02 October 2022

शारदीय नवरात्रि उपवास कब खोले | नवरात्रि हवन मुहूर्त | कन्या पूजन कब करें | Navratri ka Paran kab hai | Shardiya Navratri Kanya Pujan 2022 नवरात्रि पारण का समय

शारदीय नवरात्रि उपवास कब खोले | नवरात्रि हवन मुहूर्त | कन्या पूजन कब करें | Navratri ka Paran kab hai | Shardiya Navratri Kanya Pujan 2022 नवरात्रि पारण का समय 

Shardiya Navratri Kanya Pujan 2022
Shardiya Navratri 
नवरात्र सनातनी हिन्दुओं का सर्वाधिक पवित्र तथा प्रमुख त्यौहार हैं। नवरात्र की पूजा नौ दिनों तक होती हैं तथा इन नौ दिनों में माताजी के नौ भिन्न-भिन्न स्वरूपों की पूजा तथा आराधना पूर्ण भक्तिभाव से की जाती हैं। माताजी के नौ रूप इस प्रकार हैं- माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा माँ, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, माँ महागौरी तथा सिद्धिदात्रि माँ। प्रत्येक वर्ष में मुख्य दो बार नवरात्र आते हैं, तथा गुप्त नवरात्र भी आते हैं।
सम्पूर्ण उत्तरी भारत-वर्ष में शारदीय नवरात्र को अत्यंत श्रद्धा तथा विश्वास के साथ नौ दिनों तक व्रत कर के मनाया जाता हैं। शारदीय नवरात्र को प्रत्येक नवरात्रों में सर्वाधिक प्रमुख तथा महत्वपूर्ण माना जाता हैं। शारदीय नवरात्र से की वर्षा ऋतु समाप्त होती हैं तथा ठंडी के मौसम का प्रारम्भ होता हैं। अतः यह नवरात्र वह समय हैं, जब दो ऋतुओं का मिलन होता हैं। इस संधि काल में ब्रह्मांड से असीम शक्तियां ऊर्जा के स्वरूप में हम तक भूलोक पर पहुँचती हैं। अतः इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के स्वरूपों की साधना पूर्ण श्रद्धा से की जाती हैं। अतः नवरात्रों में माताजी का पूजन विधिवत् किया जाता हैं। देवी के पूजन करने की विधि दोनों ही नवरात्रों में लगभग एक समान ही रहती हैं। इस त्यौहार पर सुहागन या कन्या, सभी महिलाएं अपने सामर्थ्य अनुसार दो, तीन या सम्पूर्ण नौ दिनों तक का व्रत रखते हैं तथा दसवें दिन कन्या पूजन तथा हवन के पश्चात व्रत खोला जाता हैं अर्थात व्रत का पारण किया जाता हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र का पर्व नौ दिनों तक मनाया जाता हैं, किन्तु कभी-कभी तिथियों में बदलाव के कारण नवरात्र का पर्व कभी आठ दिनों तक, तो कभी-कभार दस दिनों तक भी मनाया जाता हैं। अपने संकल्प के अनुसार नौ दिन व्रत रहने वाली महिलाएं नवमी तिथि के दिन कन्या पूजन तथा हवन करते हैं। नवमी के दिन सिद्धिदात्रि देवी की पूजा की जाती हैं तथा नवमी के दिन ही दुर्गा महा-पूजा भी की जाती हैं। नवमी के दिन पंडालों में विशेष पूजा आरती का आयोजन किया जाता हैं तथा भक्तजन अपने परिवार या समूह में विविध प्रकार के आयोजनों से भजन कीर्तन करते हैं। किन्तु, यह भी देखा गया हैं की, कुछ महिलाएं नवमी के दिन नवरात्रि के व्रत का पारण करती हैं तो कुछ नौ दिन तक व्रत रखने के पश्चात दशमी तिथि के दिवस शुभ मुहूर्त में पारण करती हैं।
इस वर्ष अष्टमी तथा नवमी तिथि 2 दोनों दिन व्याप्त हैं, जिस कारण आप प्रत्येक भक्तजनों के पास केवल सामान्य जानकारी तो हैं किन्तु पर्याप्त जानकारी का अभाव हैं की,
अष्टमी या नवमी का व्रत कब किया जाएगा?
कन्या पूजन कब किया जाएगा?
नवरात्रि का हवन कब करना चाहिए?
तथा
नवरात्रि व्रत का पारण कब करें?
अतः इस शंका का हम निवारण करते हैं।
 

