10 May 2019

स्कंद षष्ठी व्रत | कन्द षष्ठी व्रतम | स्कन्द षष्ठी 2019 | Skanda Shashti Vrat 2019 | Skanda Sashti Fast | Sri Kandha Sashti vratam

स्कंद षष्ठी व्रत | कन्द षष्ठी व्रतम | स्कन्द षष्ठी 2019

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भगवान कार्तिकेय को स्कन्द देव के नाम से भी जाना जाता हैं जिनको हिन्दू देवताओं में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त हैं। स्कन्द देव भगवान शिव तथा माँ पार्वती के पुत्र तथा भगवान श्री गणेश के बड़े भाई हैं। भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय तथा सुब्रहमन्य के नाम से जाना जाता हैं।
प्रत्येक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान स्कन्द के लिए उपवास रखा जाता हैं तथा पूजा अर्चना की जाती हैं। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं। इस दिन उपवास रखना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं। स्कन्द षष्ठी का व्रत कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को विशेष रूप से किया जाता हैं। 'तिथितत्त्व' ने चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को 'स्कन्द षष्ठी' के लिए विशेष कहा हैं। साथ मे कुछ लोग आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कन्द षष्ठी श्रद्धा-पूर्वक मानते हैं। स्कंदपुराण के नारद-नारायण संवाद में संतान प्राप्ति तथा संतान की पीड़ाओं का शमन करने वाले इस व्रत का विधान बताया गया हैं। अतः यह व्रत 'संतान षष्ठी' नाम से भी जाना जाता हैं। एक दिन पूर्व से उपवास करके षष्ठी को 'कुमार' अर्थात् “कार्तिकेय” भगवान की पूजा करनी चाहिए। तमिल एवम तेलुगु हिन्दुओं मे स्कन्द एक प्रसिद्ध देवता हैं। अतः बहरत के दक्षिणी राज्यो में स्कन्दषष्ठी महत्त्वपूर्ण हैं।
षष्ठी तिथि जिस दिन पंचमी तिथि के साथ मिल जाती हैं उस दिन स्कन्द षष्ठी का व्रत करना शुभ होता हैं। इसलिए स्कन्द षष्ठी का व्रत पंचमी तिथि के दिन भी रखा जाता हैं। अन्य क्षेत्रों की तुलना में दक्षिण भारत में स्कन्द षष्ठी को बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता हैं। इस दिन लोग भगवान् कार्तिकेय के लिए उपवास रखते हैं, उनकी पूजा करते हैं तथा आशीर्वाद मांगते हैं। स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं। यहाँ हम स्कन्द षष्ठी 2019 की तिथियां दे रहे हैं। जिनकी मदद से आप जान पाएंगे की किस महीने की स्कन्द षष्ठी कौन से दिन पड़ रही हैं।
स्कन्द देव भगवान शिव तथा देवी पार्वती के पुत्र तथा भगवान गणेश के छोटे भाई हैं। भगवान स्कन्द को मुरुगन, कार्तिकेय तथा सुब्रहमन्य के नाम से भी जाना जाता हैं।
षष्ठी तिथि भगवान स्कन्द को समर्पित हैं। शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन श्रद्धालु लोग उपवास करते हैं। षष्ठी तिथि जिस दिन पञ्चमी तिथि के साथ मिल जाती हैं उस दिन स्कन्द षष्ठी के व्रत को करने के लिए प्राथमिकता दी गयी हैं। इसीलिए स्कन्द षष्ठी का व्रत पञ्चमी तिथि के दिन भी हो सकता हैं।

स्कन्द षष्ठी को कन्द षष्ठी के नाम से भी जाना जाता हैं।
सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य में जब पञ्चमी तिथि समाप्त होती हैं या षष्ठी तिथि प्रारम्भ होती हैं तब यह दोनों तिथि आपस में संयुक्त हो जाती हैं तथा इस दिन को स्कन्द षष्ठी व्रत के लिए चुना जाता हैं। इस नियम का धरमसिन्धु तथा निर्णयसिन्धु में उल्लेख किया गया हैं। तिरुचेन्दुर में प्रसिद्ध श्री सुब्रहमन्य स्वामी देवस्थानम सहित तमिल नाडु में कई मुरुगन मन्दिर इसी नियम का अनुसरण करते हैं। अगर एक दिन पूर्व षष्ठी तिथि पञ्चमी तिथि के साथ संयुक्त हो जाती हैं तो सूरसम्हाराम का दिन षष्ठी तिथि से एक दिन पहले देखा जाता हैं।
हालाँकि सभी षष्ठी तिथि भगवान मुरुगन को समर्पित हैं किन्तु कार्तिक चन्द्र मास (ऐप्पासी या कार्तिकाई सौर माह) के दौरान शुक्ल पक्ष की षष्ठी सबसे मुख्य होती हैं। श्रद्धालु इस दौरान छः दिन का उपवास करते हैं जो सूरसम्हाराम तक चलता हैं। सूरसम्हाराम के बाद अगला दिन तिरु कल्याणम के नाम से जाना जाता हैं।
सूरसम्हाराम के बाद आने वाली अगली स्कन्द षष्ठी को सुब्रहमन्य षष्ठी के नाम से जाना जाता हैं जिसे कुक्के सुब्रहमन्य षष्ठी भी कहते हैं तथा यह मार्गशीर्ष चन्द्र मास के दौरान पड़ती हैं।
आषाढ़ शुक्ल पक्ष तथा कार्तिक मास कृष्णपक्ष की षष्ठी का उल्लेख स्कन्द-षष्ठी के नाम से किया जाता हैं। पुराणों के अनुसार षष्ठी तिथि को कार्तिकेय भगवान का जन्म हुआ था इसलिए इस दिन स्कन्द भगवान की पूजा का विशेष महत्व हैं, पंचमी से युक्त षष्ठी तिथि को व्रत के श्रेष्ठ माना गया हैं व्रती को पंचमी से ही उपवास करना आरंभ करना चाहिए तथा षष्ठी को भी उपवास रखते हुए स्कन्द भगवान की पूजा का विधान हैं।
इस व्रत की प्राचीनता एवं प्रामाणिकता स्वयं परिलक्षित होती हैं। इस कारण यह व्रत श्रद्धाभाव से मनाया जाने वाले पर्व का रूप धारण करता हैं। स्कंद षष्ठी के संबंध में मान्यता हैं कि राजा शर्याति तथा भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक जुड़ा हैं कहते हैं कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आँखों की ज्योति प्राप्त हुई।
ब्रह्मवैवर्तपुराण में बताया गया हैं कि स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो जाता हैं। स्कन्द षष्ठी पूजा की पौरांणिक परम्परा जुड़ी हैं, भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा रक्षा की थी इनके छह मुख हैं तथा उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा। पुराण व उपनिषद में इनकी महिमा का उल्लेख मिलता हैं।

