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योगिनी
एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का
समय | तिथि व शुभ
मुहूर्त | Yogini Ekadashi 2021
Yogini Ekadashi
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन
हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती
हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक
पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान
श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा
शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की
अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में
आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक
ऐसी एकादशी भी हैं,
जिसका व्रत रखने से समस्त पाप-कर्मो का नाश हो जाता हैं तथा भूलोक पर परम-सुख तथा
परलोक सिधारने पर मोक्ष प्रदान करता हैं। अतः असाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को
योगिनी एकादशी कहते हैं। योगिनी एकादशी व्रत तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं। भगवान
श्रीकृष्ण ने कहा हैं योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के
समकक्ष फल प्रदान करता हैं। किसी भी श्राप से मुक्ति प्राप्त करने हेतु, यह व्रत कल्प-वृक्ष के समान हैं। योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से
प्रत्येक प्रकार के चर्म रोगों से मुक्ति प्राप्त होती हैं। व्रती के जीवन में समृद्धि तथा आनन्द की प्राप्ति होती हैं। भगवान श्री हरी विष्णुजी
की कृपादृष्टि प्राप्त करने हेतु उनके प्रत्येक परम भक्तों को एकादशी व्रत करने का
उपाय बताया जाता हैं। योगिनी एकादशी के दिन व्रत रखने से, इस दिवस पूजा तथा दान आदि करने से जातक जीवन
में प्रत्येक प्रकार के सुख का भोग करते हुए, अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता हैं तथा
व्रती के प्रत्येक प्रकार के पाप-कर्मो का भी नाश हो जाता हैं। योगिनी एकादशी के शुभ
दिवस भगवान विष्णु जी के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती हैं तथा मिश्री का सागार
लिया जाता हैं, साथ ही,
एकादशी व्रत के सम्पूर्ण
समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करते रहना चाहिये।
योगिनी
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते
हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत
पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के
अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं। ध्यान रहे, १- एकादशी व्रत का पारण
द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं। २- यदि द्वादशी तिथि
सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही
करना चाहिए। ३- द्वादशी तिथि के
भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं। ४- एकादशी व्रत का पारण
हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। ५- व्रत तोड़ने के लिए
सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं। ६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं
को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। ७- जो भक्तगण व्रत कर
रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी
चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं। ८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए। इस वर्ष, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 04 जुलाई, रविवार की रात्रि 07 बजकर 55 मिनिट से
प्रारम्भ हो कर, 05 जुलाई, सोमवार की रात्रि
10 बजकर 31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी। अतः इस वर्ष 2021 में योगिनी एकादशी का व्रत 05 जुलाई, सोमवार के दिन किया जाएगा। इस वर्ष, योगिनी एकादशी पारण अर्थात व्रत तोड़ने का
शुभ समय, 06 जुलाई, मंगलवार की प्रातः 06
बजकर 02 से 08 बजकर 38 मिनिट तक रहेगा। द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय - मध्यरात्रि
01:02 बजे
निर्जला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत
पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Nirjala Ekadashi
2021
Nirjala Ekadashi
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी
को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना
चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक
एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों
की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं।
भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं,
चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने
वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री
विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि
जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत रखकर संपूर्ण वर्ष की प्रत्येक एकादशियों जितना
पुण्य कमाया जा सकता हैं। अतः ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि के शुभ
दिवस निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता हैं। बिना जल ग्रहण किए करें गए व्रत को “निर्जला
व्रत” कहते हैं। निर्जला एकादशी का व्रत किस भी प्रकार के आहार या जल के बिना ही किया
जाता हैं। अतः उपवास के कठोर नियमों के कारण प्रत्येक एकादशी के व्रतों में
निर्जला एकादशी का व्रत करना अति कठिन माना गया हैं। निर्जला एकादशी से सम्बन्धित