नवरात्रि व्रत का पारण

अथ नवरात्रपारणानिर्णयः। सा च दशम्यां कार्या॥
                                -निर्णयसिन्धु
निर्णयसिन्धु, पौराणिक ग्रंथ के अनुसार, शारदीय नवरात्रि पारण तब किया जाना चाहिए जब नवमी तिथि समाप्त हो रही हो तथा दशमी तिथि प्रारम्भ हो रही हो। जैसा कि शास्त्रो में भी उल्लेख प्राप्त होता हैं की, शारदीय नवरात्रि उपवास प्रतिपदा से प्रारम्भ कर के नवमी तिथि तक रखना चाहिए तथा इस दिशा निर्देश का पालन करने हेतु शारदीय नवरात्रि का व्रत समूर्ण नवमी तिथि के दिन तक करना चाहिए।
 

नवरात्रि का पारण

इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 02 अक्तूबर, रविवार की साँय 06 बजकर 47 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 03 अक्तूबर, सोमवार की साँय 04 बजकर 37 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
इस वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 03 अक्तूबर, सोमवार की साँय 04 बजकर 37 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 04 अक्तूबर, मंगलवार की दोपहर 02 बजकर 20 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
शास्त्रोक्त नियम हैं की, जब नवमी दो तिथियों में हो तथा प्रथम तिथि के मध्याह्न में नवमी हो, तो व्रत या त्योहार उसी दिवस किया जाना चाहिए। किन्तु यदि नवमी दोनों दिनों के मध्याह्न में पड़ रही हो, या जब किसी भी दिन मध्याह्न को नवमी न हो, तो दशमी से युक्त नवमी में व्रत करना चाहिए।
अतः इस वर्ष, 04 अक्तूबर, मंगलवार के दिन मध्याह्न के समय नवमी तिथि रहेगी, किन्तु 05 अक्तूबर, बुधवार के दिन नवमी तिथि का क्षय दोपहर से पूर्व ही हो जाएगा। अतः इस वर्ष 2022 में नवरात्रि के दुर्गा अष्टमी, सरस्वती पूजा, महागौरी पूजा एवं सन्धि पूजा 03 अक्तूबर, सोमवार दिन हैं। साथ ही, इस नवरात्रि के नवमी का व्रत 04 अक्तूबर, मंगलवार के दिन ही किया जाएगा तथा महा नवमी, आयुध पूजा तथा नवमी हवन भी 04 अक्तूबर, मंगलवार के दिन ही हैं। जो श्रद्धालु अष्टमी के दिन कन्या पूजन करते हैं, वे 03 अक्तूबर, सोमवार के दिन ही कर सकते हैं। नवरात्रि का व्रत सायाह्न हवन 04 अक्तूबर, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 19 से दोपहर 02 बजकर 20 मिनिट तक कर सकते है।  
 

शारदीय नवरात्रि के दिव्य व्रत के पारण का शुभ मुहूर्त  

इस वर्ष, 2022 में, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 04 अक्तूबर, मंगलवार की दोपहर 02 बजकर 20 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 05 अक्तूबर, बुधवार की दोपहर 12 बजकर 01 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः शारदीय नवरात्रि के व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 04 अक्तूबर, मंगलवार की दोपहर 02 बजकर 20 मिनिट के पश्चात का रहेगा।
 
विजयादशमी का पर्व 05 अक्तूबर, बुधवार के दिवस मनाया जाएगा।
विजयादशमी का विजय मुहूर्त, दोपहर 02 बजकर 14 मिनिट से 03 बजकर 01 मिनिट तक का रहेगा।
 
देवी दुर्गा माँ का विसर्जन भी 05 अक्तूबर, बुधवार के शुभ दिवस ही किया जाएगा, जिसका दुर्गा विसर्जन का शुभ मुहूर्त प्रातः 06 बजकर 20 मिनिट से 08 बजकर 42 मिनिट तक का रहेगा।
 
श्रवण नक्षत्र 04 अक्तूबर, मंगलवार के दिन 10 बजकर 51 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 05 अक्तूबर, बुधवार के दिन 09 बजकर 15 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
 