स्कन्दा षष्ठी तथा कंद षष्टी 2019 त्यौहार का इतिहास

स्कन्दा षष्ठी यह त्यौहार  दक्षिण भारत में महत्वपूर्णतौर पर तमिल में मनाया जाता हैं। अधिकांश अन्य हिंदू त्योहारों की तरह स्कंद षष्ठी भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक हैं। स्कंद जिन्हें हम  भगवान मुरूगन, सुब्रमण्य तथा कार्तिकेय के रूप में जानते हैं। स्कन्द पुराण में स्कन्द षष्टि का उपवास का महत्व मिलता हैं।

स्कन्दा षष्ठी त्यौहार इतिहास

स्कन्द पुराण सभी अठारह पुराणों की भांति ही विशाल हैं जिसमे तारकासुर, सुरपद्मा, सिम्हामुखा ने देवताओं को हराया तथा उन्हें पृथ्वी पर लाकर खड़ा कर दिया। उन राक्षसों ने पृथ्वी पर आतंक मचा रखा था। उन्हें देवताओं तथा मनुष्यों को प्रताड़ित करने उत्साह मिलता था, उन्होंने सब कुछ नष्ट कर दिया, जो भी देवताओं का था, जो भी उन्हें पूजता था, उन्होंने उन्हें भी नष्ट कर दिया। उन्ही राक्षसों में से एक सुरपद्मा को वरदान प्राप्त था, कि उसे भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता हैं। तथा उस समय देवी सती के अग्नि को प्राप्त हो जाने के कारण भगवान शिव नाराज थे तथा घोर तप में लीन थे, यही कारण था कि वे सभी राक्षसों को किसी का भय नहीं था।
राक्षसों के आतंक से परेशान होकर देवता ब्रह्मा जी के पास गए तथा इस विपदा के लिये सहायता की मांग की। तब ब्रह्मा जी ने काम देव से कहा, कि तुम्हे भगवान शिव को योग निंद्रा से जगाना होगा। इस कार्य में अत्यंत संकट था, क्यूंकि भगवान शिव के क्रोध से बच पाना मुश्किल था। किन्तु संकट अत्यंत बड़ा था, इसलिए काम देव ने इस कार्य को किया। जिसमे वे सफल हुये, किन्तु भगवान शिव का तीसरा नेत्र खुल जाने के कारण, उनकी क्रोधाग्नि से काम देव को भस्म कर दिया।
उस समय भगवान शिव का अंश छह भागों में बंट गया, जो कि गंगा नदी में गिरा। देवी गंगा ने उन छह अंशों को जंगल में रखा तथा उनसे छह पुत्रों का जन्म हुआ, जिन्हें कई वर्षों बाद देवी पार्वती ने एक कर भगवान मुरुगन को बनाया। पुराण के अनुसार भगवान मुरुगन स्वामी के कई रूप हैं, जिनमे एक चेहरा दो हाथ, एक चेहरा चार हाथ,छह चेहरे तथा बारह हाथ हैं।
दूसरी तरह राक्षसों का आतंक बढ़ता जा रहा था। उन्होंने कई देवताओं को बंदी बना लिया था। उनके इसी आतंक के कारण भगवान ने इनके संहार का निर्णय लिया। कई दिनों तक यह युद्ध चलता रहा। तथा अंतिम दिन भगवान मुरुगन ने सुरपद्मा राक्षस का वध कर दिया, साथ ही संसार का तथा देवताओं का उद्धार किया। तथा राक्षसों के आतंक से सभी को मुक्त कराया।
यह दिन था स्कंदा षष्टि जिसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतिक माना जाता हैं तथा उत्साह से मनाया जाता हैं आज भी इसे बड़ी श्रद्धा से दक्षिण भारत में मनाया जाता हैं।
भगवान मुरुगन को कई नामों से जाना जाता हैं जैसे कार्तिकेय, मुरुगन स्वामी उन्ही में से एक हैं स्कन्द। इसलिए इस दिवस को सक्न्दा षष्ठी के नाम से जाना जाता हैं।

स्कंदा षष्टि 2019 में कब मनाया जाता हैं?

