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11 October 2020

परमा एकादशी कब हैं 2020 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Parama Ekadashi kab hai 2020

परमा एकादशी कब हैं 2020 | तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Parama Ekadashi kab hai 2020 

parama ekadashi kab hai
parama ekadashi kab hai

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं, जिसका परम पुण्यकारी व्रत करने से परम दुर्लभ सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं। अतः अधिक मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी को “परमा एकादशी” कहा जाता हैं, इस परम पुण्यदायिनी एकादशी को परम एकादशी, पुरुषोत्तमी एकादशी या हरिवल्लभा एकादशी के नाम से भी कहा जाता हैं। सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार परमा एकादशी का व्रत जो मास अधिक हो जाता हैं, उस पर निर्भर करता हैं। अतः परमा एकादशी का उपवास करने हेतु, कोई चन्द्र मास निर्धारित नहीं होता हैं। अधिक मास को मलमास, पुरुषोत्तम मास या लीप का महीना भी कहा जाता हैं। जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता हैं। किन्तु इस मास में पूजा, जप-तप एवं व्रत तथा उपवास करना अत्यंत ही शुभ माना गया हैं। अधिक मास में परम एकादशी पड़ने के कारण ही इस एकादशी का महत्व कई गुना अधिक बढ़ जाता हैं। पुराणों में परम एकादशी व्रत का पुण्यफल अश्वमेध यज्ञ के समान ही बताया गया हैं। इस शुभ दिवस भगवान विष्णु की पूजा करने से दुर्लभ सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं। यह एकादशी, धन की दाता तथा सुख-ऐश्वर्य की जननी परम पावन एवं दुख तथा दरिद्रता का दमन करने वाली एकादशी मानी गयी हैं। इस एकादशी में स्वर्ण का दान, विद्या दान, अन्न दान, भूमि दान तथा गौ-दान करना अति उत्तम माना गया हैं। परमा एकादशी का व्रत भगवान श्री हरी विष्णु जी को अति प्रिय हैं, अतः इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला व्रती जीवनपर्यंत सुख का भोग कर के मरणोपरांत विष्णु लोक को जाता हैं तथा प्रत्येक प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्या का फल भी प्राप्त करता हैं। परम एकादशी के शुभ दिवस, जो भी भक्त, भगवान विष्णु जी की विधिवत पूजा करता हैं तथा व्रत रखता हैं, उसके जीवन के प्रत्येक कष्ट स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं तथा उसे जीवन में प्रत्येक प्रकार के सुखों की प्राप्ति हो जाती हैं। परमा एकादशी व्रत के दिवस भगवान विष्णु जी के “पुरुषोत्तम स्वरूप” की पूजा की जाती हैं तथा इस दिवस “सावां” अर्थात “मुन्यन्न” (तिन्नी का चावल) का सागार लेना चाहिए।

 

परमा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 अक्तूबर, सोमवार की साँय 04 बजकर 38 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 13 अक्तूबर, मंगलवार की दोपहर 02 बजकर 35 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में परमा अर्थात परम एकादशी का व्रत 13 अक्तूबर, मंगलवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, परमा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 14 अक्तूबर, बुधवार की प्रातः 06 बजकर 28 मिनिट से 08 बजकर 44 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - दोपहर 11:51 

26 September 2020

पद्मिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Padmini Kamla Ekadashi 2020

पद्मिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Padmini Kamla Ekadashi 2020

padmini ekadashi kab hai 2020
padmini ekadashi kab hai

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं, जो की, अधिक मास के शुक्ल पक्ष में आती है, अतः मलमास में मनाई जाने वाली इस एकादशी को पद्मिनी एकादशी कहा जाता हैं, इस परम पुण्यदायिनी एकादशी को कमला या पुरुषोत्तमी एकादशी के नाम से भी कहा जाता हैं। सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत जो महीना अधिक हो जाता है, उस पर निर्भर करता है। अतः पद्मिनी एकादशी का उपवास करने हेतु, कोई चन्द्र मास निर्धारित नहीं है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास या लीप का महीना भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत भगवान श्री हरी विष्णु जी को अति प्रिय है, अतः इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला व्रती जीवनपर्यंत सुख का भोग कर के मरणोपरांत विष्णु लोक को जाता है तथा प्रत्येक प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्या का फल प्राप्त करता है। पद्मिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम स्वरूप की पूजा की जाती हैं। इस दिन तिल तथा गुड़ का सागार लेना चाहिए।

