25 January 2020

गुप्त नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | नवरात्र पारण 2020 | Ghat Sthapana Shubh Muhurat kab hai | Gupt Navratra 2020

गुप्त नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | नवरात्र पारण 2020 | Ghat Sthapana Shubh Muhurat kab hai | Gupt Navratra 2020

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gupt navratri 2020
॥  जय माता दी 
जय श्री कालका माँ

नमो देवी महाविद्ये नमामि चरणौ तव।
सदा ज्ञानप्रकाशं में देहि सर्वार्थदे शिवे॥
        सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
        त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥
         
नवरात्र हिन्दुओं का अत्यंत पवित्र तथा प्रमुख त्यौहार हैं। देवी दुर्गा माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता हैं। मान्यता हैं कि, माताजी स्वयं ही इस चराचर संसार में शक्ति का संचार निरंतर करती रहती हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार प्रत्येक वर्ष में मुख्य दो बार नवरात्र आते हैं, तथा अन्य गुप्त नवरात्र भी आते हैं। प्रथम नवरात्र का प्रारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से होता हैं। तथा अगले नवरात्र शारदीय नवरात्रे कहलाते हैं, जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक रहते हैं। वहीं, गुप्त नवरात्र माघ, पौष तथा आषाढ़ के मास में मनाए जाते हैं। नवरात्र की पूजा नौ दिनों तक होती हैं तथा इन नौ दिनों में माताजी के नौ भिन्न-भिन्न स्वरुपों की पूजा की जाती हैं। माताजी के नौ रूप इस प्रकार हैं- माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा माँ, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, माँ महागौरी तथा सिद्धिदात्रि माँ। ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती हैं। गुप्त नवरात्र के दौरान साधक महाविद्या अर्थात तंत्र साधना के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी तथा कमला देवी की पूजा करते हैं।
जब चातुर्मास में भगवान विष्णु शयन काल की अवधि के बीच होते हैं तब देव शक्तियां क्षीण होने लगती हैं। उस समय पृथ्वी पर रुद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता हैं इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती हैं। इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के स्वरूपों की साधना पूर्ण श्रद्धा से की जाती हैं। मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान देवी के पूजन करने की विधि अन्य नवरात्र के समान ही रहती हैं। नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए प्रतिपदा को घटस्थापना कर प्रतिदिन दोनों पहर मां दुर्गा की पूजा की जाती हैं। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं के पूजन के साथ व्रत का उद्यापन किया जाता हैं अर्थात व्रत का पारण किया जाता हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का संकल्प किया जाता हैं। अतः व्रत का संकल्प लेते समय उसी प्रकार संकल्प लें, जीतने दिन आपको व्रत रखना हैं। व्रत-संकल्प के पश्चात ही घट-स्थापना की विधि प्रारंभ की जाती हैं। घट-स्थापना सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में ही करना चाहिए, ऐसा करने से घर में सुख, शांति तथा समृद्धि व्याप्त रहती हैं।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक पूजा से पूर्व भगवान गणेश जी की पूजा का विधान हैं, अतः नवरात्र की शुभ पूजा से पूर्व कलश के रूप में श्री गणेश महाराज को स्थापित किया जाता हैं। नवरात्र के आरंभ की प्रतिपदा तिथि के दिन कलश या घट की स्थापना की जाती हैं। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता हैं।

कलश स्थापना करते समय इन विशेष नियमो का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