शारदीय नवरात्रि पारण के दिवस अन्य महत्वपूर्ण समय इस प्रकार हैं-

04 अक्तूबर 2022, मंगलवार
अभिजित मुहूर्त:- 11:57 से 12:46
राहुकाल:- 17:06 से 18:44
सूर्योदय:- 06: 04 सूर्यास्त:- 18:44
चन्द्रोदय:- 13:19 चन्द्रास्त:- 03:10 (मध्यरात्रि)

20 September 2022

इन्दिरा एकादशी कब है 2022 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Indira Ekadashi kab ki hai 2022

इन्दिरा एकादशी कब है 2022 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Indira Ekadashi kab ki hai 2022

indira ekadashi 2022 date
Indira Ekadashi

वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता है तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती है। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता है। भगवानजी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती है, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, एवं रात्री जागरण करते है। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जो की श्राद्ध पक्ष की एकादशी दिन आती है, तथा इस एकादशी के व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती हैं। यह पितरों को सद्गति देनेवाली एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। जो की, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। इस एकादशी की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पितृपक्ष में आती है जिस कारण इसका महत्व अत्यंत अधिक हो जाता है। मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज़ जाने-अंजाने हुए अपने पाप कर्मों के कारण यमदेव के पास अपने कर्मों का दंड भोग रहे हैं, तो इस एकादशी पर विधिपूर्वक व्रत कर इसके पुण्य को उनके नाम पर दान कर दिया जाये तो उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है तथा मृत्यु के उपरांत व्रती भी बैकुण्ठ में निवास करता है।

 

इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 20 सितम्बर, मंगलवार की रात्रि 09 बजकर 26 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 21 सितम्बर, बुधवार की रात्रि 11 बजकर 34 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2022 में इन्दिरा एकादशी का व्रत 21 सितम्बर, बुधवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 22 सितम्बर, गुरुवार की प्रातः 06 बजकर 16 से सायं 08 बजकर 46 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय - मध्य-रात्रि 01:17


28 August 2022

हरतालिका तीज व्रत, पूजा विधि, कथा, शुभ मुहूर्त समय, कब है 2022 | Hartalika Teej Vrat, Puja Vidhi, Katha Kab Hai Date

हरतालिका तीज व्रत, पूजा विधि, कथा, शुभ मुहूर्त समय, कब है 2022 | Hartalika Teej Vrat, Puja Vidhi, Katha Kab Hai Date 

hartalika teej vrat katha
Hartalika Teej Vrat
पूजन हेतु निम्न मंत्र का उच्चारण करें-
'ॐ शिवायै नमः' से पार्वती का, 'ॐ नमः शिवाय' से शिव का, 'ॐ षण्मुखाय नमः' से स्वामी कार्तिकेय का, 'ॐ गणेशाय नमः' से गणेश जी का तथा 'ॐ सोमाय नमः' से चंद्रमा का पूजन करें।
 

गौरी गणेश के स्‍वरूपों की पूजा के लिए इस मंत्र का जाप करें

नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं संतति शुभाम्‌।
प्रयच्छ भक्तियुक्तानां नारीणां हरवल्लभे॥
It means "O beloved consort of Lord Shiva, please bestow long life of the husband and beautiful sons to your women devotees". After Goddess Gaura, Lord Shiva, Lord Kartikeya and Lord Ganesha are worshipped.
इसका अर्थ है "हे भगवान शिव की प्रिय पत्नी, कृपया अपनी महिला भक्तों को पति की लंबी उम्र और सुंदर पुत्रों की शुभकामनाएं दें"। देवी गौरा के बाद, भगवान शिव, भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश की पूजा की जाती है।
 
 

