर्ग में स्थान दिलाने का इंदिरा एकादशी एक अत्यंत उत्तम एवं महत्वपूर्ण उपाय है। इस उपाय को करने मात्र से पितरो को महान पुण्य की प्राप्ति होती है। इस उपाय को करने से पितृ प्रसन्न होकर अपने वंशजो को आशीर्वाद स्वरूप उनकी प्रत्येक मनोकामनाएँ पूर्ण करते है। इस पृथ्वी में प्रत्येक घर के मुखिया को अपने पितरो के लिए इंदिरा एकादशी का व्रत तथा इस दिन पितरो के निमित योग्य ब्राह्मण को दान-पुण्य अवश्य ही करना चाहिए। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप की पूजा कर व्रत करने का विधान है। इन्दिरा एकादशी व्रत प्रत्येक प्रकार के कष्टों को नष्ट करता है। पितृपक्ष की एकादशी होने के कारण यह एकादशी पितरों की मुक्ति के लिए उत्तम मानी गई हैं। पितृपक्ष में मनाई जाने वाली इस एकादशी को पितरों के लिए विशेष माना जाता है। पद्म पुराण के अनुसार इन्दिरा एकादशी व्रत, साधक की मृत्यु के पश्चात भी प्रभावित करता है। इसके प्रभाव से व्यक्ति के प्रत्येक पापों का नाश होता हैं तथा वह स्वर्गलोक को प्राप्त करता है। इस व्रत के प्रभाव से जातक के पितरों का दोष भी समाप्त होता है। शास्त्रों के अनुसार इंदिरा एकादशी के दिन प्रत्येक स्त्री पुरुषो को इस एकादशी की कथा को अवश्य ही पढ़ना या सुनना चाहिए, इससे पितरो का उद्धार होता है, मनुष्यो के पापो का नाश होता है, उनके पुण्य बढ़ते है, आरोग्य की प्राप्ति होती है, घर परिवार में प्रेम, सौहार्द, सुख-समृद्धि का वास होता है, अंत में स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा नरक के दर्शन कदापि नहीं होते है। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से बड़े-बड़े पापों का नाश हो जाता है। नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी यह एकादशी सद्गति प्रदान करने वाली है। यह एकादशी पितरों को मोक्ष प्रदान करनेवाली है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य अपने परिजनों के साथ प्रत्येक सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त करता है।

 

       इन्दिरा एकादशी व्रत की पूजा विधि

सर्वप्रथम हम आपको बताते है की इस एकादशी के पूजन में आवश्यक सामग्री की सूची- जो की इस प्रकार है-

इन्दिरा एकादशी व्रत पूजन सामग्री

भगवान के लिए पीला वस्त्र
श्री विष्णु जी की मूर्ति
शालिग्राम भगवान की मूर्ति
पुष्प तथा पुष्पमाला
नारियल तथा सुपारी
धूप, दीप तथा घी
पंचामृत (दूध(कच्चा दूध), दही, घी, शहद तथा शक्कर का मिश्रण)
अक्षत
तुलसी पत्र
चंदन
प्रसाद के लिए मिठाई तथा ऋतुफल
तिल तथा गुड़ का सागार

 
      
इन्दिरा एकादशी व्रत की पूजा विधि
       प्रत्येक एकादशी व्रत का विधान स्वयं श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा हैं। पद्म पुराण की कथा के अनुसार महर्षि नारदजी ने व्रत की विधि बताते हुए कहा था कि एकादशी व्रतों के नियमों का पालन दशमी तिथि से ही प्रारम्भ किया जाता है, अतः दशमी तिथि को साँयकाल में सूर्यास्त के पश्चात भोजन नहीं करना चाहिए तथा रात्रि में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन तथा भगवान का ध्यान करते हुए सोना चाहिए। एकादशी का व्रत रखने वाले को अपना मन को शांत एवं स्थिर रखना चाहिए। किसी भी प्रकार की द्वेष भावना या क्रोध मन में नहीं लाना चाहिए। परनिंदा से बचना चाहिए। इस एकादशी को ताँबा, चाँदी, चावल तथा दही का दान करना उचित माना गया है।
       अगले दिन अर्थात एकादशी व्रत के दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से पवित्र होकर व्रत संकल्प लेना चाहिए कि मैं आज समस्त भोगों को त्याग कर, निराहार एकादशी का व्रत करुंगा, हे प्रभु मैं आपकी शरण हूं आप मेरी रक्षा करें। तथा मेरे पितरो का उद्धार करे। उसके पश्चात शालिग्राम भगवान को पंचामृत से स्नान कराकर वस्त्र पहनाए, भोग लगायें तथा पूजा आरती करें। पंचामृत वितरण कर शालिग्राम पर तुलसी अवश्य चढ़ाएं। व्रत के दिन अन्न वर्जित है। अतः निराहार रहें तथा शाम में पूजा के पश्चात चाहें तो फल ग्रहण कर सकते है। यदि आप किसी कारण व्रत नहीं रखते हैं तो भी एकादशी के दिन चावल का प्रयोग भोजन में नहीं करना चाहिए।
       पितरों का आशीष लेने के लिए विधि-पूर्वक श्राद्ध कर ब्राह्मण को फलाहार या भोजन एवं दक्षिणा देना चाहिए। पितरों को दिया गया अन्न-पिंड गाय, कौए एवम कुत्ते को खिलाना चाहिए। इसके पश्चात धूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य, मिठाई तथा फल आदि से भगवान विष्णु का पूजन करने का विधान है।
       एकादशी के दिन रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। संभव हो तो रात में जगकर भगवान का भजन कीर्तन करना चाहिए। एकादशी के दिन विष्णु-सहस्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा-दृष्टि प्राप्त होती है। व्रत के अगले दिन अर्थात द्वादशी तिथि को सवेरा होने पर पुन: पूजन तथा सही मुहूर्त में व्रत का पारण करना चाहिए, साथ ही ब्राह्मण-भोज करवाने के पश्चात परिवार के साथ मौन होकर भोजन करना चाहिए।
       इस प्रकार राजा इंद्र सेन ने व्रत-विधि का अनुसरण किया, जिसके प्रताप से उनके पितरो को मोक्ष की प्राप्ति हुई तथा वे यमलोक से विष्णुलोक में चले गए। इस इंदिरा एकादशी के प्रताप से राजा इंद्रसेन को भी वैकुण्ड लोक की प्राप्ति हुई।

       इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण
       एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

ध्यान रहे,
१.             एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।   
२.             यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही होता है।
३.             द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
४.             एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५.             व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।
६.             व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७.             जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।
८.             यदि, कुछ कारणों की वजह से जातक प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

       इन्दिरा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
       एक बार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण जी से कहने लगे कि “हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? कृपा करके बताइए।” भगवान श्री कृष्ण जी इस पर धर्मराज युद्धिष्ठर को इंदिरा एकादशी का महत्व बताते हुए कहते हैं कि “आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी इंदिरा एकादशीकहलाती है। इन्दिरा एकादशी समस्त पाप कर्मों का नाश करने वाली होती है एवं इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से व्रती के साथ-साथ उनके समस्त पितरों की भी मुक्ति होती है। हे राजन्! इंदिरा एकादशी की जो कथा मैं तुम्हें सुनाने जा रहा हूं। इसके सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है”।
       आगे कथा प्रारम्भ करते हुए कृष्ण जी कहते हैं की, “यह कथा सतयुग की है। उस समय प्रतापी राजा इन्द्रसेन माहिष्मती नगरी में राज किया करते थे। वे अत्यंत धर्मात्मा थे अतः प्रजा भी सुख चैन से रहती थी। धर्म कर्म के सारे काम अच्छे से किये जाते थे। राजा पुत्र, पौत्र तथा धन आदि से संपन्न भगवान विष्णु के प्रचंड भक्त थे। यज्ञ एवम उपवास के प्रत्येक धार्मिक कार्य पूरी श्रद्दा से करते थे। उनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी थी। अकस्मात एक दिन उन्होंने स्वप्न देखा कि उनके माता पिता यमलोक में कष्ट भोग रहे हैं। निद्राभंग होने पर वह चिंतित हुए कि किस प्रकार इस यातना से पितरों को मुक्त किया जाये। इस विषय पर राजा ने मंत्री से विचार विमर्श किया। मंत्री ने राजा इन्द्रसेन से विद्वानों को बुलाकर पूछने की स्वीकृति मांगी। राजा ने भी अनुमति दे दी।
       दरबार में, सभी ब्राह्मणों के उपस्थित होने पर स्वप्न की बात बताई गयी। उनमे से एक विद्वान ब्राहम्ण ने कहा की, हे राजन! यदि आप सह-कुटुम्ब आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी व्रत करें तो आपके पितरों की मुक्ति हो जाएगी। उस दिन आप श्रद्धापूर्वक पितरों का श्राद्ध करें तथा एक बार भोजन करें। व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करते हुए प्रतिज्ञा करें कि मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा। हे भगवान! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए। इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की पूजा, तुलसी पत्र आदि चढ़ाकर 11 योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर, दक्षिणा तथा आशीर्वाद लें। इसके प्रताप से आपके माता पिता स्वयं ही स्वर्ग चले जायेंगे। आप रात्रि को मूर्ती के पास ही, भगवान के निकट जागरण करें। हे राजन! यदि इस विधि से आप आलस्य रहित होकर इन्दिरा एकादशी का व्रत करोगे तो आपके पितर अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे।”
       उसके पश्चात राजा ने भी आश्विन कृष्ण एकादशी को ब्राह्मणो द्वारा बताई विधि के अनुसार ही व्रत का पालन किया। जब रात में राजा मंदिर में जागरण कर रहे थे तभी भगवान् जी ने उन्हें दर्शन दिए तथा बोले हे राजा व्रत के प्रभाव से तुम्हारे माता पिता स्वर्ग को पहुँच गए हैं।”     
       राजा इन्द्रसेन को भी भूलोक में सुख भोग कर तथा अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर मृत्यु के पश्चात इन्दिरा एकादशी व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति हुई।

       भगवान् श्री कृष्ण बोले की- “हे राजन् युधिष्ठिर! इस प्रकार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की 'इंदिरा एकादशी' व्रत के प्रभाव से समस्त पाप-कर्म नष्ट हो जाते है। साथ ही, यह एकादशी नीच योनि में पड़े हुए पितरों को भी सद्गति प्रदान करने वाली है।





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