कृपया ध्यान दे:-
1.  नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता हैं, वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में नहीं करना चाहिए।
2.  नवरात्र में कलश स्थापना किसी भी समय किया जा सकता हैं। नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा समय प्रारंभ हो जाता हैं, अतः यदि जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाते हैं तो वे सम्पूर्ण दिवस किसी भी समय कलश स्थापित कर सकते हैं।
3.  कलश स्थापना करने से पूर्व, अपने घर में देवी माँ का स्वागत करने के लिए, घर की साफ-सफाई अच्छे से करनी चाहिए।
4.  नवरात्रों में माँ भगवती की आराधना “दुर्गा सप्तसती” से की जाती हैं, परन्तु यदि समयाभाव हैं तो भगवान् शिव रचित “सप्तश्लोकी दुर्गा” का पाठ अत्यंत ही प्रभाव शाली हैं एवं दुर्गा सप्तसती का पाठ सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाला हैं।
5.  नवरात्रि के दौरान सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। अतः नवरात्रि के दौरान भूमि शयन करना चाहिए तथा सात्त्विक आहार, जैसे कि आलू, कुट्टू का आटा, दूध-दही तथा फल आदि ग्रहण करना चाहिए।


गुप्त नवरात्रि 2020 कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 25 जनवरी, शनिवार की प्रातः 03 बजकर 11 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 26 जनवरी, रविवार की प्रातः 04 बजकर 31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2020 में गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ 25 जनवरी, शनिवार के दिन से हो रहा हैं। तथा यह नवरात्र 04 फरवरी, मंगलवार तक रहेंगे।
नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात 25 जनवरी, शनिवार के दिन माता दुर्गाजी के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा होगी। पार्वती तथा हेमवती भी माँ शैलपुत्री के अन्य नाम हैं।
इस वर्ष 2020 में देवी दुर्गा माताजी का आगमन घोडे पर होगा तथा देवी माँ का गमन भैसां पर होगा।

गुप्त नवरात्रि घटस्थापना (कलश स्थापना) मुहूर्त

इस वर्ष, 2020 में, माघ गुप्त नवरात्रि घट-स्थापना अर्थात कलश स्थापना करने का शुभ मुहूर्त, 25 जनवरी, शनिवार की प्रातः 09 बजकर 53 मिनिट से 10 बजकर 48 मिनिट तक का रहेगा। यदि इस सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में आप कलश स्थापना करेंगे तो यह अति लाभदायक एवं शुभ फलदायक सिद्ध होगा।

गुप्त नवरात्रि पारण

निर्णय-सिन्धु के अनुसार,
अथ नवरात्रपारणानिर्णयः।
सा च दशम्यां कार्या॥

इस वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 02 फरवरी, रविवार की रात्रि 08 बजकर 02 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 03 फरवरी, सोमवार की रात्रि 09 बजकर 19 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष, गुप्त नवरात्रि व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 04 फरवरी, मंगलवार की प्रातः 07 बजकर 07 मिनिट के पश्चात का रहेगा।

अन्य महत्वपूर्ण समय

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अभिजित मुहूर्त:- 11:51-12:49
राहुकाल:-   09:17-10:50
सूर्योदय:- 06:10    सूर्यास्त:- 18:37
चन्द्रोदय:- 06:51   चन्द्रास्त:- 19:37

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धन्यवाद!

24 January 2020

पूर्णिमा का व्रत कब है 2020 में | Purnima Vrat kab hai 2020 Dates List | Pournami Days | Pt Vinod Pandey

पूर्णिमा का व्रत कब है 2020 में | Purnima Vrat kab hai 2020 Dates List | Pournami Days | Pt Vinod Pandey

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पूर्णमासी का व्रत पूर्णिमा के दिवस या पूर्णिमा के एक दिवस पूर्व हो सकता हैं साथ ही, यह पिछले दिवस पूर्णिमा तिथि के प्रारम्भ होने के समय पर निर्भर करता हैं।
पूर्णिमा व्रत तथा श्री सत्यनारायण पूजा जो कि पूर्ण चन्द्रमा के दिवस होते हैं, पूर्णिमा तिथि के एक दिवस पहले भी कर सकते हैं। श्री सत्यनारायण व्रत के दिनों के बारे में जानने के लिए श्री सत्यनारायण पूजा का विडियो देखिये।
पूर्णमासी व्रत पूर्णिमा के दिवस या पूर्णिमा के एक दिवस पहले अर्थात चतुर्दशी के दिवस किया जाता हैं। उपवास का दिवस पूर्णिमा तिथि के प्रारम्भ होने के समय पर निर्भर करता हैं।