हरतालिका तीज व्रत

तीज का व्रत प्रत्येक महिलाओं द्वारा मुख्यतः उत्तरी भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में अत्यंत धूमधाम तथा पूर्ण श्रद्धा से मनाया जाता हैं। श्रावण तथा भाद्रपद के मास में आने वाली तीन प्रमुख तीज इस प्रकार हैं:-
1.    हरियाली तीज,
2.    कजरी तीज, तथा
3.    हरतालिका तीज
इन तीजों के अतिरिक्त सम्पूर्ण वर्ष में आने वाली अन्य प्रमुख तीज इस प्रकार हैं- आखा तीज, जिसे अक्षय तृतीया भी कहते हैं तथा गणगौर तृतीया हैं।
हरतालिका तीज के व्रत को हरतालिका तीजा भी कहा जाता हैं। हरतालिका तीज का व्रत भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष तृतीया तिथि तथा हस्त नक्षत्र के शुभ दिवस किया जाता हैं। हरतालिका तीज हरियाली तीज से एक माह के पश्चात आती हैं तथा मुख्यतः गणेश चतुर्थी के एक दिन पूर्व मनाई जाती हैं। यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्री इस व्रत को रखने में अपना परम सौभाग्य समझती हैं। हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी तथा भगवान श्रीगणेश जी की पूजा का विशेष महत्व हैं।
 

हरतालिका तीज व्रत का महत्व

उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार तथा झारखंड में हरतालिका तीज का व्रत करवाचौथ से भी कठिन माना गया हैं, क्योंकि जहां करवाचौथ में चन्द्र दर्शन करने के पश्चात व्रत सम्पन्न कर दिया जाता हैं, वहीं हरतालिका तीज व्रत में सम्पूर्ण दिवस निराहार एवं निर्जल व्रत किया जाता हैं तथा व्रत के अगले दिवस पूजन के पश्चात ही व्रत का समापन किया जाता हैं। साथ ही एक बार यह व्रत रखने पश्चात जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना अति आवश्यक हैं। यदि व्रती महिला गर्भवती हो या अत्यंत गंभीर रोग की स्थिति में हो तो उसके स्थान पर अन्य कोई महिला या उसका जीवनसाथी भी इस व्रत को रख सकते हैं। गुजरात एवं महाराष्ट्र में भी इस व्रत का पालन किया जाता हैं तथा अगले दिवस गणेश चतुर्थी के पर्व पर गणेश स्थापन किया जाता हैं। कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु में हरतालिका तीज को गौरी हब्बा” के नाम से जाना जाता हैं व माता गौरी का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु गौरी हब्बा के दिन दक्षिण भारत की महिलाएँ “स्वर्ण गौरी व्रत” रखती हैं तथा माता गौरी से सुखी वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं।
 
हरतालिका तीज व्रत की पूजा विधि

हरतालिका पूजा हेतु प्रातः काल का समय सर्वोत्तम माना गया हैं। यदि किसी कारणवश प्रातःकाल पूजा कर पाना संभव नहीं हैं तो प्रदोषकाल में भगवान शिव तथा माता पार्वती के साथ देव गणपति की पूजा करनी चाहिए। हरतालिका तीज की पूजा प्रातः स्नान के पश्चात, नए व सुन्दर वस्त्र पहनकर प्रारम्भ की जाती हैं। हरतालिका व्रत के दिवस कुंवारी कन्याएं तथा सौभाग्यवती महिलाएँ, भगवान शिव तथा माता पार्वती की मिट्टी या रेत के द्वारा अस्थाई प्रतिमा बनाकर गौरी-शंकर की विधिवत पूजा-अर्चना करती हैं तथा सुखी वैवाहिक जीवन तथा संतान की प्राप्ति हेतु प्रार्थना करती हैं। उसके पश्चात हरतालिका व्रत की कथा को सुना जाता हैं। हरतालिका व्रत के दिवस व्रती महिला को शयन करना निषेध हैं, अतः उसे रात्रि में भजन-कीर्तन करते हुए रात्रि जागरण करना चाहिए। प्रातः काल स्नान करने के पश्चात श्रद्धा व भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, खाद्य सामग्री, फल, मिष्ठान तथा यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए।
 

हरतालिका तीज की पौराणिक व्रत कथा

हरतालिका तीज की उत्पत्ति व इसके नाम का महत्व पौराणिक कथा में प्राप्त होता हैं। हरतालिका शब्दहरत  आलिका से मिलकर बना हैं, जिसका अर्थ क्रमशः अपहरण  स्त्रीमित्र अर्थात सहेली होता हैं। हरतालिका अर्थात सहेलियों द्वारा अपहरण करना। हरतालिका तीज की कथा के अनुसार, माता गौरी के पार्वती माँ के स्वरूप में वे भगवान शिव जी को अपने जीवनसाथी के रूप में चाहती थी, जिस कारण पार्वती माँ ने अत्यंत कठोर तपस्या की थी। पार्वतीजी की सहेलियां उनका अपहरण कर उन्हें घने जंगल में ले गई थीं। ताकि पार्वतीजी की इच्छा के विरुद्ध उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से न कर दें। अतः भगवान शिव जैसा जीवनसाथी प्राप्त करने हेतु कुंवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं साथ ही इस व्रत को करने वाली विवाहित स्त्रियां भी पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन व्यतीत करके अंत में उन्हें शिवलोक की प्राप्ति हो जाती हैं।
 