 

पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष अधिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 सितम्बर, शनिवार की साँय 06 बजकर 59 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 27 सितम्बर, रविवार की साँय 07 बजकर 46 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में पद्मिनी अर्थात कमला एकादशी का व्रत 27 सितम्बर, रविवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, पद्मिनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 28 सितम्बर, सोमवार की प्रातः 06 बजकर 16 मिनिट से 08 बजकर 40 मिनिट तक का रहेगा।

द्वादशी समाप्त होने का समय - 08:58


12 September 2020

इन्दिरा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Indira Ekadashi 2020

इन्दिरा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Indira Ekadashi 2020

indira ekadashi date
indira-ekadashi

वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता है तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती है। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता है। भगवानजी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती है, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, एवं रात्री जागरण करते है। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जो की श्राद्ध पक्ष की एकादशी दिन आती है, तथा इस एकादशी के व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति अवश्य होती हैं। यह पितरों को सद्गति देनेवाली एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। जो की, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन मनाई जाती है। इस एकादशी की महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पितृपक्ष में आती है जिस कारण इसका महत्व अत्यंत अधिक हो जाता है। मान्यता है कि यदि कोई पूर्वज़ जाने-अंजाने हुए अपने पाप कर्मों के कारण यमदेव के पास अपने कर्मों का दंड भोग रहे हैं, तो इस एकादशी पर विधिपूर्वक व्रत कर इसके पुण्य को उनके नाम पर दान कर दिया जाये तो उन्हें मोक्ष प्राप्त हो जाता है तथा मृत्यु के उपरांत व्रती भी बैकुण्ठ में निवास करता है।

 

इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 13 सितम्बर, रविवार की प्रातः 04 बजकर 13 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 14 सितम्बर, सोमवार की प्रातः 03 बजकर 16 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में इन्दिरा एकादशी का व्रत 13 सितम्बर, रविवार के दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष, इन्दिरा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 14 सितम्बर, सोमवार की दोपहर  01 बजकर 36 से सायं 04 बजकर 04 मिनिट तक का रहेगा।

हरि वासर समाप्त होने का समय - प्रातः 08:49 

29 July 2020

श्रावण पुत्रदा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Shravana Putrada Ekadashi 2020

श्रावण पुत्रदा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Shravana Putrada Ekadashi 2020 

sawan ki putrada pavitra ekadashi 2020
sawan ki putrada ekadashi

वैदिक विधान कहता है की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती है। भगवान जी को एकादशी तिथि अति प्रिय है चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती है अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी है जिसका व्रत करने से संतानहीन अथवा पुत्रहीन जातकों को संतान सुख की प्राप्ति अति शीघ्र हो जाती है। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले इस व्रत को पुत्रदा एकादशी का व्रत कहा जाता है। पद्म पुराण के अनुसार जिन दम्पत्तियों को कोई पुत्र नहीं होता उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। प्रत्येक वर्ष में 2 बार पुत्रदा एकादशी का व्रत, पौष तथा श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है। अतः श्रावण तथा पौष मास की एकादशियों का महत्व एक समान ही माना जाता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी दिसम्बर या जनवरी के महीने में आती है तथा श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी जुलाई या अगस्त के महीने में आती है। श्रावण मास की शुक्ल एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है तथा इस एकादशी को पवित्रोपना एकादशी या पवित्र एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

 

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता है।

 

ध्यान रहे,

१. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है।

२. यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही होता है।

३. द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

४. एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५. व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है।

६. व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७. जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती है।

८. यदि, कुछ कारणों की वजह से जातक प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 29 जुलाई, बुधवार की मध्यरात्रि 01 बजकर 15 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 30 जुलाई, गुरुवार की मध्यरात्रि 11 बजकर 49 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2020 में श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत 30 जुलाई, गुरुवार के शुभ दिन किया जाएगा।

 

इस वर्ष श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 31 जुलाई, शुक्रवार की प्रातः 06 बजकर 02 से 08 बजकर 36 मिनिट तक रहेगा।

द्वादशी तिथि समाप्त होने का समय - रात्रि 10:42


01 May 2020

मोहिनी एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Mohini Ekadashi 2020