पूर्णिमा का व्रत चतुर्दशी के दिवस केवल तब होता हैं जब पूर्णिमा पिछले दिवस मध्याह्न के दौरान ही प्रारम्भ हो जाती हैं। ऐसा माना जाता हैं कि अगर चतुर्दशी मध्याह्न के पश्चात भी व्याप्त रहती हैं तो वह पूर्णिमा तिथि को अशुद्ध कर देती हैं तथा ऐसा चतुर्दशी का दिवस पूर्णिमा उपवास के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। ऐसा होने पर सम्पूर्ण सायंकाल व्यापनी पूर्णिमा वाले दिवस का भी त्याग कर दिया जाता हैं। पूर्णमासी के इस नियम पर कोई मतभेद नहीं हैं।
उत्तरी भारत में जिस दिवस पूर्ण चंद्रमा होता हैं उसे पूर्णिमा कहते हैं तथा दक्षिणी भारत में जिस दिवस पूरा चाँद होता हैं उसे पूर्णामी कहते हैं। दक्षिणी भारत में इस दिवस का उपवास पूर्णामी व्रतम के नाम से जाना जाता हैं। पूर्णामी व्रतम सूर्योदय से प्रारम्भ कर चन्द्रमा के दर्शन तक किया जाता हैं।
पूर्णिमा व्रत के दिवस किन्हीं दो स्थानों के लिए भिन्न-भिन्न भी हो सकते हैं।

2020 में पूर्णिमा के दिन -

10 जनवरी
शुक्रवार
पौष पूर्णिमा व्रत

09 फरवरी
रविवार
माघ पूर्णिमा व्रत

09 मार्च
सोमवार
फाल्गुन पूर्णिमा व्रत

07 अप्रैल
मंगलवार
चैत्र पूर्णिमा व्रत

08 अप्रैल
बुधवार
चैत्र पूर्णिमा

07 मई
गुरुवार
वैशाख पूर्णिमा व्रत

05 जून
शुक्रवार
ज्येष्ठ पूर्णिमा व्रत

04 जुलाई
शनिवार
आषाढ़ पूर्णिमा व्रत

05 जुलाई
रविवार
आषाढ़ पूर्णिमा

03 अगस्त
सोमवार
श्रावण पूर्णिमा व्रत

01 सितम्बर
मंगलवार
भाद्रपद पूर्णिमा व्रत

02 सितंबर
बुधवार
भाद्रपद पूर्णिमा

01 अक्तूबर
गुरुवार
आश्विन अधिक पूर्णिमा व्रत

31 अक्तूबर
शनिवार
आश्विन पूर्णिमा व्रत

29 नवम्बर
रविवार
कार्तिक पूर्णिमा व्रत

30 नवंबर
सोमवार
कार्तिक पूर्णिमा

29 दिसम्बर
मंगलवार
मार्गशीर्ष पूर्णिमा व्रत

30 दिसंबर
बुधवार
मार्गशीर्ष पूर्णिमा

शिवरात्रि कब है | निशीथ काल तिथि मुहूर्त 2020 Shivratri Kab hai Kitne Tarikh ko he?