यह त्यौहार तमिल एवम तेलुगु लोगो द्वारा मनाया जाता हैं। यह प्रति मास मनाया जाता हैं जब शुक्ल पक्ष की पंचमी तथा षष्ठी एक साथ आती हैं तब स्कन्दा षष्ठी या कंद षष्टी मनाई जाती हैं।
जब पंचमी तिथी खत्म होकर षष्ठी तिथी शुरू होती हैं, तब सूर्योदय तथा सूर्यास्त के मध्य यह स्कन्दा तिथी की शुरुवात होती हैं। यह नियम धर्मसिंधु तथा निर्णयसिंधु से लिया गया हैं। इसे तमिल एवम तेलुगु प्रान्त में भगवान मुरुगन के मंदिर में मनाया जाता हैं। इसमें श्रद्धालु उपवास रखते हैं।
यह त्यौहार तमिल कैलेंडर के अनुसार ऐप्पसी मास में मनाया जाता हैं, यह त्यौहार छः दिनों तक मनाया जाता हैं इनमे कई नियमों का पालन किया जाता हैं।

स्कंद षष्ठी महत्व

स्कंद शक्ति के अधिदेव हैं, देवताओं ने इन्हें अपना सेनापतित्व प्रदान किया मयूरा पर आसीन देवसेनापति कुमार कार्तिक की आराधना दक्षिण भारत मे सबसे ज्यादा होती हैं, यहां पर यह मुरुगन नाम से विख्यात हैं। प्रतिष्ठा, विजय, व्यवस्था, अनुशासन सभी कुछ इनकी कृपा से सम्पन्न  होते हैं।  स्कन्द पुराण के मूल उपदेष्टा कुमार कार्तिकेय ही हैं तथा यह पुराण सभी पुराणों में सबसे विशाल हैं।
स्कंद भगवान हिंदु धर्म के प्रमुख देवों मे से एक हैं, स्कंद को कार्तिकेय तथा मुरुगन नामों से भी पुकारा जाता हैं। दक्षिण भारत में पूजे जाने वाले प्रमुख देवताओं में से एक भगवान कार्तिकेय शिव पार्वती के पुत्र हैं, कार्तिकेय भगवान  के अधिकतर भक्त तमिल हिन्दू हैं। इनकी पूजा मुख्यत: भारत के दक्षिणी राज्यों तथा विशेषकर तमिलनाडु में होती हैं। भगवान स्कंद के सबसे प्रसिद्ध मंदिर तमिलनाडू में ही स्थित हैं।

कैसे मनाते हैं स्कन्दा षष्ठी? स्कंद षष्ठी पूजन
स्कंद षष्ठी इस अवसर पर शंकर-पार्वती को पूजा जाता हैं। मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती हैं।इसमें स्कंद देव स्थापना करके पूजा की जाती हैं तथा अखंड दीपक जलाए जाते हैं। भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी महात्म्य का नित्य पाठ किया करते हैं। भगवान को स्नान, पूजा, नए वस्त्र पहनाए जाते हैं।  इस दिन भगवान को भोग लगाते हैं, विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती हैं। इस में साधक तंत्र साधना भी करते हैं, इस में मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए तथा ब्रह्मचार्य का संयम रखना आवश्यक होता हैं।

1      इन दिनों मांसाहार का सेवन नही किया जाता
2      कई लोग प्याज, लहसन का प्रयोग नहीं करते
3      जो भी श्रद्धालु यह उपवास करते हैं वो मुरुगन का पाठ, कांता षष्ठी कवसम एवम सुब्रमणियम भुजंगम का पाठ करते हैं
4      कई लोग सुबह से स्कन्दा मंदिर जाते हैं
5      कई लोग स्कन्दा उपवास के दिनों में एक वक्त का उपवास भी करते हैं जिनमे कई दोपहर में भोजन करते हैं एवम कई रात्रि में
6      कई श्रद्धालु पुरे छः दिनों में फलाहार करते हैं
यह उपवास कई तरह से किया जाता हैं कई लोग इसे शरीर के शुद्धिकरण के रूप में भी करते हैं जिससे शरीर के सभी टोक्सिन शरीर से बाहर निकल जाते हैं। कई लोग नारियल पानी पीकर भी छः दिनों तक रहते हैं।
व्रत एक नियंत्रण के रूप में भी किया जाता हैं जिसमे मनुष्य स्वयं को कई व्यसनों से दूर रखता हैं। झूठ बोलने, लड़ने- झगड़ने का परहेज रखता हैं तथा ध्यान करके अपने आपको मजबूत बनाते हैं।
अगर श्रद्दालु को किसी भी तरह की बीमारी हैं तो उसे कभी उपवास नहीं करना चाहिए क्यूंकि ईश्वर कभी अपने बच्चो को कष्ट में नहीं देखना चाहता।

स्कंद कथा
कार्तिकेय की जन्म कथा के विषय में पुराणों में ज्ञात होता हैं कि जब दैत्यों का अत्याचार तथा आतंक फैल जाता हैं तथा देवताओं को पराजय का समाना करना पड़ता हैं जिस कारण सभी देवता भगवान ब्रह्मा जी के पास पहुंचते हैं तथा अपनी रक्षार्थ उनसे प्रार्थना करते हैं ब्रह्मा उनके दुख का जानकर उनसे कहते हैं कि तारक का अंत भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही संभव हैं परंतु सती के अंत के पश्चात भगवान शिव गहन साधना में लीन हुए रहते हैं।
इंद्र तथा अन्य देव भगवान शिव के पास जाते हैं, तब भगवान शिव उनकी पुकार सुनकर पार्वती से विवाह करते हैं। शुभ घड़ी तथा शुभ मुहूर्त में शिव जी तथा पार्वती का विवाह हो जाता हैं। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता हैं तथा कार्तिकेय तारकासुर का वध करके देवों को उनका स्थान प्रदान करते हैं।

