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17 June 2024

निर्जला एकादशी कब है 2024 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2024

🕉🌷 निर्जला एकादशी कब है 2024 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2024🔱

nirjala ekadashi vrat kab hai 2024
Nirjala Ekadashi Vrat 

 ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ।।

        वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निर्जल एवं निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती है अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जिसमें व्रत रखकर संपूर्ण वर्ष की सभी एकादशियों जितना पुण्य कमाया जा सकता है। यह है ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी। जिसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इसे पाण्डव एकादशी तथा भीमसेनी या भीम एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से जहां मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं वहीं अनेक रोगों की निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में वृद्घि होती है। जो श्रद्धालु वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं है, उन्हें केवल निर्जला एकादशी उपवास करना चाहिए क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से अन्य सभी एकादशियों का लाभ प्राप्त हो जाता हैं। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने, पूजा तथा दान करने से जातक, जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता है। निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष के दौरान किया जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत मई अथवा जून के महीने में होता है। यह व्रत सभी पापों का नाश करने वाला तथा मन में जल संरक्षण की भावना को उजागर करता है।

             एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

 


ध्यान रहे,

१.            एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।      

२.            यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही होता है।

३.            द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

४.            एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५.            व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।

६.            व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७.            जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।

८.            यदि, कुछ कारणों की वजह से जातक प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 


निर्जला एकादशी व्रत 2024

इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 17 जून, सोमवार की प्रातः 04 बजकर 43 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 18 जून, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 24 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2024 में निर्जला एकादशी का व्रत 18 जून, मंगलवार के दिवस किया जाएगा।

 

इस वर्ष, निर्जला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 19 जून, बुधवार की प्रातः 05 बजकर 44 मिनिट से 07 बजकर 27 मिनिट तक का रहेगा।

पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय - प्रातः 07:27

21 August 2022

अजा एकादशी व्रत कब है 2022 | पारण समय तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi Vrat kab hai 2022 date

अजा एकादशी व्रत कब है 2022 | पारण समय तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi Vrat kab hai 2022 date 

aja ekadashi vrat kab hai
Aja Ekadashi Vrat

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान जी को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत करने मन निर्मल बनता हैं, ह्रदय शुद्ध होता हैं तथा आप सदमार्ग की ओर प्रेरित होते हैं। भाद्रपद की कृष्ण एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत को अजा एकादशी के व्रत के नाम से जाना जाता हैं। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में यह व्रत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार अजा एकादशी का व्रत अगस्त या सितम्बर के महीने में आता हैं। अजा एकादशी का व्रत समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला माना गया हैं। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश जी की पूजा विधि-विधान तथा सच्चे मन से एवं पवित्र भावना के साथ करते हैं तथा रात्रि जागरण करते हैं उन्हे इस जन्म एवं पूर्व-जन्म के समस्त पाप-कर्मो से मुक्ति प्राप्त होती हैं तथा मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

अजा एकादशी व्रत का पारण

        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 22 अगस्त, सोमवार की प्रातः 03 बजकर 35 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 23 अगस्त, मंगलवार की प्रातः 06 बजकर 06 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2022 में अजा एकादशी का व्रत 23 अगस्त, मंगलवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, अजा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 24 अगस्त, बुधवार की प्रातः 06 बजकर 08 से 08 बजकर 28 मिनिट तक का रहेगा।

(द्वादशी तिथि समाप्त होने समय :- 08:30 AM)

अजा एकादशी व्रत का महत्व

समस्त उपवासों में अजा एकादशी के व्रत श्रेष्ठतम कहे गए हैं। एकादशी व्रत को रखने वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता हैं। अजा एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हैं। यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा हैं। इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन हैं। इस उपवास के विषय में यह मान्यता हैं कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते हैं। यह उपवास, मन निर्मल करता हैं, ह्रदय शुद्ध करता हैं तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता हैं।


19 June 2021

निर्जला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2021

निर्जला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi 2021

 

nirjala ekadashi kab hai
Nirjala Ekadashi 

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं, चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत रखकर संपूर्ण वर्ष की प्रत्येक एकादशियों जितना पुण्य कमाया जा सकता हैं। अतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के शुभ दिवस निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता हैं। बिना जल ग्रहण किए करें गए व्रत को “निर्जला व्रत” कहते हैं। निर्जला एकादशी का व्रत किस भी प्रकार के आहार या जल के बिना ही किया जाता हैं। अतः उपवास के कठोर नियमों के कारण प्रत्येक एकादशी के व्रतों में निर्जला एकादशी का व्रत करना अति कठिन माना गया हैं। निर्जला एकादशी से सम्बन्धित पौराणिक कथा के कारण इस व्रत को पाण्डव एकादशी तथा भीम एकादशी या भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं।

पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के प्रभाव से जहां व्रती की प्रत्येक मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं वहीं अनेकानेक रोगों से भी निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में अति वृद्धि होती हैं। जो श्रद्धालु वर्ष की प्रत्येक चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें केवल एक निर्जला एकादशी उपवास अवश्य करना चाहिए, क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से अन्य प्रत्येक एकादशियों का लाभ स्वतः ही व्रती को प्राप्त हो जाता हैं, साथ ही, व्रत के प्रभाव से व्रती की कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सम्पूर्ण यत्न तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ इस व्रत को अवश्य करना चाहिये।