शिवरात्रि कब है | निशीथ काल मुहूर्त 2020 Shivratri Kab hai Kitne Tarikh ko | शिवरात्रि तिथि

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शिवरात्रि भगवान शिव के सम्मान में मासिक रूप से मनाया जाने वाला एक हिंदू त्योहार है, और विशेष रूप से, शिव के विवाह के दिन का प्रतीक है।

पूजा के मंत्रः-

ॐ नमः शिवाय का जाप या मनन श्रद्धा व ध्यान से।

बिल्वपत्र चढ़ाने का मंत्रः-

नमो बिल्ल्मिने च कवचिने च नमो वर्म्मिणे च वरूथिने च
नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुब्भ्याय चा हनन्न्याय च नमो घृश्णवे॥

शिवरात्रि शिव तथा शक्ति के अभिशरण का विशेष पर्व है। प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मासिक शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार माघ मास की मासिक शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहते हैं। परन्तु पूर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार फाल्गुन मास की मासिक शिवरात्रि को महा शिवरात्रि कहते हैं। दोनों पञ्चाङ्ग में यह चन्द्र मास की नामाकरण प्रथा है जो इसे अलग-अलग करती है। हालाँकि दोनों, पूर्णिमांत तथा अमांत पञ्चाङ्ग एक ही दिन महा शिवरात्रि के साथ सभी शिवरात्रियों को मानते हैं।
शिवरात्रि व्रत प्राचीन काल से प्रचलित है। हिन्दु पुराणों में हमें शिवरात्रि व्रत का उल्लेख मिलता हैं। भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार महा शिवरात्रि के दिन मध्य रात्रि में भगवान शिव लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। प्रथम समय शिव लिंग की पूजा भगवान विष्णु तथा ब्रह्माजी द्वारा की गयी थी। अतः महा शिवरात्रि को भगवान शिव के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है तथा श्रद्धालु लोग शिवरात्रि के दिन शिव लिंग की पूजा करते हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी, इन्द्राणी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री, सीता, पार्वती तथा रति ने भी शिवरात्रि का व्रत किया था।

जो श्रद्धालु मासिक शिवरात्रि का व्रत करना चाहते है, वह इसे महा शिवरात्रि से आरम्भ कर सकते हैं तथा एक वर्ष तक कायम रख सकते हैं। यह माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि के व्रत को करने से भगवान शिव की कृपा द्वारा कोई भी मुश्किल तथा असंभव कार्य पूरे किये जा सकते हैं। श्रद्धालुओं को शिवरात्रि के दौरान जागी रहना चाहिए तथा रात्रि के दौरान भगवान शिव की पूजा करना चाहिए। अविवाहित महिलाएँ इस व्रत को विवाहित होने हेतु एवं विवाहित महिलाएँ अपने विवाहित जीवन में सुख तथा शान्ति बनाये रखने के लिए इस व्रत को करती है।

मासिक शिवरात्रि अगर मंगलवार के दिन पड़ती है तो वह बहुत ही शुभ होती है। शिवरात्रि पूजन मध्य रात्रि के दौरान किया जाता है। मध्य रात्रि को निशिता काल के नाम से जाना जाता है तथा यह दो घटी के लिए प्रबल होती है। प्रत्येक शिवरात्रि के व्रत के लिए शिव पूजन करने के लिए निशिता काल शुभ मुहूर्त को सूचीबद्ध करता है।

भगवान शिव को उनके भोला-भाले स्वभाव के कारण भोलेनाथ के नाम से भी जाना जाता है।

23    जनवरी        गुरुवार        मासिक शिवरात्रि   00:12 से 01:05
21    फरवरी        शुक्रवार       महा शिवरात्रि        00:15 से 01:06
22    मार्च   रविवार       मासिक शिवरात्रि   00:09 से 00:57
21    अप्रैल मंगलवार     मासिक शिवरात्रि   00:03 से 00:48
20    मई     बुधवार       मासिक शिवरात्रि   00:02 से 00:45
19    जून    शुक्रवार       मासिक शिवरात्रि   00:07 से 00:50
18    जुलाई शनिवार      मासिक शिवरात्रि   00:41 से 00:55
17    अगस्त        सोमवार      मासिक शिवरात्रि   00:08 से 00:53
15    सितम्बर      मंगलवार     मासिक शिवरात्रि   23:58 से 00:46
15    अक्तूबर       गुरुवार        मासिक शिवरात्रि   23:48 से 00:38
13    नवम्बर       शुक्रवार       मासिक शिवरात्रि   23:45 से 00:38
13    दिसम्बर      रविवार       मासिक शिवरात्रि   23:55 से 00:44