भगवान मुरुगन के प्रसिद्ध मन्दिर
निम्नलिखित छः आवास जिसे आरुपदै विदु के नाम से जाना जाता हैं, इण्डिया के तमिल नाडु प्रदेश में भगवान मुरुगन के भक्तों के लिए अत्यंत ही मुख्य तीर्थस्थानों में से हैं।
पलनी मुरुगन मन्दिर (कोयंबटूर से १०० किमी पूर्वी-दक्षिण में स्थित)
स्वामीमलई मुरुगन मन्दिर (कुंभकोणम के पास)
तिरुत्तनी मुरुगन मन्दिर (चेन्नई से ८४ किमी)
पज्हमुदिर्चोलाई मुरुगन मन्दिर (मदुरई से १० किमी उत्तर में स्थित)
श्री सुब्रहमन्य स्वामी देवस्थानम, तिरुचेन्दुर (तूतुकुडी से ४० किमी दक्षिण में स्थित)
तिरुप्परनकुंद्रम मुरुगन मन्दिर (मदुरई से १० किमी दक्षिण में स्थित)
मरुदमलै मुरुगन मन्दिर (कोयंबतूर का उपनगर) एक तथा प्रमुख तीर्थस्थान हैं।

इण्डिया के कर्णाटक प्रदेश में मंगलौर शहर के पास कुक्के सुब्रमण्या मन्दिर भी अत्यंत प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं जो भगवान मुरुगन को समर्पित हैं किन्तु यह भगवान मुरुगन के उन छः निवास स्थान का हिस्सा नहीं हैं जो तमिल नाडु में स्थित हैं।

09 May 2019

संत श्री सूरदास का जन्मोत्सव | Surdas ki Jivani Parichay in Hindi | सूरदास जीवनी | सूरदास जी का जीवन परिचय

संत श्री सूरदास का जन्मोत्सव | Surdas ki Jivani Parichay in Hindi | सूरदास जीवनी | सूरदास जी का जीवन परिचय

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सूरदास जिसने जगत को दिखाई श्री कृष्णलीला
महाकवि सूरदास जिन्होंने जन-जन को प्रभु श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से परिचित करवाया। जिन्होंनें जन-जन में वात्सल्य का भाव जगाया। नंदलाल व यशोमति मैया के लाडले को बाल गोपाल बनाया। कृष्ण भक्ति की धारा में सूरदास का नाम सर्वोपरि लिया जाता हैं। सूरदास जिन्हें बताया तो जन्मांध जाता हैं लेकिन जो उन्होंने देखा वो कोई न देख पाया। गुरु वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग पर सूरदास ऐसे चले कि वे इस मार्ग के जहाज तक कहाये। अपने गुरु की कृपा से प्रभु श्रीकृष्ण की जो लीला सूरदास ने देखी उसे उनके शब्दों में चित्रित होते हुए हम भी देखते हैं। वैशाख शुक्ल पंचमी को सूरदास जी की जयंती मनाई जाती हैं।

सूरदास का संक्षिप्त जीवन परिचय:-

सूरदास का संपूर्ण जीवन कृष्ण भक्ति में बीता हैं। उन्होंने कृष्ण की लीलाओं पर पद लिखे व गाये। यह जिम्मेदारी उन्हें सौंपी थी उनके गुरु वल्लभाचार्य ने। सूरदास के जन्म को लेकर विद्वानों के मत भिन्न-भिन्न हैं। कुछ उनका जन्म स्थान गाँव सीही को मानते हैं जो कि वर्तमान में हरियाणा के फरीदाबाद जिले में पड़ता हैं तो कुछ मथुरा-आगरा मार्ग पर स्थित रुनकता नामक ग्राम को उनका जन्मस्थान मानते हैं। मान्यता हैं कि 1478 ई. में इनका जन्म हुआ था। सूरदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इनके पिता रामदास भी गायक थे। इनके जन्मांध होने को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं। देखा जाये तो इनकी रचनाओं में जो सजीवता हैं जो चित्र खिंचते हैं, जीवन के विभिन्न रंगों की जो बारीकियां हैं उन्हें तो अच्छी भली नज़र वाले भी बयां न कर सकें इसी कारण इनके अंधेपन को लेकर शंकाएं जताई जाती हैं। इनके बारे में प्रचलित हैं कि ये बचपन से साधु प्रवृति के थे। इन्हें सगुन बताने कला वरदान रूप में प्राप्त हुई थी। शीघ्र ही ये अत्यंत प्रसिद्ध भी हो गए थे। लेकिन इनका मन वहाँ नहीं लगा तथा अपने गाँव को छोड़कर समीप के ही गाँव में तालाब किनारे रहने लगे। शीघ्र ही ये वहाँ से भी चल पड़े तथा आगरा के पास गऊघाट पर रहने लगे। यहां ये शीघ्र ही स्वामी के रूप में प्रसिद्ध हो गए। यहीं पर इनकी मुलाकात वल्लभाचार्य जी से हुई। उन्हें इन्हें पुष्टिमार्ग की दीक्षा दी तथा श्रीकृष्ण की लीलाओं का दर्शन करवाया। वल्लभाचार्य ने इन्हें श्री नाथ जी के मंदिर में लीलागान का दायित्व सौंपा जिसे ये जीवन पर्यंत निभाते रहे।