हरतालिका तीज पूजा का शुभ मुहूर्त 2022

इस वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 29 अगस्त, सोमवार की दोपहर 03 बजकर 20 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 30 अगस्त, मंगलवार की दोपहर 03 बजकर 32 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
 
अतः इस वर्ष 2022 में हरतालिका तीज का व्रत 30 अगस्त, मंगलवार के दिन किया जाएगा।
 
इस वर्ष, हरतालिका तीज व्रत के प्रातःकाल पूजा का शुभ मुहूर्त, 30 अगस्त, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 04 मिनिट से 08 बजकर 41 मिनिट तक का रहेगा।

21 August 2022

अजा एकादशी व्रत कब है 2022 | पारण समय तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi Vrat kab hai 2022 date

अजा एकादशी व्रत कब है 2022 | पारण समय तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi Vrat kab hai 2022 date 

aja ekadashi vrat kab hai
Aja Ekadashi Vrat

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान जी को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत करने मन निर्मल बनता हैं, ह्रदय शुद्ध होता हैं तथा आप सदमार्ग की ओर प्रेरित होते हैं। भाद्रपद की कृष्ण एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत को अजा एकादशी के व्रत के नाम से जाना जाता हैं। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में यह व्रत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार अजा एकादशी का व्रत अगस्त या सितम्बर के महीने में आता हैं। अजा एकादशी का व्रत समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला माना गया हैं। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश जी की पूजा विधि-विधान तथा सच्चे मन से एवं पवित्र भावना के साथ करते हैं तथा रात्रि जागरण करते हैं उन्हे इस जन्म एवं पूर्व-जन्म के समस्त पाप-कर्मो से मुक्ति प्राप्त होती हैं तथा मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

अजा एकादशी व्रत का पारण

        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 22 अगस्त, सोमवार की प्रातः 03 बजकर 35 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 23 अगस्त, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 06 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2022 में अजा एकादशी का व्रत 23 अगस्त, मंगलवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, अजा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 24 अगस्त, बुधवार की प्रातः 06 बजकर 08 से 08 बजकर 28 मिनिट तक का रहेगा।

(द्वादशी तिथि समाप्त होने समय :- 08:30 AM)

अजा एकादशी व्रत का महत्व

समस्त उपवासों में अजा एकादशी के व्रत श्रेष्ठतम कहे गए हैं। एकादशी व्रत को रखने वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता हैं। अजा एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हैं। यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा हैं। इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन हैं। इस उपवास के विषय में यह मान्यता हैं कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते हैं। यह उपवास, मन निर्मल करता हैं, ह्रदय शुद्ध करता हैं तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता हैं।


10 August 2022

रक्षा बंधन राखी बांधने का शुभ मुहूर्त कब है 2022 Raksha Bandhan Rakhi Bandhne ka Shubh Muhurat kab hai

rakhi bandhan rakhi bandhne muhurat 2022
Rakhi Bandhne ka Shubh Muhurat 

 रक्षा बंधन राखी बांधने का शुभ मुहूर्त कब है 2022 Raksha Bandhan Rakhi Bandhne ka Shubh Muhurat kab hai

रक्षाबन्धन मन्त्रः (Raksha Bandhan Mantra)

येन बद्धो वली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वा रक्षबध्नामी रक्षे माचल माचल ॥
Yen Baddho bali raja danvendro mahabal,
ten twam RakshBadhnami rakshe machalmachal.
The meaning of Raksha Mantra - "I tie you with the same Raksha thread which tied the most powerful, the king of courage, the king of demons, Bali. O Raksha (Raksha Sutra), please don't move and keep fixed throughout the year."
 

