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06 October 2018

बच्चों को अनुशासन कैसे सिखाया जाय?

बच्चों को अनुशासन कैसे सिखाया जाय?

बच्चों को आज्ञापालक और अनुशासित बनाने का काम महत्वपूर्ण होते हुए बड़ा पेचीदा भी है। हमारे देश में बहुत कम ही माँ -बाप, अभिभावक - गण इस सम्बन्ध में अपना कर्तव्य निभा पाते हैं। अधिकाँश तो जीवन भर बच्चों की अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता के प्रति शिकायत ही करते रहते हैं। आधुनिक बाल - मनोविज्ञान और बाल शिक्षण पद्धति भी केवल पढ़ने - लिखने की बात रह गई है। पारिवारिक जीवन में इसका उपयोग नहीं के बराबर ही होता है।

बच्चों को अनुशासन सिखाने, अपनी आज्ञा मनवाने का प्रायः सभी लोग एक ही रास्ता अपनाते हैं, वह है, मार -पीट या डाँटना - डपटना। सजा देकर बच्चों में अच्छी आदतें पैदा करने की एक परिपाटी - सी पड़ गई है। लेकिन बच्चों को सुधारने के लिए सजा देना बहुत पुराना नियम पड़ गया है। आज के विकसित युग में तत्सम्बन्धी खोज अनुभवों ने इसे व्यर्थ और अव्यावहारिक सिद्ध कर दिया है। बाल-मनोविज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि सजा के द्वारा बच्चों को सुधारने से समस्या जटिल बनती है। बच्चों का व्यक्तित्व संकुचित, अविकसित बनता है।
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि बच्चा किसी भी बात को स्थायी रूप से तभी सीख पाता है, जब वह उसके बारे में सोचता है और यह निर्णय करता है कि ऐसा करना अच्छा है। कोई बालक घर से बाहर आवारा घूमता है, माँ बार-बार चिल्लाती है, लेकिन वह नहीं मानता, न घर का काम करता, न पढ़ने में मन लगाता है। इस बात पर उसे पीटा जाय या अनुनय विनय की जाय तो वह नहीं मानेगा। भय के मारे कुछ समय वैसा न भी करेगा, लेकिन भय का कारण दूर हुआ कि वह फिर वैसा ही करने लगता है। लेकिन जब वह समझ लेता है कि आवारा घूमना, माँ का कहना न मानना बुरा है तो फिर ऐसा वह नहीं करेगा। घर के सामान को खराब करने से बालक भय के आधार पर सदा सर्वदा नहीं रोका जा सकता, लेकिन जब वह जान लेता है कि सामान खराब करने से अपना ही नुकसान होता है तो वह ऐसा नहीं करेगा।
बाल-मनोविज्ञान इसी बात पर बल देता है कि बालक को कोई काम सिखाने के लिए उसके साथ जोर-जबर्दस्ती से काम लेने की आवश्यकता नहीं है, अपितु उसकी उपयोगिता, महत्ता को समझने-बूझने की स्थिति पैदा की जाय, जब बालक किसी बात के बारे में सही-सही सोच समझ लेता है तो फिर उसे सीख भी जल्दी ही लेता है। जो बुरा होता है, उसे जल्दी ही छोड़ देता है। बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए हमें इसी आधार को लेकर चलना होगा। यद्यपि यह मार्ग अधिक कठिन है, इसके लिए अभिभावकों में अधिक बुद्धि, विवेक, चातुर्य, सूक्ष्म-दृष्टि होने की आवश्यकता है, तभी वे ऐसा करने में सफल हो सकते हैं। इसमें समय भी लगता है, प्रयत्न भी कई ढंग से करने होते हैं तथापि स्थायी समाधान के लिए यह सर्वोपरि मार्ग है।
बहुत से माँ-बाप इसके लिए प्रतीक्षा न कर अधिक पचड़े में न पड़कर सीधे-सरल मार्ग से सजा देकर बच्चों को सुधारने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन इससे बच्चे बहुत बार सुधरने के बजाय बिगड़ते ही अधिक हैं या उनका वह सुधार बहुत ही कम स्थायी होता है। दण्ड के भय का कारण दूर होते ही बालक फिर वैसा ही करने लगता हैं, अथवा वह विद्रोही बन जाता है। उसमें कई मानसिक विकृतियाँ पैदा हो जाती है और ये सभी उसके व्यक्तित्व को दूषित कर देते हैं।