कैसे हुई सूरदास की मृत्यु:-
मान्यता हैं कि इन्हें अपने देहावसान का आभास पहले से ही हो गया था। इनकी मृत्यु का स्थान गाँव पारसौली माना जाता हैं। मान्यता हैं कि यहीं पर प्रभु श्रीकृष्ण ने रासलीला की थी। श्री नाथ जी की आरती के समय जब सूरदास वहाँ मौजूद नहीं थे तो वल्लाभाचार्य को आभास हो गया था कि सूरदास का अंतिम समय निकट हैं। उन्होंने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए इसी समय कहा था कि पुष्टिमार्ग का जहाज़ जा रहा हैं जिसे जो लेना हो ले सकता हैं। आरती के बाद सभी सूरदास जी के निकट आये। तो अचेत पड़े सूरदास जी में चेतना आयी। कहते हैं कि जब उनसे सभी ज्ञान ग्रहण कर रहे थे तो चतुर्भुजदास जो कि वल्लाभाचार्य के ही शिष्य थे ने शंका प्रकट की कि सूरदास ने सदैव भगवद्भक्ति के पद गाये हैं गुरुभक्ति में कोई पद नहीं गाया। तब उन्होंने कहा कि उनके लिये गुरु व प्रभु में कोई अंतर नहीं हैं जो प्रभु के लिये गाया वही गुरु के लिये भी। तब उन्होंने भरोसो दृढ़ इन चरनन केरो नामक पद गाया। इसके बाद चित्त तथा नेत्र की वृति को लेकर विट्ठलनाथ जी द्वारा पूछे प्रश्न पर बलि बलि हों कुमरि राधिका नंद सुवन जासों रति मानी तथा खंजन नैन रूप रस माते पद गाये। यही उनके अंतिम पद भी थे जो उन्होंने गाये। इसके बाद पुष्टिमार्ग का जहाज़ गोलोक को गमन कर गया।

कब मनाई जाती हैं सूरदास जी की जयंती :-

सूरदास की जन्मतिथि को लेकर पहले मतभेद था, लेकिन पुष्टिमार्ग के अनुयायियों में प्रचलित धारणा के अनुसार सूरदास जी को उनके गुरु वल्लाभाचार्य जी से दस दिन छोटा बताया जाता हैं। वल्लाभाचार्य जी की जयंती वैशाख कृष्ण एकादशी को मनाई जाती हैं। इसके गणना के अनुसार सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को माना जाता हैं। इस कारण प्रत्येक वर्ष सूरदास जी की जयंती इसी दिन मनाई जाती हैं। अंग्रेजी कलैंडर के अनुसार वर्ष 2019 में सूरदास जयंती 9 मई को हैं।
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पं. विनोद पांडे

04 May 2019

शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय | shani ko khush karne ke upay in hindi | shanidev ko kaise prasann kare

शनिदेव को प्रसन्न करने के उपाय shanidev ko kaise prasann kare


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 सनातन हिन्दु पंचांग में नये चन्द्रमा के दिवस को अमावस्या कहते हैं। यह एक महत्वपूर्ण दिवस होता हैं क्योंकि कई धार्मिक कृत्य केवल अमावस्या तिथि के दिवस ही किये जाते हैं।
अमावस्या जब सोमवार के दिवस आती हैं तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं तथा अमावस्या जब शनिवार के दिवस आती हैं तो उसे शनि अमावस्या कहते हैं।
पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए अमावस्या के समस्त दिवस श्राद्ध की रस्मों को करने के लिए उपयुक्त हैं। कालसर्प दोष निवारण की पूजा करने के लिए भी अमावस्या का दिवस उपयुक्त होता हैं।

इस दिवस पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं तथा सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।

उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम तथा 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।

शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।

इस दिवस नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता हैं।

काले रंग का श्वान को भोजन दे।अगर हो सके इस दिवस से पालें तथा उसकी सेवा करें। अत्यंत ही फायदेमंद साबित होगा।
💥पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनिदेव का आवाहन तथा उनके दर्शन करे।

💥श्री शनिदेव का आह्वान करने के लिए हाथ में नीले पुष्प, बेल पत्र, अक्षत व जल लेकर इस मंत्र अदभुद वैदिक मंत्र का जाप करते हुए प्रार्थना करें- 

"ह्रीं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। 
छायार्मात्ताण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्"।। 

🌿ह्रीं बीजमय, नीलांजन सदृश आभा वाले, रविपुत्र, यम के अग्रज, छाया मार्तण्ड स्वरूप उन शनि को मैं प्रणाम करता हूं तथा मैं आपका आह्वान करता हूँ॥ 

🔥शनि अमावस्या के दिवस प्रात: जल में चीनी एवं काला तिल मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करके सात परिक्रमा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

🔥शनिदेव को प्रसन्न करने का सबसे अनुकूल मंत्र हैं --

"ॐ शं शनैश्चराय नम:।" 

इस मंत्र की एक माला का जाप अवश्य करें इस दिवस आप श्री शनिदेव के दर्शन जरूर करें।

🔥शनिदेव की दशा में अनुकूल फल प्राप्ति कराने वाला मंत्र

ॐ प्रां प्रीं प्रौं शं शनैश्चराय नम: 

🔥शनि अमावस्या के दिवस संध्या के समय पीपल के पेड़ पर सप्तधान / सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं तथा सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, इससे कुंडली के ग्रहो के अशुभ फलो में कमी आती हैं। जीवन से अस्थिरताएँ दूर होती हैं। 

🔥शनि अमावस्या के दिवस बरगद के पेड की जड में गाय का कच्चा दूध चढाकर उस मिट्टी से तिलक करें। अवश्य धन प्राप्ति होगी। 

🔥उड़द की दाल की काला नमक डाल कर खिचड़ी बनाकर संध्या के समय शनि मंदिर में जाकर भगवान शनिदेव का भोग लगाएं फिर इसे प्रसाद के रूप में बाँट दें तथा स्वयं भी प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। 

🔥शनिवार के दिवस काले उड़द की दाल की खिचड़ी काला नमक डाल कर खाएं इससे भी शनि दोष के कारण होने वाले कष्टों में कमी आती हैं।

