05 September 2018

अजा एकादशी व्रत विधि | अजा एकादशी व्रत कथा Aja Ekadashi 2018 | Ekadashi Vrat in Hindi | Vinod Pandey

अजा एकादशी व्रत विधि | अजा एकादशी व्रत कथा Aja Ekadashi 2018 | Ekadashi Vrat in Hindi | Vinod Pandey

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वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। भगवानजी को एकादशी तिथि अति प्रिय है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती है अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जिसका व्रत करने मन निर्मल बनता है, ह्रदय शुद्ध होता है तथा आप सदमार्ग की ओर प्रेरित होते है। भाद्रपद की कृष्ण एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत को अजा एकादशी के व्रत के नाम से जाना जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में यह व्रत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार अजा एकादशी का व्रत अगस्त या सितम्बर के महीने में आता है। अजा एकादशी का व्रत समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला माना गया है। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश जी की पूजा विधि-विधान तथा सच्चे मन से एवं पवित्र भावना के साथ करते है तथा रात्रि जागरण करते है उन्हे इस जन्म एवं पूर्व-जन्म के समस्त पाप-कर्मो से मुक्ति प्राप्त होती है तथा मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती है।


अजा एकादशी व्रत का महत्व
समस्त व्रतो में एकादशी का व्रत श्रेष्ठ माना गया हैं। यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा है। भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा है की, अजा एकादशी है का व्रत विधि-विधान के अनुसार रखने से व्रती समस्त पापों से मुक्त हो जाता है तथा इस व्रत की कथा सुनने मात्र से व्रती के मोक्ष-प्राप्ति के द्वार खुल जाते है। एकादशी व्रत को रखने वाले व्रती को अपने चित, इंद्रियों, आहार तथा व्यवहार पर संयम रखना होता है। अजा एकादशी का व्रत व्रती को अर्थ-काम व लोभ त्यागकर, मोक्ष तथा धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक तथा संतुलित जीवन है। यह उपवास, मन निर्मल करता है, ह्रदय शुद्ध करता है तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता है। इस उपवास के विषय में यह मान्यता है कि इस उपवास के फलस्वरुप प्राप्त होने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से प्राप्त होने वाले फलों से भी अधिक होते है।

अजा एकादशी का व्रत करने के लिये रखें यह सावधानियाँ
अजा एकादशी के व्रत के दिन कुछ विशेष सावधानियाँ भी अवश्य रखनी चाहिये अन्यथा व्रत का फल अपेक्षानुसार नहीं प्राप्त होता है। व्रत के दिन तथा दशमी तिथि के दिन ब्रह्मचर्य का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिये। दशमी तिथि की रात्रि में मसूर की दाल खाने से बचना योग्य माना गया है। साथ ही, चने नहीं खाने चाहिए, करोंदे की सब्जी तथा शाक आदि का भोजन करने से भी व्रत के फलों में कमी होती है, इस दिन शहद का सेवन करने से भी एकादशी व्रत के फल क्षीण हो जाते है।

अजा एकादशी व्रत की पूजा विधि

एकादशी के दिन व्रती को प्रात:काल शीघ्र उठना चाहिए। प्रातः उठकर नित्यक्रिया से मुक्त होने के पश्चात, सारे घर की सफाई सही से करनी चाहिए। इसके पश्चात तिल व मिट्टी के लेप का इस्तेमाल करते हुए कुशा से स्नान करना चाहिये। स्नानादि करने के पश्चात व्रती को भगवान श्री हरि विष्णु जी की पूजा करनी चाहिये। भगवान श्री की पूजा करने से पहले एक शुद्ध स्थान पर धान्य रखकर घट स्थापना करनी चाहिए जिसमें कलश को लाल रंग के वस्त्र से सजाना चाहिए तथा स्थापना करने के पश्चात कलश की पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात कलश के ऊपर श्री हरी विष्णु जी की प्रतिमा या मूर्ति को स्थापित कर उनके समक्ष व्रती को संकल्प लेना चाहिए तथा धूप, दीप तथा पुष्पादि से श्री हरि विष्णु जी की पूर्ण श्रद्धा से पूजा करनी चाहिए। किन्तु यदि आपको जीवन में अत्यंत कठिन संघर्ष एवं कष्टों का सामना करना पड़ रहा हो तो अजा एकादशी के विशेष उपाय के लिये आपको किसी योग्य विद्वान ज्योतिषाचार्य से परामर्श प्राप्त कर उनके द्वारा ही पूजा सम्पन्न करवानी चाहिए।