अक्सर बच्चों की तरफ से शिकायत होती है कि वे समय पर नहीं उठते, न समय पर पढ़ते हैं। वे अस्त - व्यस्त जीवन बिताते हैं। उनके खेलने, खाने- पीने, पढ़ने आदि का कोई क्रम नहीं है, तो भी बार-बार बच्चों को डाँटना-डपटना ठीक नहीं। बच्चों के लिए दिन भर का एक कार्य-क्रम निश्चित कर देना आवश्यक है। बच्चा जब थोड़ा-बहुत समझने लगे तो उनकी एक मोटी-सी दिनचर्या बना दे और उसके अनुसार बालक को चलने का अभ्यास डालें। स्मरण रहे दिनचर्या के नियम बनाते समय उसका श्रेय-महत्व बालक को देते हुए उसकी राय माँगें। अपने लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रम में बच्चा जब स्वयं रुचि लेता है, तो उसे भली प्रकार निभाता भी है। कदाचित बालक निश्चित कार्यक्रम में भूल करे तो उसे संकेत कर देना चाहिए, जिससे बालक अपनी भूल को ठीक कर सके। किसी विशेष अवसर पर या परिस्थितिवश आवश्यकता पड़ने पर नियमित कार्यक्रम में हेर फेर भी किया जा सकता है। लेकिन बच्चे को नियमित क्रम-बद्ध जीवन-यापन का अभ्यास शुरू से ही कराना चाहिए।
बालक कोई भी गलत काम करे, उसे देखकर टालना नहीं चाहिए। तुरन्त बालक की भूल सुधार कर देना आवश्यक है, अन्यथा बार बार एक तरह की गल्ती दुहराते रहने पर उसका अभ्यास पड़ जाता है और उसे ठीक करना कठिन हो जाता है। जैसे बालक पहली बार माचिस से खेलता हुआ पाया जाय तो उसे तुरन्त प्यार से यह समझा दिया जाय --”इससे आग लग जाती है और जल जाते हैं, इससे नहीं खेला करो, खिलौनों से खेलो।” और फिर बालक को खिलौने देकर उस ओर लगा देना चाहिए। जो माँ-बाप पहले तो प्यार-वश या लापरवाही वश एक लम्बे समय तक बालक की भूलों को टालते रहते हैं, उस पर ध्यान नहीं देते और आगे चलकर जब बच्चे बड़े -बड़े नुकसान करने लगते हैं तो उन्हें मना करते हैं, रोकते हैं, लेकिन उनका अभ्यास ऐसा पड़ जाता है कि अब वे कहना नहीं मानते । अतः अनुशासन की सीख प्रारम्भ से ही बालक को छोटी -छोटी भूल सुधार के माध्यम से देना आवश्यक है।
जिन वस्तुओं से बच्चों को खतरा हो अथवा कीमती वस्तुएँ जिन्हें बालक तोड़ता - फोड़ता हो, ऐसी हालत में अच्छा यह है कि बच्चे की निगाह चुका कर अथवा उसका ध्यान खिलौने आदि में अन्यत्र लगाकर उन वस्तुओं को एक तरफ रख दिया जाय, जहाँ बालक की निगाह उन पर न पड़े। सीधे रूप में मना कर करने पर बालक नहीं मानेगा।
बात - बात पर बच्चों को नकारात्मक आदेश भी नहीं देने चाहिएं। बालक कुछ करें और बाद में उससे ‘ना’ कहना पड़े, उसके पूर्व ही उसे रोक लेना चाहिए। क्योंकि किसी भी काम में जब बालक मनोयोगपूर्वक लग जाता है, तब उसे मना करने पर वह कई बार नहीं मानता। अतः अच्छा यही है कि उसे काम में लगने से पूर्व ही रोक लेना चाहिए। बार-बार मना करने पर बालक की एकाग्रता, मनोयोग नष्ट होता है। उसका जीवन निराशाजनक विचारों से भर जाता है। अतः आवश्यकता पड़ने पर ही बालक पर ‘ना’ का प्रयोग करना चाहिए। वह भी बड़े स्नेह के साथ।
बच्चों से झूठे वायदे कभी न करें। इससे वह अपने माँ -बाप की हर बात पर अविश्वास करने लगते हैं फिर उपयुक्त बात भी वह नहीं मानता। बच्चे के स8 जो वायदा किया जाय, उसे पूरा अवश्य करें। जिन्हें आप पूरे न कर सकें ऐसे वायदे कभी भी न करें।
क्रोध, झुँझलाहट, चिड़चिड़ाहट के द्वारा बच्चों को अनुशासन सिखाने का प्रयत्न न करें। इनसे बच्चों का सहज उत्साह नष्ट हो जाता है। वह मूक पशु की तरह बिना कोई ‘न चय’ किए के आदेश पालन करने लगता है। उसकी वैयक्तिक स्वतन्त्र प्रतिभा कुन्द हो जाती है। वह असमय में ही कृत्रिम अनुशासन पालन करने के प्रयत्न में अधिक धीर-गम्भीर सोच-विचार करने वाला बन जाता है, जो स्वस्थ दशा नहीं कही जा सकती।
बच्चों को अनुशासित रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता इस बात की है कि स्वयं माता-पिता भी अपने जीवन में अनुशासित रहें। नियमित व्यवस्थित जीवन बितायें। जो माँ -बाप स्वयं देर से उठें और बच्चों से कहें जल्दी उठो, स्वयं खेलने, घूमने-फिरने में समय बर्बाद करें और बच्चों से कहें- ‘पढ़ों समय खराब न करो’ उनकी आज्ञा बालक नहीं मानेंगे। अभिभावकों को चाहिए कि अपने स्वयं के आचरण, व्यवहार, जीवन पद्धति से बच्चों को अनुशासन की सीख दें।