मोहिनी एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Mohini Ekadashi 2020 #EkadashiVrat

mohini ekadashi 2020
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वैदिक विधान कहता हैं कि, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिस के पावन व्रत को माता सीता की खोज के विकट समय पर भगवान श्रीराम जी ने तथा महाभारत काल में युधिष्ठिर ने श्रद्धापूर्वक कर के अपने प्रत्येक दुखों से मुक्ति प्राप्त की थी। अतः वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोहिनी एकादशी कहते हैं। इस एकादशी व्रत के प्रभाव से जातक प्रत्येक प्रकार के मोह-माया से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करता हैं। मान्यताओं के अनुसार हमारे द्वारा किये गये पाप कर्म के कारण ही हम अपने जीवन में मोह बंधन में बंध जाते हैं। अतः यह व्रत भूलोक के प्रत्येक व्यक्ति को मोह के बंधन तथा पापों से मुक्ति प्रदान करता हैं। जिसके कारण वह मृत्यु के पश्चात नरक की यातनाओं से छुटकारा पाकर प्रभु की शरण में चला जाता हैं। मोहिनी एकादशी के विषय में मान्यता यह भी हैं कि समुद्र मंथन के पश्चात अमृत पाने हेतु दानवों एवं देवताओं में विवाद कि स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। दानवों को देवताओं पर हाबी जानकार भगवान् श्रीविष्णु जी ने अत्यंत सुन्दर स्त्री का स्वरूप धारण कर दानवों को मोहित किया तथा उनसे कलश लेकर देवताओं को सारा अमृत पीला दिया था। अमृत पीकर देवता अमर हो गये। अतः यह एकादशी वह दिन हैं, जिस दिन भगवान विष्णु मोहिनी के रूप में प्रकट हुए थे, इस प्रकार भगवान विष्णु के इसी मोहिनी रूप की पूजा भी मोहिनी एकादशी के दिन की जाती हैं। मोहिनी एकादशी प्रत्येक पापों को हरनेवाली तथा उत्तम मानी गई हैं। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोह-माया के जाल तथा पातक समूह से छुटकारा पाते हैं, तथा अंत में विष्णु-लोक को जाते हैं।

मोहिनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 03 मई, रविवार के दिन 09 बजकर 08 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 04 मई, सोमवार की प्रातः 06 बजकर 12 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2020 में मोहिनी एकादशी का व्रत 03 मई, रविवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, मोहिनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 04 मई, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 48 मिनिट से साँय 04 बजकर 16 मिनिट तक का रहेगा।
हरि वासर समाप्त होने का समय – 11:22

वैष्णव (गौण) मोहिनी एकादशी - 04 मई 2020, सोमवार

दूजी (वैष्णव) एकादशी के लिए पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय 05 मई 2020, मंगलवार की प्रातः 05:56 से 08:32
द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त


वैशाख शुक्ल एकादशी का नाम कैसे पड़ा मोहिनी एकादशी?

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पौराणिक मान्यता के अनुसार वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान श्रीविष्णु जी ने सुमुद्र मंथन के समय प्राप्त हुए अमृत को देवताओं में वितरीत करने के लिये मोहिनी का रूप धारण किया था। जब समुद्र मंथन हुआ तो अमृत प्राप्ति के पश्चात देवताओं तथा दानवो में विवाद उत्पन्न हो गया था। बल से देवता असुरों को हरा नहीं सकते थे अतः चतुर छल से भगवान विष्णु जी ने मोहिनी का रूप धारण कर असुरों को अपने मोहपाश में बांध लिया तथा सारे अमृत का पान देवताओं को करवा दिया जिससे देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया। वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही यह समस्त घटनाक्रम हुआ अतः इस एकादशी को मोहिनी एकादशी का नाम प्रदान हुआ।

मोहिनी एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?