रोहिणी व्रत कब है 2020 लिस्ट | Rohini Vrat kab hai 2020 Dates List | Jain Calendar Festivals

रोहिणी व्रत कब है 2020 लिस्ट | Rohini Vrat kab hai 2020 Dates List | Jain Calendar Festivals

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॥ ॐ ह्रीं श्रीवासुपूज्य जिनेन्द्राय नम: ॥

रोहिणी व्रत
रोहिणी व्रत जैन समुदाय का एक महत्वपूर्ण दिन है। रोहिणी व्रत का पालन मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु के लिए किया जाता है। नक्षत्र रोहिणी, हिन्दु एवं जैन कैलेण्डर में वर्णित, सत्ताईस नक्षत्रों में से एक है।
जिस दिन सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र पड़ता है, उस दिन यह व्रत किया जाता है। ऐसा माना जाता है, कि जो भी रोहिणी व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करते हैं, वह सभी प्रकार के दुखों एवं दरिद्रता से मुक्त हो जाते हैं। इस व्रत का पारण रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर मार्गशीर्ष नक्षत्र में किया जाता है।
प्रत्येक वर्ष में बारह रोहिणी व्रत होते हैं। आमतौर पर रोहिणी व्रत का पालन तीन, पाँच या सात वर्षों तक लगातार किया जाता है। रोहिणी व्रत की उचित अवधि पाँच वर्ष, पाँच महीने है। उद्यापन के द्वारा ही इस व्रत का समापन किया जाना चाहिए।

2020 रोहिणी उपवास

08 जनवरी 2020
बुधवार
रोहिणी व्रत

04 फरवरी 2020
मंगलवार
रोहिणी व्रत

03 मार्च 2020
मंगलवार
रोहिणी व्रत

30 मार्च 2020
सोमवार
रोहिणी व्रत

26 अप्रैल 2020
रविवार
रोहिणी व्रत

23 मई 2020
शनिवार
रोहिणी व्रत

20 जून 2020
शनिवार
रोहिणी व्रत

17 जुलाई 2020
शुक्रवार
रोहिणी व्रत

13 अगस्त 2020
बृहस्पतिवार
रोहिणी व्रत

10 सितम्बर 2020
बृहस्पतिवार
रोहिणी व्रत

07 अक्तूबर 2020
बुधवार
रोहिणी व्रत

03 नवम्बर 2020
मंगलवार
रोहिणी व्रत

30 नवम्बर 2020
सोमवार
रोहिणी व्रत

28 दिसम्बर 2020
सोमवार
रोहिणी व्रत

संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चन्द्रोदय का समय | Chand Nikalne ka Time | सकट चौथ कब है 2020?

संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चन्द्रोदय का समय | Chand Nikalne ka Time | सकट चौथ कब है 2020?

sankashti chaturthi ka chand kab niklega
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🌷 विघ्नों तथा मुसीबते दूर करने के लिए 🌷

👉 कृष्ण पक्ष की चतुर्थी।
🙏🏻 शिव पुराण में आता है कि प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (पूनम के पश्चात) के दिन प्रातः श्री गणेशजी का पूजन करें तथा रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें तथा ये मंत्र बोलें :
🌷 ॐ गं गणपते नमः ।
🌷 ॐ सोमाय नमः ।

 ‪🌷 चतुर्थी तिथि विशेष 🌷

🙏🏻 चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेशजी हैं।
📆 हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो चतुर्थी होती हैं।
🙏🏻 पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
🙏🏻 शिवपुराण के अनुसार महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥
➡ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली तथा एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।