🔥इस दिवस मनुष्य को सरसों का तेल, उडद, काला तिल, देसी चना, कुलथी, गुड शनियंत्र तथा शनि संबंधी समस्त पूजा सामग्री अपने ऊपर वार कर शनिदेव के चरणों में चढाकर शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए।

🔥शनिश्चरी अमावस्या को सुबह या शाम शनि चालीसा का पाठ या हनुमान चालीसा , बजरंग बाण का पाठ करें।

🔥तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें तथा पक्षियों को खिलाएं
 
🔥उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

🔥अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम तथा 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें। इससे आर्थिक संकट दूर होते हैं नौकरी, व्यापार में धनलाभ, सफलता की प्राप्ति होती हैं। 

🔥शनि अमावस्या के दिवस संपूर्ण श्रद्धा भाव से पवित्र करके घोडे की नाल या नाव की पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें।

🔥शनि अमावस्या के दिवस 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए। साथ ही अपने गले में गौरी शंकर रुद्राक्ष 7 दानें लाल धागें में धारण करें।

🔥जिनके ऊपर शनि की अशुभ दशा हो ऐसे जातक को मांस , मदिरा, बीडी- सिगरेट नशीला पदार्थ आदि का सेवन न करे।

शनि अमावस्या पर करें शनिदेव व पितृदेव की आराधना- 4 May 2019 | shani amavasya upay in hindi

शनि अमावस्या पर करें शनिदेव व पितृदेव की आराधना- 4 May 2019

शनिदेव व पितृदेव की आराधना - 4 May 2019
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🎡 अमावस्या अगर शनिवार के दिवस पड़ रही हो उसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता हैं। 4 May 2019 के दिवस शनिश्चरी अमावस्या का ही संयोग हैं। ज्योतिषाचार्यों का मानना हैं कि यह अमावस्या कई मायनों में अहम हैं। जिन लोगों की कुंडली में शनिदोष हैं वो लोग इस दिवस तय विधि विधान के अनुसार पूजा करके उससे मुक्ति पा सकते हैं। अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष की शुरुआत होती हैं जिसमें मांगलिक कृत्य करना शुभ माना गया हैं। हिंदू नववर्ष की शुरुआत भी इसी अमावस्या के पश्चात होती हैं।

🎠 शनि की साढ़े साती का प्रभाव भी किया जा सकता हैं कम -ये भी माना जाता हैं कि अगर किसी भी जातक के ऊपर शनि की साढ़ेसाती या फिर ढैय्या चल रही हो तो इस दिवस कुछ उपाय करने से उनका प्रभाव भी कम हो जाता हैं। इसके अलावा इस दिवस शनिदेव के पूजा से उन्हें खुश करके मनचाहा फल भी प्राप्त किया जा सकता हैं। 

😊 पितरों को खुश करने का दिवस - ज्योतिषाचार्यों का मानना हैं कि अमावस्या तिथि के स्वामी पितृदेव हैं। ऐसे में इस दिवस अपने पितरों को भी प्रसन्न करने का सही समय हैं। ऐसा माना जा रहा हैं कि शनिश्चरी अमावस्या के दिवस किए गए शांति उपाय तुरंत फलकारी होते हैं।  यदि पितरों का प्रकोप न हो तो भी इस दिवस किया गया श्राद्ध मनुष्य को हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करता हैं, क्योंकि शनिदेव की अनुकंपा से पितरों का उद्धार बडी सहजता से हो जाता हैं।

👆🔔 सहस्त्र गुना प्राप्त होता हैं फल - तंत्र शास्त्रों में कहा गया हैं कि इन दिवस किए गए पूजा तथा पितरों के लिए किए गए तर्पण से सहस्त्र गुना फल प्राप्त होता हैं। इस दिवस पवित्र नदियों में स्नान तथा विभिन्न प्रकार के अनाजों का दान करना फलकारी माना गया हैं। 

📯 घर में सकारात्मक ऊर्जा को होता हैं संचार - अपने पितरों का स्मरण कर करने तथा विधि विधान के अनुरूप पूजा करने से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती हैं। कहा जाता हैं कि इस दिवस किए गए पूजा से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता हैं एवं जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता हैं।

🏆 शनिश्चरी अमावस्या पर विशेष उपाय: - 🏆


💥पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनिदेव का आवाहन तथा उनके दर्शन करे।

💥श्री शनिदेव का आह्वान करने के लिए हाथ में नीले पुष्प, बेल पत्र, अक्षत व जल लेकर इस मंत्र अदभुद वैदिक मंत्र का जाप करते हुए प्रार्थना करें- 

"ह्रीं नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। 
छायार्मात्ताण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्"।। 

🌿ह्रीं बीजमय, नीलांजन सदृश आभा वाले, रविपुत्र, यम के अग्रज, छाया मार्तण्ड स्वरूप उन शनि को मैं प्रणाम करता हूं तथा मैं आपका आह्वान करता हूँ॥ 

🔥शनि अमावस्या के दिवस प्रात: जल में चीनी एवं काला तिल मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करके सात परिक्रमा करने से शनिदेव प्रसन्न होते हैं।

🔥शनिदेव को प्रसन्न करने का सबसे अनुकूल मंत्र हैं --

"ॐ शं शनैश्चराय नम:।" 

इस मंत्र की एक माला का जाप अवश्य करें इस दिवस आप श्री शनिदेव के दर्शन जरूर करें।

🔥शनिदेव की दशा में अनुकूल फल प्राप्ति कराने वाला मंत्र

ॐ प्रां प्रीं प्रौं शं शनैश्चराय नम: 