15 March 2018

#परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाने वाले कुछ सरल से #उपाय | Top ten #tips and tricks for good #study 2

#परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाने वाले कुछ सरल से #उपाय | Top ten #tips and tricks for good #study 2




नमस्कार! विद्यार्थियो, आपका हार्दिक स्वागत हैं!

विद्यार्थियों के उज्जवल भविष्य के लिए हम सदैव अच्छी से अच्छी सुविधाए उपलब्ध कराने का निरंतर प्रयास करते रहते हैं। हमारी यही इच्छा होती है कि हमारी संतान परीक्षा में सर्वप्रथम उत्तीर्ण होकर हमारा नाम रोशन करे, इसलिए हम कोई कमी नहीं रहने देते। कई बार देखा गया है की, विद्यार्थियों के कठिन परिश्रम के पश्यात भी उन्हें अपेक्षित परिणाम नहीं प्राप्त होता है। ऐसी परिस्थिति में, हम विचारमग्न हो जाते है कि आखिर कमी कहां रह गई? आज हम इसी विषय में जानकारी ले कर आये है।
 
दोस्तों, आज हम आपको बताएँगे, परीक्षा में अच्छे नंबर दिलाने वाले कुछ सरल से किन्तु अत्यंत प्रभावशाली उपाय, जिन्हें करने से विद्यार्थीयों के उज्जवल भविष्य का निर्माण होगा!

अच्छी पढ़ाई के लिए आप हमारा यह विडियो आखिर तक देखे, तथा आपके दोस्तों को शेयर अवश्य करे!

उपाय-

1)                अध्ययन कक्ष घर के पश्चिम-मध्य क्षेत्र में बनाना अति लाभ-दायक सिद्ध होगा। इस दिशा में बुध, गुरु, चंद्र एवं शुक्र - यह चार ग्रहों से अति-उत्तम प्रभाव प्राप्त होता है। इस दिशा के कक्ष में अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को बुध ग्रह से बुद्धि तथा ज्ञान प्राप्त होता है, वही, गुरु ग्रह से महत्वाकांक्षा, जिज्ञासा एवं विचारों में वृद्धि प्राप्त होती है, चंद्र ग्रह से नवीन विचारों की शक्ति प्राप्त होती है तथा शुक्र ग्रह से प्रतिभा एवं लेखन कला में निपुणता तथा धन वृद्धि प्राप्ति है।

2)                अध्ययन कक्ष में मेज पूर्व-उत्तर के कोण अर्थात ईशान दिशा या पश्चिम दिशा में रखनी चाहिए। जिससे विद्यार्थी का मन पढ़ाई में अधिक लगेगा। दक्षिण तथा वायव्य के कोण में अध्ययन कक्ष की मेज भूलकर भी नहीं चाहिए। ऐसा करने से विद्यार्थी का ध्यान पढ़ाई में केन्द्रित नहीं हो पायेगा तथा मन में नकारात्मक विचार आना प्रारंभ हो जायेंगे।
 