🌷 कोई कष्ट हो तो 🌷

🙏🏻 हमारे जीवन में बहुत समस्याएँ आती रहती हैं, मिटती नहीं हैं ।, कभी कोई कष्ट, कभी कोई समस्या | ऐसे लोग शिवपुराण में बताया हुआ एक प्रयोग कर सकते हैं कि, कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (मतलब पुर्णिमा के बाद की चतुर्थी ) आती है | उस दिन सुबह छः मंत्र बोलते हुये गणपतिजी को प्रणाम करें कि हमारे घर में ये बार-बार कष्ट तथा समस्याएं आ रही हैं वो नष्ट हों |
👉🏻 छः मंत्र इस प्रकार हैं
🌷 ॐ सुमुखाय नम: : सुंदर मुख वाले; हमारे मुख पर भी सच्ची भक्ति प्रदान सुंदरता रहे ।
🌷 ॐ दुर्मुखाय नम: : मतलब भक्त को जब कोई आसुरी प्रवृत्ति वाला सताता है तोभैरव देख दुष्ट घबराये ।
🌷 ॐ मोदाय नम: : मुदित रहने वाले, प्रसन्न रहने वाले । उनका सुमिरन करने वाले भी प्रसन्न हो जायें ।
🌷 ॐ प्रमोदाय नम: : प्रमोदाय; दूसरों को भी आनंदित करते हैं । भक्त भी प्रमोदी होता है तथा अभक्त प्रमादी होता है, आलसी । आलसी आदमी को लक्ष्मी छोड़ कर चली जाती है । तथा जो प्रमादी न हो, लक्ष्मी स्थायी होती है ।
🌷 ॐ अविघ्नाय नम:
🌷 ॐ विघ्नकरत्र्येय नम:
हिन्दु के अनुसार प्रत्येक चंद्र मास में दो चतुर्थी होती हैं। सनातन हिन्दू ग्रन्थों के अनुसार चतुर्थी तिथि भगवान गणेश की तिथि हैं। अमावस के पश्चात आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं तथा पूर्णिमा के पश्चात आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं।
चतुर्थी के दिन सुबह में गणपतिजी का पूजन करें तथा रात को चन्द्रमा में गणपतिजी की भावना करके अर्घ्य दें तथा ये मंत्र बोलें :
🌷 ॐ गं गणपते नमः ।
🌷 ॐ सोमाय नमः ।

‪🌷 चतुर्थी तिथि विशेष 🌷

🙏🏻 चतुर्थी तिथि के स्वामी भगवान गणेशजी हैं।
📆 हिन्दू कैलेण्डर में प्रत्येक मास में दो #चतुर्थी होती है।
🙏🏻 पूर्णिमा के बाद आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्ट चतुर्थी कहते हैं।अमावस्या के बाद आने वाली शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं।
🙏🏻 शिवपुराण के अनुसार महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्षके। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥
➡ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली तथा एक पक्षतक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।
  
संकष्टी चतुर्थी व्रत 2020 चन्द्रोदय का समय
13 जनवरी 2020
सोमवार
संकष्टी चतुर्थी - सकट चौथ
चन्द्रोदय 20:47

12 फरवरी 2020
बुधवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 21:43

12 मार्च 2020
गुरुवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 21:32

11 अप्रैल 2020
शनिवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 22:26

10 मई 2020
रविवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 22:12

08 जून 2020
सोमवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय21:50

08 जुलाई 2020
बुधवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय21:58

07 अगस्त 2020
शुक्रवार
संकष्टी चतुर्थी, बहुला चतुर्थी
चन्द्रोदय 21:41

05 सितम्बर 2020
शनिवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 20:45

05 अक्तूबर 2020
सोमवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 20:26

04 नवम्बर 2020
बुधवार
संकष्टी चतुर्थी, करवा चौथ
चन्द्रोदय 20:31

03 दिसम्बर 2020
गुरुवार
संकष्टी चतुर्थी
चन्द्रोदय 20:10

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