🔥शनि अमावस्या के दिवस संध्या के समय पीपल के पेड़ पर सप्तधान / सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं तथा सरसों या तिल के तेल का दीपक जलाएं, इससे कुंडली के ग्रहो के अशुभ फलो में कमी आती हैं। जीवन से अस्थिरताएँ दूर होती हैं। 

🔥शनि अमावस्या के दिवस बरगद के पेड की जड में गाय का कच्चा दूध चढाकर उस मिट्टी से तिलक करें। अवश्य धन प्राप्ति होगी। 

🔥उड़द की दाल की काला नमक डाल कर खिचड़ी बनाकर संध्या के समय शनि मंदिर में जाकर भगवान शनिदेव का भोग लगाएं फिर इसे प्रसाद के रूप में बाँट दें तथा स्वयं भी प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। 

🔥शनिवार के दिवस काले उड़द की दाल की खिचड़ी काला नमक डाल कर खाएं इससे भी शनि दोष के कारण होने वाले कष्टों में कमी आती हैं।

🔥इस दिवस मनुष्य को सरसों का तेल, उडद, काला तिल, देसी चना, कुलथी, गुड शनियंत्र तथा शनि संबंधी समस्त पूजा सामग्री अपने ऊपर वार कर शनिदेव के चरणों में चढाकर शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए।

🔥शनिश्चरी अमावस्या को सुबह या शाम शनि चालीसा का पाठ या हनुमान चालीसा , बजरंग बाण का पाठ करें।

🔥तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें तथा पक्षियों को खिलाएं
 ।
🔥उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

🔥अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम तथा 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें। इससे आर्थिक संकट दूर होते हैं नौकरी, व्यापार में धनलाभ, सफलता की प्राप्ति होती हैं। 

🔥शनि अमावस्या के दिवस संपूर्ण श्रद्धा भाव से पवित्र करके घोडे की नाल या नाव की पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें।

🔥शनि अमावस्या के दिवस 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए। साथ ही अपने गले में गौरी शंकर रुद्राक्ष 7 दानें लाल धागें में धारण करें।

🔥जिनके ऊपर शनि की अशुभ दशा हो ऐसे जातक को मांस , मदिरा, बीडी- सिगरेट नशीला पदार्थ आदि का सेवन न करे।

🔥व्रत में दिवस में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। 

🙏सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें।🙏

🔥इस दिवस दान का अत्यंत ही महत्त्व हैं।इस दिवस महाराज दशरथ द्वारा लिखा गया शनि स्तोत्र का पाठ करके शनि की कोई भी वस्तु जैसे काला तिल, काला कपड़ा, चमड़े के जूते, लोहे की वस्तु, काला चना, काला कंबल, नीला फूल दान करने से शनि साल भर कष्टों से बचाए रखते हैं।
  
🔥जो लोग इस दिवस यात्रा में जा रहे हैं तथा उनके पास समय की कमी हैं वह सफर में शनि नवाक्षरी मंत्र अथवा कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत:।।मंत्र का जप करने का प्रयास करते हैं करें तो शनिदेव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती हैं।

🔥शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव का विधिवत पूजा कर समस्त लोग पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं। शनिदेव क्रूर नहीं अपितु कल्याणकारी हैं। भविष्यपुराण के अनुसार शनि अमावस्या शनिदेव को अधिक प्रिय रहती हैं।

शनैश्चरी अमावस्या विशेष | Shani Amavasya 2019

शनैश्चरी अमावस्या विशेष | Shani Amavasya 2019

Shani Amavasya hindi
Shani Amavasya 2019

शनि अमावस्या के दिवस श्री शनिदेव की आराधना करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होंती हैं। इस वर्ष 4 मई 2019 को शनिवार के दिवस शनि अमावस्या मनाई जाएगी, यह पितृकार्येषु अमावस्या के रुप में भी जानी जाती हैं। कालसर्प योग, ढैय्या तथा साढ़ेसाती सहित शनि संबंधी अनेक बाधाओं से मुक्ति पाने का यह दुर्लभ समय होता हैं जब शनिवार के दिवस अमावस्या का समय हो जिस कारण इसे शनि अमावस्या कहा जाता हैं।

श्री शनिदेव भाग्यविधाता हैं, यदि निश्छल भाव से शनिदेव का नाम लिया जाये तो जातक के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं। श्री शनिदेव तो इस चराचर जगत में कर्मफल दाता हैं जो जातक के कर्म के आधार पर उसके भाग्य का निर्णय करते हैं। इस दिवस शनिदेव का पूजा सफलता प्राप्त करने एवं दुष्परिणामों से छुटकारा पाने हेतु अत्यंत उत्तम होता हैं। इस दिवस शनिदेव का पूजा समस्त मनोकामनाएं पूरी करता हैं।

शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव का विधिवत पूजा कर समस्त लोग पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं। इस दिवस विशेष अनुष्ठान द्वारा पितृदोष तथा कालसर्प दोषों से मुक्ति प्राप्त की जा सकतीहैं। इसके अलावा शनि का पूजा तथा तैलाभिषेक कर शनि की साढेसाती, ढैय्या तथा महादशा जनित संकट तथा आपदाओं से भी मुक्ति प्राप्त की जा सकतीहैं,

शनि अमावस्या महत्व

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शनि अमावस्या ज्योतिषशास्त्र के अनुसार साढ़ेसाती एवं ढ़ैय्या के दौरान शनि जातक को अपना शुभाशुभ फल प्रदान करता हैं। शनि अमावस्या अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इस दिवस शनिदेव को प्रसन्न करके जातक शनि के कोप से अपना बचाव कर सकते हैं। पुराणों के अनुसार शनि अमावस्या के दिवस शनिदेव को प्रसन्न करना अत्यंत आसान होता हैं। शनि अमावस्या के दिवस शनि दोष की शांति अत्यंत ही सरलता कर सकते हैं।