3)                अध्ययन कक्ष की मेज गोलाकार या अंडाकार की जगह, आयताकार होनि चाहिए। आयताकार मेज पुस्तकों के आकार की होती है, तथा इस आकर की मेज पर पढ़ाई के लिए आवश्यक सामग्री आसानी से रख पाना संभव होता है। आयताकार मेज पर पढ़ाई करना अति उत्तम परिणाम देने में सहायक होगा।

4)                अध्ययन कक्ष की मेज पर विश्व का ग्लोब रखना अच्छा माना गया है। ग्लोब को प्रतिदिन पढाई के अंतराल में घुमाना चाहिए, इससे विश्व के प्रति मित्र-भाव उत्पन्न होता है तथा विद्यार्थी के दिमाग में अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा उत्पन्न होने लगती है, तथा विद्यार्थी पहले से अधिक समय तक पढ़ाई करने में सक्षम बनेगा।

5)                अक्सर देखा गया है की विद्यार्थियों की मेज के ऊपर रैक बनी होती है, यह पढ़ाई के लिए अत्यंत हानिकारक होती है। रेक के कारण विद्यार्थी के सिर पर, पढ़ाई के समय बोझ महसूस होता है। बोझ के कारण विद्यार्थी पढ़ाई में ध्यान केन्द्रित नहीं कर तथा परीक्षा में कम नंबर प्राप्त करता है।

6)                अध्ययन कक्ष की मेज के ऊपर का रंग सफेद या दूधिया होना अति उत्तम है। यदि इस रंग की मेज आपके पास उपलब्ध ना हो, तो आप इस रंग की चादर का उपयोग कर सकते है। सफ़ेद रंग से आँखों को पढ़ाई करने में आसानी होती है तथा विद्यार्थी का मन शांत रहता है जिससे वह बिना रुकावट के लम्बे समय तक पढ़ाई कर पाता है।

7)                अध्ययन कक्ष में केवल अध्यात्म ध्यान, वाचन, स्वाध्याय, चर्चा एवं अध्ययन ही करना चाहिए। अनुपयोगी गपशप, भोग-विलास की चर्चा, निंदनीय बातें एवं फ़िल्मी बातें, यह सब भूल कर भी ना करे। ऐसा करने से विद्यार्थी का ध्यान भटकता रहेगा, वह सदेव अन्य बातो में विचारमग्न रहने लगेगा तथा परीक्षा में अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं कर पायेगा।

8)                अध्ययन कक्ष की मेज पर अध्ययन करते समय केवल आवश्यक पुस्तक ही रखें। एक समय पर केवल एक ही विषय की पढ़ाई करे। किताबो को अस्तव्यस्त फैला कर रखे। ऐसा करने से आप स्थिर पढ़ाई नहीं कर पाएंगे। मन अन्य विषयों के बारे में सोचता रहेगा, जिससे आपका ध्यान केन्द्रित नहीं हो पायेगा।

9)                अध्ययन कक्ष की मेज पर पानी से भरा एक गिलास अवश्य रखना चाहिए। पानी वातावरण की सारी नकारात्मक तरंगों को सोख लेता है, तथा निरंतर सकारात्मक उर्जा उत्पन्न करता रहता है। इसका अन्य लाभ यह है की, ध्यानं केन्द्रित कर के अभ्यास करते समय यदि विद्यार्थी को पानी की आवश्यकता हुयी तो उसे शीघ्र पानी प्राप्त हो जायेगा तथा उसका ध्यान विचलित नहीं होगा।

10)          अध्ययन कक्ष की मेज पर बंद घड़ी, टूटे-फूटे सामान, ख़राब हो चुके पेन, धारदार चाकू, हथियार औजार या कचरा नहीं रखना चाहिए। यह सभी सामान स्वत ही विद्यार्थी के पढ़ाई पर नकारात्मक असर दिखाते है। इन सभी अनुपयोगी सामग्री को अध्ययन कक्ष से बहार ही रखना चाहिए।

आवश्यक सुचना- जल्द ही हम इस विडियो का दूसरा भाग भी अपलोड करेंगे, अभी के लिए बस इतने ही उपाय, दोस्तों चेन्नल को तुरंत ही सब्सक्राइब कर ले, ताकि आप आगे आने वाले विडियो को आसानी देख पाए।
आपको जो उपाय पसंद आये वह आप कर सकते हैं, साथ ही साथ कड़ी मेहनत करे आप जरूर सफल होंगे, क्योकि मेहनत से बड़ा कोई उपाय नहीं हैं।