पौराणिक कथा के कारण इस व्रत को पाण्डव एकादशी तथा भीम एकादशी या भीमसेनी एकादशी
के नाम से भी जाना जाता हैं।
पद्मपुराण के अनुसार निर्जला एकादशी व्रत के
प्रभाव से जहां व्रती की प्रत्येक मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं वहीं अनेकानेक
रोगों से भी निवृत्ति एवं सुख सौभाग्य में अति वृद्धि होती हैं। जो श्रद्धालु वर्ष
की प्रत्येक चौबीस एकादशियों का उपवास करने में सक्षम नहीं हैं, तो उन्हें केवल एक निर्जला एकादशी उपवास अवश्य
करना चाहिए, क्योंकि निर्जला एकादशी उपवास करने से अन्य प्रत्येक
एकादशियों का लाभ स्वतः ही व्रती को प्राप्त हो जाता हैं,
साथ ही, व्रत के प्रभाव से व्रती की कीर्ति, पुण्य तथा धन में अभिवृद्धि होती हैं। अतः प्रत्येक व्यक्ति को सम्पूर्ण
यत्न तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ इस व्रत को अवश्य करना चाहिये।
निर्जला एकादशी व्रत को करते समय व्रती भोजन ही
नहीं किन्तु जल भी ग्रहण नहीं करते हैं। इस प्रकार यह व्रत हमारे अन्तर्मन में जल
संरक्षण की भावना को भी उजागर करता हैं। मान्यता यह भी हैं कि, इस दिवस व्रत रखने, पूजा
तथा दान आदि करने से जातक जीवन में सुख-समृद्धि का भोग करते हुए अंत समय में मोक्ष
को प्राप्त करता हैं तथा व्रती के प्रत्येक प्रकार के पाप-कर्मो का नाश हो जाता
हैं। निर्जला एकादशी के शुभ दिवस भगवान विष्णु जी के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की
जाती हैं तथा कैरी का सागार लिया जाता हैं, साथ ही, एकादशी व्रत के सम्पूर्ण समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण
करना चाहिये।
निर्जला
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते
हैं। कोई भी व्रत तब
तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी
व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।
ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व
करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो
एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना
गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत
तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व
हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की
पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।
इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी
तिथि 20 जून, रविवार की साँय 04 बजकर 21 मिनिट से प्रारम्भ
हो कर, 21 जून, सोमवार की दोपहर 01 बजकर
31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः
इस वर्ष 2021 में निर्जला एकादशी का व्रत 21 जून, सोमवार के दिन किया जाएगा।
इस
वर्ष, निर्जला
एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 22 जून, मंगलवार की प्रातः 05 बजकर 58 मिनिट से 08 बजकर 36 मिनिट तक का रहेगा।
षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत
पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021
shattila ekadashi vrat
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी
को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना
चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक
एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा
भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु
जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष
की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार
कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर
हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत
रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक
एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसके व्रत के दिन “तिल” का विशेष रूप से छ:
प्रकार से उपयोग किया जाता हैं। जो की इस प्रकार हैं-
1- तिल से
स्नान करना
2- तिल का उबटन
लगाना
3- तिल से हवन
करना
4- तिल से
तर्पण करना
5- तिल का भोजन
करना तथा
6- तिलों का
दान करना
इस प्रकार, तिलों का छह प्रकार से उपयोग करने के कारण
माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता हैं। अपने नाम के अनुसार
यह व्रत तिलों से जुडा हुआ हैं, तिल का महत्व सर्वव्यापक हैं
तथा हिन्दु धर्म में तिल अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। पूजा में भी तिल का विशेष
महत्व होता हैं। माघ मास में शरद ऋतु अपने चरम पर होती हैं तथा यह मास के अंत के
साथ ही सर्दियाँ जाने लगती हैं। इस मौसम में तिलों का व्यवहार अत्यंत बढ़ जाता हैं
क्योंकि तिल का सेवन सर्दियों में अत्यंत लाभदायक रहता हैं। अतः स्नान, दान, तर्पण, आहार आदि में तिलों
का विशेष महत्व होता हैं। जो जातक इस एकादशी का व्रत करता हैं, उसे यथासंभव तिलों से भरा घडा़, लोटा, या गिलास उचित ब्राह्मण को दान करना चाहिए। ऐसी मान्यता हैं की, इस एकदशी के दिन जातक जितने तिलों का दान करेगा उतने ही हज़ार वर्ष तक वह
स्वर्गलोक का अधिकारी रहेगा।
षटतिला एकादशी व्रत का पारण
एकादशी
के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब
तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।
ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व
करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो
एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना
पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान
के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें
व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए।
हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल
पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण
करना चाहिए।
इस वर्ष माघ
मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी, रविवार
की प्रातः 06 बजकर 26 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 08 फरवरी, सोमवार
की प्रातः 04 बजकर 47 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2021 में षटतिला एकादशी का व्रत 07 फरवरी, रविवार के दिन
किया जाएगा।
साथ
ही, वैष्णव एकादशी का व्रत 08 फरवरी, सोमवार के दिवस
किया जाएगा।
इस वर्ष, षटतिला
एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 08 फरवरी,
सोमवार की दोपहर 01 बजकर 51 मिनिट से 04 बजकर 02 मिनिट तक का रहेगा।
हरि वासर समाप्त होने का समय - प्रातः 10 बजकर 25 मिनिट का रहेगा।
साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत का पारण 9
फरवरी, मंगलवार की प्रातः 07 बजकर 04 मिनिट से
09 बजकर 18 मिनिट तक का रहेगा।
पौष पुत्रदा एकादशी कब हैं 2021
| एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त
| Pausha Putrada Ekadashi 2021
pausha putrada ekadashi vrat kab hai 2021
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी
में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार
सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की
एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती
हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को
एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की।
इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि
सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में
आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक
ऐसी एकादशी भी हैं जिसका का व्रत प्रतिवर्ष दो बार, पौष तथा
श्रावण, के मास में किया जाता हैं। यह व्रत पुत्र प्राप्ति
के लिए रखा जाता हैं। अतः पौष मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पौष पुत्रदा एकादशी
तथा श्रावण मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना
जाता हैं। जिन व्यक्तियों को संतान होने में बाधाएं आती हैं अथवा जो व्यक्ति पुत्र
प्राप्ति की इच्छा रखते हैं उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अत्यंत शुभ फलदायक
होता हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जो जातक एकादशी का व्रत नियमित रखते हैं उन्हें
भगवान् श्री नारायण की विशेष कृपा निरंतर प्राप्त होती रहती हैं। पद्म पुराण के
अनुसार सांसारिक सुखों की प्राप्ति तथा पुत्र इच्छुक भक्तों के लिए पुत्रदा एकादशी
व्रत को विशेष फलदायक माना जाता हैं। अतः संतानहीन या पुत्र हीन जातकों के लिए इस
व्रत को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। इस व्रत के प्रभाव से संतान की रक्षा भी
होती हैं। अतः महिला वर्ग में इस व्रत का अत्यंत विशेष प्रचलन तथा महत्व हैं। पौष
पुत्रदा एकादशी के देवता सुदर्शन चक्रधारी भगवान श्री विष्णु जी हैं। अतः इस व्रत
में भगवान नारायण के बाल-गोपाल स्वरूप का पूजन किया जाता हैं। पौष पुत्रदा एकादशी
के व्रत का पालन जो जातक पूर्ण श्रद्धा से करता हैं, उसे
भगवान विष्णु से विद्वान, लक्ष्मीवान तथा पुत्रवान होने का
वरदान प्राप्त होता हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण
एकादशी
के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब
तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।
ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व
करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो
एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना
पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान
के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें
व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए।
हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल
पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण
करना चाहिए।
इस वर्ष पौष
मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 23 जनवरी, शनिवार
की रात्रि 08 बजकर 56 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 24 जनवरी, रविवार
की रात्रि 10 बजकर 57 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2021 में पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत 24 जनवरी, रविवार के दिन
किया जाएगा।
इस वर्ष, पौष
पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 25
जनवरी, सोमवार की प्रातः 07 बजकर 11 मिनिट से 09 बजकर 19 मिनिट
तक का रहेगा।
द्वादशी समाप्त होने का समय - 26 जनवरी दोपहर की 12:24 बजे
इन्दिरा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत
पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Indira Ekadashi 2020
indira-ekadashi
वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू
पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं,
किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक
एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता है तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी
होती है। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता है। भगवानजी को एकादशी
तिथि अति प्रिय मानी गई है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण
एकादशी के दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती
है, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने
वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, एवं रात्री जागरण करते है। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी
एकादशी भी है जो की श्राद्ध पक्ष की एकादशी दिन आती है, तथा
इस एकादशी के व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती हैं। यह पितरों को
सद्गति देनेवाली एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। जो की, आश्विन
मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। इस एकादशी की महत्वपूर्ण बात यह
है कि यह पितृपक्ष में आती है जिस कारण इसका महत्व अत्यंत अधिक हो जाता है।
मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज़ जाने-अंजाने हुए अपने पाप कर्मों के कारण यमदेव के
पास अपने कर्मों का दंड भोग रहे हैं, तो इस एकादशी पर
विधिपूर्वक व्रत कर इसके पुण्य को उनके नाम पर दान कर दिया जाये तो उन्हें मोक्ष प्राप्त
हो जाता है तथा मृत्यु के उपरांत व्रती भी बैकुण्ठ में निवास करता है।
इन्दिरा
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते
हैं। कोई भी व्रत तब तक
पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी
व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।
ध्यान
रहे,
१-
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२-
यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण
सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान
माना गया हैं।
४-
एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५-
व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत
तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से
पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी
तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल
पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण
करना चाहिए।
इस वर्ष,आश्विन
मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 13सितम्बर, रविवार की प्रातः 04
बजकर 13 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 14 सितम्बर, सोमवार की प्रातः 03 बजकर
16 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2020 में इन्दिरा एकादशी का व्रत 13 सितम्बर, रविवार के दिन किया जाएगा।
इस वर्ष, इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत
तोड़ने का शुभ समय, 14 सितम्बर, सोमवार
की दोपहर 01 बजकर 36 से सायं 04 बजकर 04 मिनिट
तक का रहेगा।
योगिनी
एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी
तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Yogini Ekadashi 2020
yogini ekadashi kab hai
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन
हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती
हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक
पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान
श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा
शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की
अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में
आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक
ऐसी एकादशी भी हैं,
जिसका व्रत रखने से समस्त पाप-कर्मो का नाश हो जाता हैं तथा भूलोक पर परम-सुख तथा
परलोक सिधारने पर मोक्ष प्रदान करता हैं। अतः असाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को
योगिनी एकादशी कहते हैं। योगिनी एकादशी व्रत तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं। भगवान
श्रीकृष्ण ने कहा हैं योगिनी एकादशी का व्रत 88 हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने के
समकक्ष फल प्रदान करता हैं। किसी भी श्राप से मुक्ति प्राप्त करने हेतु, यह व्रत कल्प-वृक्ष के समान हैं। योगिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से
प्रत्येक प्रकार के चर्म रोगों से मुक्ति प्राप्त होती हैं। व्रती के जीवन में समृद्धि तथा आनन्द की प्राप्ति होती हैं।
भगवान श्री हरी विष्णुजी
की कृपादृष्टि प्राप्त करने हेतु उनके प्रत्येक परम भक्तों को एकादशी व्रत करने का
उपाय बताया जाता हैं। योगिनी एकादशी के दिन व्रत रखने से, इस दिवस पूजा तथा दान आदि करने से जातक जीवन
में प्रत्येक प्रकार के सुख का भोग करते हुए, अंत समय में मोक्ष को प्राप्त करता हैं तथा
व्रती के प्रत्येक प्रकार के पाप-कर्मो का भी नाश हो जाता हैं। योगिनी एकादशी के शुभ
दिवस भगवान विष्णु जी के त्रिविक्रम स्वरूप की पूजा की जाती हैं तथा मिश्री का सागार
लिया जाता हैं, साथ ही,
एकादशी व्रत के सम्पूर्ण
समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करते रहना चाहिये।
योगिनी
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते
हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत
पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के
अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।
ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण
द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि
सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही
करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के
भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण
हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए
सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं
को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर
रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी
चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।
इस वर्ष, आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 16 जून, मंगलवार की प्रातः 05 बजकर 39 मिनिट से
प्रारम्भ हो कर, 17 जून, बुधवार की
प्रातः 07 बजकर 49 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2020 में योगिनी एकादशी का व्रत 17 जून, बुधवार के दिन किया जाएगा।
इस वर्ष, योगिनी एकादशी पारण अर्थात व्रत तोड़ने का
शुभ समय, 18 जून, गुरुवार की प्रातः 05
बजकर 47 से 08 बजकर 24 मिनिट तक रहेगा।
वरुथिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत
पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Varuthini
Ekadashi 2020 #EkadashiVrat
varuthini ekadashi vrat
वैदिक विधान कहता हैं
कि, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में
एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां
आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या
26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक
एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी
माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह
कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले
प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान
श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही
रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी
हैं जिस एकादशी व्रत के दिवस भगवान श्री विष्णु जी के
वराह अवतार की पूजा की जाती हैं। अतः वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी “वरुथिनी एकादशी” कहलाती हैं। वरुथिनी एकादशी को बरूथिनी ग्यारस भी कहा जाता हैं। इस व्रत
को करने से जातक को सुख तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं। इस व्रत के दिन दान
करने से कन्यादान तथा हजारों वर्षों के तपस्या के समान फल की प्राप्ति होती हैं
तथा प्रत्येक प्रकार के दु:ख दूर हो जाते हैं। मनुष्य इस लोक के प्रत्येक सुख भोग
कर अंत मे स्वर्गलोक को प्राप्त होता हैं। वरुथिनी एकादशी व्रत से अभागिनी स्त्री
को भी सौभाग्य प्राप्त होता हैं। कथा के अनुसार वरूथिनी एकादशी के प्रभाव से ही
राजा मान्धाता को स्वर्ग की प्राप्ति हुयी थी। वरूथिनी एकादशी का फल दस हजार वर्ष
तक तपस्या करने के समान माना गया हैं। सूर्यग्रहण के समय स्वर्णदान करने से जो फल
प्राप्त होता हैं वही फल वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त हो जाता हैं। इस
व्रत का फल गंगा स्नान के फल से भी अधिक माना गया हैं। वरूथिनी एकादशी के दिन
भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए तथा इस दिन खरबूजे का सागर लेना चाहिए।
वरुथिनी
एकादशी व्रत का पारण
एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते
हैं। कोई भी व्रत तब तक
पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी
व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।
ध्यान
रहे,
१-
एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२-
यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण
सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान
माना गया हैं।
४-
एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५-
व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत
तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से
पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी
तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल
पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण
करना चाहिए।
इस वर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की
एकादशी तिथि 17 अप्रैल, शुक्रवार की साँय 08 बजकर
03 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 18 अप्रैल, शनिवार की रात्रि 10 बजकर 16 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः
इस वर्ष 2020 में वरुथिनी एकादशी का व्रत 18 अप्रैल,शनिवार
के दिन किया जाएगा।
इस
वर्ष, वरुथिनी एकादशी व्रत
का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 19 अप्रैल, रविवार की प्रातः 06 बजकर 08 मिनिट से 08 बजकर 36 मिनिट तक का रहेगा।
द्वादशी समाप्त होने का समय –00:42 मध्यरात्रि
वरुथिनी
एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?
सनातन हिन्दू
पंचाङ्ग के अनुसार वरुथिनी एकादशी का व्रत सम्पूर्ण उत्तरी भारत-वर्ष में पूर्णिमांत
पञ्चाङ्ग के अनुसार वैशाख मास के कृष्ण पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। साथ
ही गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार यह व्रत चैत्र
मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। वहीं,
अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत मार्च या अप्रैल के महीने में आता हैं।