🌷 रक्षाबंधन 🌷

सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम् ।
सकृत्कृते नाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत्।।
 
🙏🏻 इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है ।इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्षभर मनुष्य रक्षित हो जाता हैं। (भविष्य पुराण)
 
रक्षाबंधन का पर्व सनातन भारतवर्ष में मनाये जाने वाले पवित्र तथा प्रमुख त्योहारों में से एक हैं। रक्षाबंधन का पर्व भाई व बहन के अतुल्य स्नेह के प्रतीक के स्वरूप में भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया जाता हैं, जिसमें बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं साथ ही अपने भाई की दिर्ध आयु के लिए प्रार्थना करती हैं तथा भाई अपनी बहनकी रक्षा करने का वचन देता हैं। हिंदुओ में रक्षाबंधन का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ, धूमधाम से मनाया जाता हैं। साथ ही सिख, जैन, तथा लगभग सभी भारतीय समुदायों में यह पर्व बिना किसी रुकावट के तथा प्रेम-भाव के साथ मनाया जाता हैं। रक्षाबंधन के पर्व में रक्षा सूत्र अर्थात राखीका सबसे अधिक विशेष महत्व होता हैं। माना जाता हैं की राखीबहन का अपने भाई के प्रति स्नेह व आदर का प्रतीक होती हैं। रक्षाबंधन का त्योहार सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता हैं जो की अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अगस्त या सितंबर के महीने में आता हैं। रक्षा बंधन के ठीक आठ दिन के पश्चात भगवान् श्री कृष्ण का जन्मदिन अर्थात श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता हैं।
रक्षाबंधन के शुभ दिवस पर प्रत्येक जातक को चाहिए की वह रक्षा सूत्र को भगवान शिव की प्रतिमा के समक्ष अर्पित कर 108 या उस से भी अधिक बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें या शिव के पंचाक्षरी तथा अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करें तथा उसके पश्चात ही रक्षा सूत्र को अपने भाईयों की कलाई पर बांधे। ऐसा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा दृष्टि प्राप्त होती हैं। क्योंकि श्रावण का पवित्र मास सम्पूर्ण प्रकार से भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता हैं।
 

रक्षाबन्धन का शुभ मुहूर्त 2022

इस वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 11 अगस्त, गुरुवार के दिन 10 बजकर 38 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 12 अगस्त, शुक्रवार की प्रातः 07 बजकर 05 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
 
अतः इस वर्ष 2022 में रक्षा-बंधन का पर्व 11 अगस्त, गुरुवार के शुभ दिवस मनाया जाएगा। 
 
इस वर्ष, रक्षाबंधन के त्योहार पर राखी बांधने का सबसे शुभ मुहूर्त 11 अगस्त, गुरुवार की साँय 08 बजकर 52 से 09 बजकर 12 मिनिट तक का रहेगा।
 

यह भी ध्यान रहे की,

१.  रक्षा बन्धन के दिन भद्रा, 11 अगस्त, गुरुवार की साँय 08 बजकर 51 मिनिट पर समाप्त हो जाने के कारण राखी बांधने का शुभ मुहूर्त साँय 08 बजकर 52 मिनिट से साँय 09 बजकर 12 मिनिट तक, तथा पुनः 12 अगस्त की प्रातः 05 बजकर 52 मिनिट अर्थात सूर्योदय होने के साथ ही प्रारम्भ हो कर प्रातः 07 बजकर 05 मिनिट तक अर्थात पूर्णिमा तिथि के समाप्ति तक का रहेगा।
२.  वैदिक मतानुसार अपराह्न का समय राखी बांधने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना गया हैं, जो कि हिन्दु समय गणना के अनुसार दोपहर के पश्चात का समय होता हैं।
३.  यदि अपराह्न का समय भद्रा आदि के कारण उपयुक्त नहीं हैं तो, प्रदोष काल का समय भी रक्षा बन्धन के संस्कार के लिये उपयुक्त माना गया हैं।
४.  हिन्दु धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्यों हेतु भद्रा का त्याग किया जाना चाहिये। अतः भद्रा का समय रक्षा बन्धन के लिये निषिद्ध माना गया हैं।


रक्षाबंधन पर राखी बांधने की संपूर्ण विधि (Raksha Bandhan Par Rakhi Bandhane Ki Sampurn Vidhi)

 
1. रक्षाबंधन के दिन सबसे पहले भाई और बहन को सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान कर लेना चाहिए।
 
