13 July 2019

कोकिला व्रत | Kokila Vrat | कोकिला व्रत की कहानी | Kokila Vrat Katha in Hindi


कोकिला व्रत | Kokila Vrat | कोकिला व्रत की कहानी | Kokila Vrat Katha in Hindi

Kokila Vrat
हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार समस्त कुंवारी कन्याएं कोकिला व्रत पूर्ण विधि से करती हैं, साथ ही इस व्रत को विवाहिताएँ भी कर सकती हैं। कोकिला व्रत कुमारी कन्या सुयोग्य पति की कामना के लिए करती हैं। इस व्रत के प्रभाव से व्रती को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती हैं। यह व्रत आषाढ़ माह की पूर्णिमा को ही मनाया जाता है। इस व्रत को दक्षिण भारत में अधिक मनाया जाता है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियाँ सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करने के पश्चात सुगंधित इत्र का प्रयोग करती हैं। यह नियम से आठ दिन तक चलता है. प्रातःकाल भगवान भास्कर की पूजा करने का विधान है।

कोकिला व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक कथानुसार जब देवों के राजा दक्ष की बेटी सती अपने पिता के अनुमति के खिलाफ भगवान शिव जी से विवाह कर लेती हैं। जिस कारण राजा दक्ष बेटी सती से नाराज हो जाते हैं। राजा दक्ष भगवान शिव जी के रहन-सहन से घृणा करते थे।
उनको भगवान शिवजी पसंद नहीं थे। इसी कारण राजा दक्ष बेटी सती से सभी सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें सभी देव गण एवम् देवियों को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिवजी तथा देवी सती को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया गया।
भगवान शिव जी माँ सती को बिना बुलाये ना जाने को कहते हैं किन्तु माँ सती उस यज्ञ में शामिल होने अपने पिता के घर पर पहुंच जाती हैं। इस यज्ञ में माँ सती तथा भगवान शिव जी को अपमानित किया जाता हैं। इस कारण माँ सती क्रोध में आकर यज्ञ कुण्ड में अपने शरीर का त्याग कर देती हैं।

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भगवान शिवजी के मना करने के पश्चात यज्ञ में शामिल होने के कारण क्रोध में आकर माँ भगवान शिवजी उन्हें कोकिला बनने का श्राप देते हैं। इस प्रकार माँ सती कोकिला बन 10 हजार वर्षों तक भटकती रहती हैं। इसके पश्चात माँ सती को श्राप से मुक्ति मिलती हैं। अगले जन्म में माँ सती पार्वती का रूप लेकर पुन: अवतरित होती हैं।
इस जन्म में माँ पार्वती कोकिला व्रत को करती हैं। व्रत के प्रभाव से माँ पार्वती का विवाह भगवान शिव जी से होती हैं। अतः यह व्रत कुमारी कन्या के लिए अति फलदायी हैं।

कोकिला व्रत पूजन विधि

इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठें, तथा सूर्योदय से पूर्व दैनिक कार्य से निवृत्त होकर स्नान कर लेना चाहिए। तत्पश्चात पीपल वृक्ष या आँवला वृक्ष के सान्निध्य में भगवान शिव जी एवम् माँ पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करना चाहिए।

भगवान की पूजा जल, पुष्प, बेलपत्र, दूर्वा, धूप,दीप आदि से करें। इस दिन निराहार व्रत करना चाहिए। सूर्यास्त के पश्चात आरती-अर्चना करने के पश्चात फलाहार करना चाहिए। इस प्रकार कोकिला व्रत की कथा सम्पन्न हुई।

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