अजा एकादशी व्रत का पारण
        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

ध्यान रहे,
१.              एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।        
२.              यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही होता है।
३.              द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।
४.              एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५.              व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।
६.              व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७.              जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।
८.              यदि, कुछ कारणों की वजह से जातक प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

अजा एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
अजा एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में भी अत्यधिक गुणगान किया गया है। अजा एकादशी व्रत की कथा अत्यधिक पौराणिक है। अजा एकादशी की कथा राजा हरिशचन्द्र से जुडी़ हुई है। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के बारे में तो सम्पूर्ण जगत जानता है। वे अत्यन्त ही साहसी, प्रतापी तथा पूर्ण सत्यवादी राजा थे। कर्त्वयपरायणता का पाठ राजा हरिश्चंद्र की कथा से आज भी प्राप्त किया जाता है। एकादशी की कथा कुछ इस प्रकार है-
        कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण जी से कहा कि “हे भगवान! भाद्रपद कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? कृपा करके इस व्रत की विधि तथा इसका माहात्म्य बताइए”।  सुनकर भगवान कृष्णजी कहने लगे कि “इस एकादशी का नाम अजा एकादशी है। यह व्रत समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला है। जो मनुष्य इस दिन भगवान विष्णु जी की पूजा करता है उसे वैकुंठ की प्राप्ति अवश्य हो जाती है। युधिष्ठिर जी, आप इस व्रत की कथा ध्यानपूर्वक सुनिए”।

प्राचीनकाल में हरिशचंद्र नामक एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। उसे अपनी सत्यता एवं वचन पूर्ति हेतु अपना समस्त राज्य व धन का त्याग करना पड़ा, साथ ही अपनी स्त्री, पुत्र तथा स्वयं को भी बेच देना पड़ा।
        अब वह राजा, एक चांडाल का दास बनकर सत्य को धारण करता हुआ मृतकों के परिजनों से दाह संस्कार के बदले कर वसूली करने का काम करता था। किन्तु किसी प्रकार से सत्य से विचलित नहीं हुआ। वही हरिश्चंद्र की पत्नी को माली के यहां काम करना पड़ा एक दिन की बात है बगीचे में खेल रहे पुत्र रोहिताश को सांप ने काट लिया जिससे उसकी वहीं पर मृत्यु हो गई। कई बार राजा हरिश्चंद्र चिंता के समुद्र में डूबकर अपने मन में विचार करने लगता कि मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, जिससे मेरा उद्धार हो।
        इस प्रकार कई वर्ष बीत गए। एक दिन राजा इसी चिंता में बैठा हुआ था कि ऋषि गौतम वहाँ प्रकट हुए। राजा ने मुनिवर देखकर प्रणाम किया तथा अपनी सारी व्यथा सुनाई। यह बात सुनकर ऋषि गौतम कहने लगे कि राजन तुम्हारे भाग्य से आज से सात दिन पश्चात भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा नाम की एकादशी आएगी, तुम विधिपूर्वक उसका व्रत करो।
        गौतम ऋषि ने कहा कि इस व्रत के पुण्य प्रभाव से तुम्हारे समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे। इस प्रकार राजा से कहकर गौतम ऋषि उसी समय अंतर्ध्यान हो गए। राजा ने उनके कथनानुसार एकादशी आने पर विधिपूर्वक व्रत व जागरण किया। उस व्रत के प्रभाव से राजा के समस्त पाप नष्ट हो गए।
        स्वर्ग से बाजे बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उसने अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी स्त्री को वस्त्र तथा आभूषणों से युक्त देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुन: राज्य प्राप्त हुआ। अंत में वह अपने परिवार सहित स्वर्ग को गया।
        यह सब अजा एकाद्शी के व्रत का प्रभाव था। कहा गया है की, जो मनुष्य इस व्रत को विधि-विधान पूर्वक करते है। तथा रात्रि में जागरण करते है। उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते है। तथा अन्त में स्वर्ग जाते है। इस एकादशी की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेघ यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

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