निर्जला एकादशी व्रत को करते समय व्रती भोजन ही नहीं किन्तु जल भी ग्रहण नहीं करते हैं। इस प्रकार यह व्रत हमारे अन्तर्मन में जल संरक्षण की भावना को भी उजागर करता हैं। मान्यता यह भी हैं कि, इस दिवस व्रत रखने, पूजा तथा दान आदि करने से जातक जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता हैं तथा व्रती के प्रत्येक प्रकार के पाप-कर्मो का नाश हो जाता हैं। निर्जला एकादशी के शुभ दिवस भगवान विष्णु जी के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती हैं तथा कैरी का सागार लिया जाता हैं, साथ ही, एकादशी व्रत के सम्पूर्ण समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करना चाहिये।

 

निर्जला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 20 जून, रविवार की साँय 04 बजकर 21 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 21 जून, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में निर्जला एकादशी का व्रत 21 जून, सोमवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, निर्जला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 22 जून, मंगलवार की प्रातः 05 बजकर 58 मिनिट से 08 बजकर 36 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - 10:22


06 February 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021 

shattila ekadashi vrat
shattila ekadashi vrat 

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसके व्रत के दिन “तिल” का विशेष रूप से छ: प्रकार से उपयोग किया जाता हैं। जो की इस प्रकार हैं-

1- तिल से स्नान करना

2- तिल का उबटन लगाना

3- तिल से हवन करना

4- तिल से तर्पण करना

5- तिल का भोजन करना तथा

6- तिलों का दान करना

इस प्रकार, तिलों का छह प्रकार से उपयोग करने के कारण माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता हैं। अपने नाम के अनुसार यह व्रत तिलों से जुडा हुआ हैं, तिल का महत्व सर्वव्यापक हैं तथा हिन्दु धर्म में तिल अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। पूजा में भी तिल का विशेष महत्व होता हैं। माघ मास में शरद ऋतु अपने चरम पर होती हैं तथा यह मास के अंत के साथ ही सर्दियाँ जाने लगती हैं। इस मौसम में तिलों का व्यवहार अत्यंत बढ़ जाता हैं क्योंकि तिल का सेवन सर्दियों में अत्यंत लाभदायक रहता हैं। अतः स्नान, दान, तर्पण, आहार आदि में तिलों का विशेष महत्व होता हैं। जो जातक इस एकादशी का व्रत करता हैं, उसे यथासंभव तिलों से भरा घडा़, लोटा, या गिलास उचित ब्राह्मण को दान करना चाहिए। ऐसी मान्यता हैं की, इस एकदशी के दिन जातक जितने तिलों का दान करेगा उतने ही हज़ार वर्ष तक वह स्वर्गलोक का अधिकारी रहेगा।

 

षटतिला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी, रविवार की प्रातः 06 बजकर 26 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 08 फरवरी, सोमवार की प्रातः 04 बजकर 47 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में षटतिला एकादशी का व्रत 07 फरवरी, रविवार के दिन किया जाएगा।

साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत 08 फरवरी, सोमवार के दिवस किया जाएगा।

 

इस वर्ष, षटतिला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 08 फरवरी, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 51 मिनिट से 04 बजकर 02 मिनिट तक का रहेगा।

हरि वासर समाप्त होने का समय - प्रातः 10 बजकर 25 मिनिट का रहेगा।

 साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत का पारण 9 फरवरी, मंगलवार की प्रातः 07 बजकर 04 मिनिट से 09 बजकर 18 मिनिट तक का रहेगा।

23 January 2021

पौष पुत्रदा एकादशी कब हैं 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Pausha Putrada Ekadashi 2021

पौष पुत्रदा एकादशी कब हैं 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Pausha Putrada Ekadashi 2021

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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका का व्रत प्रतिवर्ष दो बार, पौष तथा श्रावण, के मास में किया जाता हैं। यह व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए रखा जाता हैं। अतः पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी तथा श्रावण मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता हैं। जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती हैं अथवा जो व्यक्ति पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अत्यंत शुभ फलदायक होता हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो जातक एकादशी का व्रत नियमित रखते हैं उन्हें भगवान् श्री नारायण की विशेष कृपा निरंतर प्राप्त होती रहती हैं। पद्म पुराण के अनुसार सांसारिक सुखों की प्राप्ति तथा पुत्र इच्छुक भक्तों के लिए पुत्रदा एकादशी व्रत को विशेष फलदायक माना जाता हैं। अतः संतानहीन या पुत्र हीन जातकों के लिए इस व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा भी होती हैं। अतः महिला वर्ग में इस व्रत का अत्यंत विशेष प्रचलन तथा महत्व हैं। पौष पुत्रदा एकादशी के देवता सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्री विष्णु जी हैं। अतः इस व्रत में भगवान नारायण के बाल-गोपाल स्वरूप का पूजन किया जाता हैं। पौष पुत्रदा एकादशी के व्रत का पालन जो जातक पूर्ण श्रद्धा से करता हैं, उसे भगवान विष्णु से विद्वान, लक्ष्मीवान तथा पुत्रवान होने का वरदान प्राप्त होता हैं।