सनातन हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार मोहिनी एकादशी का व्रत सम्पूर्ण भारत-वर्ष में अक्षय तृतीया के पर्व के पश्चात वैशाख मास के शुक्ल पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। साथ ही, अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत अप्रैल या मई के महीने में आता हैं।

16 April 2020

वरुथिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Varuthini Ekadashi 2020

वरुथिनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Varuthini Ekadashi 2020 #EkadashiVrat

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वैदिक विधान कहता हैं कि, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिस एकादशी व्रत के दिवस भगवान श्री विष्णु जी के वराह अवतार की पूजा की जाती हैं। अतः वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी वरुथिनी एकादशीकहलाती हैं। वरुथिनी एकादशी को बरूथिनी ग्यारस भी कहा जाता हैं। इस व्रत को करने से जातक को सुख तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं। इस व्रत के दिन दान करने से कन्यादान तथा हजारों वर्षों के तपस्या के समान फल की प्राप्ति होती हैं तथा प्रत्येक प्रकार के दु:ख दूर हो जाते हैं। मनुष्य इस लोक के प्रत्येक सुख भोग कर अंत मे स्वर्गलोक को प्राप्त होता हैं। वरुथिनी एकादशी व्रत से अभागिनी स्त्री को भी सौभाग्य प्राप्त होता हैं। कथा के अनुसार वरूथिनी एकादशी के प्रभाव से ही राजा मान्धाता को स्वर्ग की प्राप्ति हुयी थी। वरूथिनी एकादशी का फल दस हजार वर्ष तक तपस्या करने के समान माना गया हैं। सूर्यग्रहण के समय स्वर्णदान करने से जो फल प्राप्त होता हैं वही फल वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से प्राप्त हो जाता हैं। इस व्रत का फल गंगा स्नान के फल से भी अधिक माना गया हैं। वरूथिनी एकादशी के दिन भगवान मधुसूदन की पूजा करनी चाहिए तथा इस दिन खरबूजे का सागर लेना चाहिए।



वरुथिनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 17 अप्रैल, शुक्रवार की साँय 08 बजकर 03 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 18 अप्रैल, शनिवार की रात्रि 10 बजकर 16 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2020 में वरुथिनी एकादशी का व्रत 18 अप्रैल, शनिवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, वरुथिनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 19 अप्रैल, रविवार की प्रातः 06 बजकर 08 मिनिट से 08 बजकर 36 मिनिट तक का रहेगा।
द्वादशी समाप्त होने का समय –00:42 मध्यरात्रि
  

वरुथिनी एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?

सनातन हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार वरुथिनी एकादशी का व्रत सम्पूर्ण उत्तरी भारत-वर्ष में पूर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार वैशाख मास के कृष्ण पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार यह व्रत चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। वहीं, अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत मार्च या अप्रैल के महीने में आता हैं।

02 April 2020

कामदा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamada Ekadashi 2020 Kamda Ekadashi Vrat

कामदा एकादशी कब है 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamada Ekadashi 2020 #EkadashiVrat

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वैदिक विधान कहता हैं कि, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिस एकादशी का व्रत जातक की प्रत्येक कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाता हैं। अतः चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी के रूप में जाना जाता हैं। यह एकादशी प्रत्येक प्रकार के कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होने के कारण ही कामदा कही जाती हैं। इसका शाब्दिक अर्थ भी हैं काम तथा दा अर्थात प्रत्येक प्रकार के कामनाओ को पूर्ण करने वाला व्रत। कामदा एकादशी अत्यंत शीघ्र फलदायी होने कारण ही इस एकादशी को फलदा एकादशी भी कहा जाता हैं, चैत्र नवरात्रि तथा राम नवमी के पश्चात हिन्दू नववर्ष की यह प्रथम एकादशी हैं। हिन्दु धर्म में ब्राह्महत्या करना सबसे भयंकर पाप माना गया हैं। किन्तु, पौराणिक विधान हैं कि, ब्राह्महत्या का पाप भी कामदा एकादशी का व्रत करने से नष्ट किया जा सकता हैं। इस व्रत में भगवान श्री विष्णु जी की पूजा अर्चना की जाती हैं। इस व्रत को भगवान् जी का उत्तम व्रत कहा गया हैं। कामदा एकादशी के फलों के विषय में कहा जाता हैं कि, यह एकादशी सर्व पाप विमोचिनी हैं। कामदा एकादशी के प्रभाव से पापों का शमन होता हैं तथा संतान की प्राप्ति भी संभव हो जाती हैं। इस व्रत को करने से परलोक में स्वर्ग की प्राप्ति होती हैं। जिस प्रकार से अग्नि लकड़ी को जला देती हैं उसी प्रकार से इस व्रत को करने से मनुष्य के प्रत्येक पापों का नाश हो जाता हैं तथा संतान सुख के साथ-साथ अन्य प्रकार के पुण्य की भी प्राप्ति होती हैं। मनुष्य को इस व्रत के करने से वैकुंठ की प्राप्ति संभव हो जाती हैं। यह भी कहा गया हैं कि कामदा एकादशी पिशाचत्व आदि दोषों का नाश करनेवाली हैं। मान्यता यह भी हैं कि, कामदा एकादशी का व्रत रखने व्रती को प्रेत योनि से भी मुक्ति प्राप्त हो सकती हैं। इस व्रत में नमक खाना वर्जित माना जाता हैं। कामदा एकादशी हिंदू संवत्सर की प्रथम एकादशी होती हैं। अतः इसका महत्व अधिक बढ़ जाता हैं।