2. इसके बाद बहन एक चांदी या स्टील की थाली में रोली, चंदन, अक्षत राखी, मिठाई, घी का दीपक और पानी वाला नारियल लें। जिसके चारो तरफ रोली बंधी हुई हो।
 
3. इसके बाद रक्षाबंधन की इस थाली में घी का दीपक प्रज्वलित करें और फिर सबसे पहले अपने ईष्ट देव की पूजा करके उनकी आरती करें।
 
4. आरती करने के बाद अपने ईष्ट को राखी अर्पित करें। इसके बाद एक चौक बनाए और अपने भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुख करके बैठा एक लकड़ी के पटरे पर बैठा दें।
 
5. इसके बाद भाई अपने सिर पर कोई रुमाल या फिर साफ वस्त्र रख ले।
 
6.इसके बाद भाई को रोली और चंदन का तिलक करें और फिर उस तिलक पर अक्षत लगाएं।
 
7. भाई को तिलक करने के बाद उसकी दाहिनी कलाई पर राखी बांधें।
 
8.जब आप अपने भाई को राखी बांध रही हों तो इस मंत्र को अवश्य बोलें।
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः|
तेन त्वां मनुबध्नामि, रक्षंमाचल माचल ||
 
9. इसके बाद अपने भाई की आरती उतारकर उसे मिठाई खिलाएं और भगवान से उनकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना करें।
 
10. इसके बाद भाई अपनी बहन को उपहार स्वरूप कुछ अवश्य दे और अपनी बहन के पैर अवश्य छुए।

14 July 2022

सावन का महीना कब से शुरू हैं | श्रावण मास सोमवार व्रत कब से हैं 2022 | Sawan Kab se Start hai

सावन का महीना कब से शुरू हैं | श्रावण मास सोमवार व्रत कब से हैं 2022 | Sawan Kab se Start hai 

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Sawan Kab se Start hai

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 करपूर गौरम करूणावतारम, संसार सारम भुजगेन्द्र हारम ।

सदा वसंतम हृदयारविंदे, भवम भवानी सहितं नमामि ॥

जिनका शरीर कपूर के समान गोरा हैं, जो करुणा के अवतार हैं, जो शिव संसार के सार अर्थात मूल हैं। तथा जो महादेव सर्पराज को गले के हार के रूप में धारण करते हैं, ऐसे सदैव प्रसन्न रहने वाले भगवान शिव को मैं अपने हृदय कमल में शिव तथा पार्वती के साथ नमस्कार करता हूँ।

 

सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी-प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा आदि जैसे अनेक व्रत तथा उपवास किए जाते हैं। किन्तु चातुर्मास को व्रतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। चातुर्मास का समय 4 मास की अवधि में होता हैं, जो की आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात प्रबोधिनी एकादशी तक चलता हैं। चातुर्मास के चार मास इस प्रकार हैं:- श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक।

चातुर्मास के प्रथम मास को ही श्रावण मास कहा जाता हैं। श्रावण शब्द, श्रवण से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं सुनना, अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों के ज्ञान को ईश्वर से सुनकर ही ऋषियों ने समस्त प्राणियों को सुनाया था। सावन का महीना भक्तिभाव तथा सत्संग के लिए विशेष होता हैं। सावन के मास में विशेष रूप से भगवान शिव, माता पार्वती तथा श्री कृष्णजी की पूजा-अर्चना की जाती हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण सावन के मास को अत्यंत शुभ व फलदायक माना जाता हैं। अतः भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु समस्त भक्तगण श्रावण मास के दौरान विभिन्न प्रकार से व्रत तथा उपवास रखते हैं।

श्रावण मास के दौरान समस्त उत्तरी भारत के राज्यों में सोमवार का व्रत अत्यंत शुभ माना जाता हैं। कई भक्त सावन मास के प्रथम सोमवार के दिन से ही सोलह सोमवार उपवास का प्रारम्भ करते हैं। श्रावण मास में प्रत्येक मंगलवार भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती माँ को समर्पित होते हैं। श्रावण मास के दौरान मंगलवार का उपवास मंगल-गौरी व्रत के रूप में जाना जाता हैं।