 

पौष पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 23 जनवरी, शनिवार की रात्रि 08 बजकर 56 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 24 जनवरी, रविवार की रात्रि 10 बजकर 57 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

        अतः इस वर्ष 2021 में पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत 24 जनवरी, रविवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, पौष पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 25 जनवरी, सोमवार की प्रातः 07 बजकर 11 मिनिट से 09 बजकर 19 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - 26 जनवरी दोपहर की 12:24 बजे


11 October 2020

परमा एकादशी कब हैं 2020 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Parama Ekadashi kab hai 2020

परमा एकादशी कब हैं 2020 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Parama Ekadashi kab hai 2020 

parama ekadashi kab hai
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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं, जिसका परम पुण्यकारी व्रत करने से परम दुर्लभ सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं। अतः अधिक मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को “परमा एकादशी” कहा जाता हैं, इस परम पुण्यदायिनी एकादशी को परम एकादशी, पुरुषोत्तमी एकादशी या हरिवल्लभा एकादशी के नाम से भी कहा जाता हैं। सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार परमा एकादशी का व्रत जो मास अधिक हो जाता हैं, उस पर निर्भर करता हैं। अतः परमा एकादशी का उपवास करने हेतु, कोई चन्द्र मास निर्धारित नहीं होता हैं। अधिक मास को मलमास, पुरुषोत्तम मास या लीप का महीना भी कहा जाता हैं। जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता हैं। किन्तु इस मास में पूजा, जप-तप एवं व्रत तथा उपवास करना अत्यंत ही शुभ माना गया हैं। अधिक मास में परम एकादशी पड़ने के कारण ही इस एकादशी का महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता हैं। पुराणों में परम एकादशी व्रत का पुण्यफल अश्वमेध यज्ञ के समान ही बताया गया हैं। इस शुभ दिवस भगवान विष्णु की पूजा करने से दुर्लभ सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं। यह एकादशी, धन की दाता तथा सुख-ऐश्वर्य की जननी परम पावन एवं दुख तथा दरिद्रता का दमन करने वाली एकादशी मानी गयी हैं। इस एकादशी में स्वर्ण का दान, विद्या दान, अन्न दान, भूमि दान तथा गौ-दान करना अति उत्तम माना गया हैं। परमा एकादशी का व्रत भगवान श्री हरी विष्णु जी को अति प्रिय हैं, अतः इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला व्रती जीवनपर्यंत सुख का भोग कर के मरणोपरांत विष्णु लोक को जाता हैं तथा प्रत्येक प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्या का फल भी प्राप्त करता हैं। परम एकादशी के शुभ दिवस, जो भी भक्त, भगवान विष्णु जी की विधिवत पूजा करता हैं तथा व्रत रखता हैं, उसके जीवन के प्रत्येक कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं तथा उसे जीवन में प्रत्येक प्रकार के सुखों की प्राप्ति हो जाती हैं। परमा एकादशी व्रत के दिवस भगवान विष्णु जी के “पुरुषोत्तम स्वरूप” की पूजा की जाती हैं तथा इस दिवस “सावां” अर्थात “मुन्यन्न” (तिन्नी का चावल) का सागार लेना चाहिए।

 

परमा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 अक्तूबर, सोमवार की साँय 04 बजकर 38 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 13 अक्तूबर, मंगलवार की दोपहर 02 बजकर 35 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में परमा अर्थात परम एकादशी का व्रत 13 अक्तूबर, मंगलवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, परमा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 14 अक्तूबर, बुधवार की प्रातः 06 बजकर 28 मिनिट से 08 बजकर 44 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - दोपहर 11:51 

26 September 2020

पद्मिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Padmini Kamla Ekadashi 2020

पद्मिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Padmini Kamla Ekadashi 2020

padmini ekadashi kab hai 2020
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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं, जो की, अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है, अतः मलमास में मनाई जाने वाली इस एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता हैं, इस परम पुण्यदायिनी एकादशी को कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी के नाम से भी कहा जाता हैं। सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत जो महीना अधिक हो जाता है, उस पर निर्भर करता है। अतः पद्मिनी एकादशी का उपवास करने हेतु, कोई चन्द्र मास निर्धारित नहीं है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास या लीप का महीना भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत भगवान श्री हरी विष्णु जी को अति प्रिय है, अतः इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला व्रती जीवनपर्यंत सुख का भोग कर के मरणोपरांत विष्णु लोक को जाता है तथा प्रत्येक प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्या का फल प्राप्त करता है। पद्मिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की पूजा की जाती हैं। इस दिन तिल तथा गुड़ का सागार लेना चाहिए।

 

पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 सितम्बर, शनिवार की साँय 06 बजकर 59 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 27 सितम्बर, रविवार की साँय 07 बजकर 46 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में पद्मिनी अर्थात कमला एकादशी का व्रत 27 सितम्बर, रविवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 28 सितम्बर, सोमवार की प्रातः 06 बजकर 16 मिनिट से 08 बजकर 40 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - 08:58