कामदा एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 03 अप्रैल, शुक्रवार की मध्यरात्रि 12 बजकर 57 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 04 अप्रैल, शनिवार की रात्रि 10 बजकर 29 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2020 में कामदा एकादशी का व्रत 04 अप्रैल, शनिवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, कामदा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 05 अप्रैल, रविवार की प्रातः 06 बजकर 21 मिनिट से 08 बजकर 46 मिनिट तक का रहेगा।
द्वादशी समाप्त होने का समय – 19:24
  

कामदा एकादशी का व्रत कब किया जाता हैं?

चैत्र नवरात्रि तथा राम नवमी के पश्चात यह प्रथम एकादशी हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान में यह मार्च या अप्रैल के महीने में आती हैं।
सनातन हिन्दू पंचाङ्ग के अनुसार कामदा एकादशी का व्रत सम्पूर्ण उत्तरी भारत-वर्ष में पूर्णिमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष के एकादशी के दिन किया जाता हैं। साथ ही गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में अमांत पञ्चाङ्ग के अनुसार यह व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। वहीं, अङ्ग्रेज़ी कलेंडर के अनुसार यह व्रत मार्च या अप्रैल के महीने में आता हैं।

17 March 2020

पापमोचनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Papmochani Ekadashi 2020


पापमोचनी एकादशी कब हैं 2020 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Papmochani Ekadashi 2020 #EkadashiVrat


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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिस एकादशी का व्रत साधक को उसके प्रत्येक पापों से मुक्त कर, उसके लिये मोक्ष के मार्ग खोल देती हैं। अतः चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि पर किया जाने वाला व्रत पाप मोचनी एकादशी व्रत के नाम से जाना जाता हैं। इस एकादशी के दिन भगवान विष्णुजी के चतुर्भुज रूप का पूजन सम्पूर्ण विधि-विधान के अनुसार करने पर व्रत के शुभ फलों में अति वृद्धि होती हैं। पापमोचनी एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन करने मात्र से समस्त पाप एवं संकट नष्ट हो जाते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तिथि मानी गई हैं। स्वयं भगवान श्रीकृष्णजी ने इसके फल एवं महत्व को कुंतीपुत्र के समक्ष प्रस्तुत किया था। पापमोचनी एकादशी का अर्थ पाप को नष्ट करने वाली एकादशी होता हैं। अतः पापमोचिनी एकादशी के प्रभाव से मनुष्य के प्रत्येक पाप नष्ट हो जाते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवण तथा पठन मात्र से एक हजार गौदान करने का फल प्राप्त होता हैं। इस पावन व्रत को निष्ठापूर्वक  करने से ब्रह्महत्या करने वाले, अगम्या गमन करने वाले, स्वर्ण चुराने वाले, मद्यपान करने वाले जैसे अनेक भयंकर पाप भी नष्ट किए जा सकते हैं तथा अन्त में स्वर्गलोक की प्राप्ति होती हैं।

पापमोचनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 19 मार्च, गुरुवार की प्रातः 04 बजकर 25 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 20 मार्च, शुक्रवार की प्रातः 05 बजकर 58 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2020 में पापमोचनी एकादशी का व्रत 19 मार्च, गुरुवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, पापमोचनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 20 मार्च, शुक्रवार की दोपहर 01 बजकर 47 मिनिट से साँय 04 बजकर 09 मिनिट तक का रहेगा।
हरि वासर समाप्त होने का समय – 12:28

वैष्णव पापमोचिनी एकादशी - 20 मार्च 2020, शुक्रवार

वैष्णव एकादशी के लिए पारण - 06:33 से 07:55
वैष्णव हरि वासर समाप्त होने का समय – 07:55