वैसे तो प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की उपासना के लिये उपयुक्त माना जाता हैं किन्तु सावन के सोमवार का महत्व अधिक माना गया हैं। श्रावण के सोमवार व्रत की पूजा भी अन्य सोमवार व्रत के अनुसार की जाती हैं। इस व्रत में केवल एकाहार अर्थात एक समय भोजन ग्रहण करने का संकल्प लिया जाता हैं। भगवान भोलेनाथ तथा माता पार्वती जी की धूप, दीप, जल, पुष्प आदि से पूजा करने का विधान हैं। शिव पूजा के लिये सामग्री में उनकी प्रिय वस्तुएं भांग, धतूरा आदि भी रख सकते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को जल अवश्य अर्पित करना चाहिये। रात्रि में भूमि पर आसन बिछा कर शयन करना चाहिये। सावन के पहले सोमवार से आरंभ कर 9 या 16 सोमवार तक लगातार उपवास करना चाहिये तथा उसके पश्चात 9वें या 16वें सोमवार पर व्रत का उद्यापन अर्थात पारण किया जाता हैं। यदि लगातार 9 या 16 सोमवार तक उपवास करना संभव न हो तो आप केवल सावन के चार सोमवार इस व्रत को कर सकते हैं।

 

सावन के सोमवार का व्रत 2022

इस वर्ष, श्रावण सोमवार का व्रत कब से प्रारम्भ हैं तथा कब तक किया जाएगा?

भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में चंद्र पंचांग के आधार पर श्रावण मास के प्रारम्भ के समय में पंद्रह दिनों का अंतर आ जाता हैं। पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण मास अमांत पंचांग से पंद्रह दिन पहले प्रारम्भ हो जाता हैं। अमांत चंद्र पंचांग का प्रयोग गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में किया जाता हैं, वहीं पूर्णिमांत चंद्र पंचांग का उपयोग उत्तरी भारत के राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखंड में किया जाता हैं। साथ ही, नेपाल तथा उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में तो सावन के सोमवार को सौर पंचांग के अनुसार मनाया जाता हैं। अतः सावन सोमवार की आधी तारीखें दोनों पंचांग में भिन्न-भिन्न होती हैं।

 

सावन सोमवार व्रत 2022

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखण्ड के लिए सावन के सोमवार का व्रत

 

श्रावण सोमवार व्रत 2022

 

श्रावण प्रारम्भ (उत्तर)

14 जुलाई 2022

गुरुवार

 

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत

18 जुलाई 2022

सोमवार

 

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत

25 जुलाई 2022

सोमवार

 

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत

01 अगस्त 2022

सोमवार

 

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत

08 अगस्त 2022

सोमवार

 

श्रावण समाप्त (उत्तर)

12 अगस्त 2022

शुक्रवार

 

 

सावन सोमवार व्रत 2022

गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के लिए सावन के सोमवार का व्रत

 

श्रावण प्रारम्भ (दक्षिण)

29 जुलाई 2022

शुक्रवार

 

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत

01 अगस्त 2022

सोमवार

 

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत

08 अगस्त 2022

सोमवार

 

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत

15 अगस्त 2022

सोमवार

 

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत

22 अगस्त 2022

सोमवार

 

श्रावण समाप्त (दक्षिण)

27 अगस्त 2022

शनिवार



Sawan Somwar Vrat 2022

Monday fast of Sawan for Uttar Pradesh, Rajasthan, Madhya Pradesh, Punjab, Himachal Pradesh, Uttarakhand, Chhattisgarh, Bihar and Jharkhand


Shravan Monday Vrat 2022


Shravan Begins (North)

14 July 2022

Thursday


first shravan monday fast

18 July 2022

monday


Second Shravan Monday fast

25 July 2022

monday


third shravan monday fast

01 August 2022

monday


4th Shravan Monday fast

08 August 2022

monday


Shravan ends (answer)

12 August 2022

Friday



Sawan Somwar Vrat 2022

Sawan Monday fasting for Gujarat, Maharashtra, Andhra Pradesh, Telangana, Goa, Karnataka and Tamil Nadu


Shravan Begins (South)

29 July 2022

Friday


first shravan monday fast

01 August 2022

monday


Second Shravan Monday fast

08 August 2022

monday


third shravan monday fast

15 August 2022

monday


4th Shravan Monday fast

22 August 2022

monday


Shravan ends (South)

27 August 2022

Saturday