इस दिवस महाराज दशरथ द्वारा लिखा गया शनि स्तोत्र का पाठ करके शनि की कोई भी वस्तु जैसे काला तिल, लोहे की वस्तु, काला चना, कंबल, नीला फूल दान करने से शनि साल भर कष्टों से बचाए रखते हैं। जो लोग इस दिवस यात्रा में जा रहे हैं तथा उनके पास समय की कमी हैं वह सफर में शनि नवाक्षरी मंत्र अथवा कोणस्थ: पिंगलो बभ्रु: कृष्णौ रौद्रोंतको यम:। सौरी: शनिश्चरो मंद:पिप्पलादेन संस्तुत:।।मंत्र का जप करने का प्रयास करते हैं करें तो शनिदेव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती हैं।

पितृदोष से मुक्ति

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शनि अमावस्या पितृदोष मुक्ति के लिये उत्तम दिवस हैं। पितृ शांति के लिये अमावस्या तिथि का विशेष महत्व हैं तथा अमावस्या अगर शनिवार के दिवस पड़े तो इसका महत्व तथा अधिक बढ़ जाता हैं। शनिदेव को अमावस्या अधिक प्रिय हैं। शनिदेव की कृपा का पात्र बनने के लिए शनिश्चरी अमावस्या को समस्त को विधिवत आराधना करनी चाहिए। भविष्यपुराण के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या शनिदेव को अधिक प्रिय रहती हैं।

शनैश्चरी अमावस्या के दिवस पितरों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिन जातकयों की कुण्डली में पितृदोष या जो भी कोई पितृ दोष की पिडा़ को भोग रहे होते हैं उन्हें इस दिवस दान इत्यादि विशेष कर्म करने चाहिए। यदि पितरों का प्रकोप न हो तो भी इस दिवस किया गया श्राद्ध आने वाले समय में मनुष्य को हर क्षेत्र में सफलता प्रदान करता हैं, क्योंकि शनिदेव की अनुकंपा से पितरों का उद्धार बडी सहजता से हो जाता हैं।

शनि अमावस्या पूजा

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पवित्र नदी के जल से या नदी में स्नान कर शनिदेव का आवाहन तथा दर्शन करना चाहिए। शनिदेव का पर नीले पुष्प, बेल पत्र, अक्षत अर्पण करें। शनिदेव को प्रसन्न करने हेतु शनि मंत्र ॐ शं शनैश्चराय नम:”, अथवा ॐ प्रां प्रीं प्रौं शं शनैश्चराय नम:मंत्र का जाप करना चाहिए। इस दिवस सरसों के तेल, उडद, काले तिल, कुलथी, गुड शनियंत्र तथा शनि संबंधी समस्त पूजा सामग्री को शनिदेव पर अर्पित करना चाहिए तथा शनिदेव का तैलाभिषेक करना चाहिए। शनि अमावस्या के दिवस शनि चालीसा,  हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ अवश्य करना चाहिए। जिनकी कुंडली या राशि पर शनि की साढ़ेसाती व ढैया का प्रभाव हो उन्हें शनि अमावस्या के दिवस पर शनिदेव का विधिवत पूजा करना चाहिए।

शनैश्चरी अमावस्या पर शनि मंत्र- स्रोत्र द्वारा उपाय

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शनैश्चरी अमावस्या के दिवस शनि मंत्र का अधिक से अधिक जाप करना परम कल्याणकारक माना गया हैं जप से पहले शरीर तथा आसान शुद्धि के बाद निम्न विनियोग करे इसके बाद जप आरम्भ करें।

विनियोग👉 शन्नो देवीति मंत्रस्य सिन्धुद्वीप ऋषि: गायत्री छंद:, आपो देवता, शनि प्रीत्यर्थे जपे विनियोग:।नीचे लिखे गये कोष्ठकों के अन्गों को उंगलियों से छुयें। अथ देहान्गन्यास:-शन्नो शिरसि (सिर), देवी: ललाटे (माथा)।अभिषटय मुखे (मुख), आपो कण्ठे (कण्ठ), भवन्तु ह्रदये (ह्रदय), पीतये नाभौ (नाभि), शं कट्याम (कमर), यो: ऊर्वो: (छाती), अभि जान्वो: (घुटने), स्त्रवन्तु गुल्फ़यो: (गुल्फ़), न: पादयो: (पैर)।अथ करन्यास:-शन्नो देवी: अंगुष्ठाभ्याम नम:।अभिष्टये तर्ज्जनीभ्याम नम:।आपो भवन्तु मध्यमाभ्याम नम:।पीतये अनामिकाभ्याम नम:।शंय्योरभि कनिष्ठिकाभ्याम नम:।स्त्रवन्तु न: करतलकरपृष्ठाभ्याम नम:।अथ ह्रदयादिन्यास:-शन्नो देवी ह्रदयाय नम:।अभिष्टये शिरसे स्वाहा।आपो भवन्तु शिखायै वषट।पीतये कवचाय हुँ।(दोनो कन्धे)।शंय्योरभि नेत्रत्राय वौषट।स्त्रवन्तु न: अस्त्राय फ़ट।ध्यानम:-नीलाम्बर: शूलधर: किरीटी गृद्ध्स्थितस्त्रासकरो धनुश्मान।चतुर्भुज: सूर्यसुत: प्रशान्त: सदाअस्तु मह्यं वरदोअल्पगामी।।शनि गायत्री:-औम कृष्णांगाय विद्य्महे रविपुत्राय धीमहि तन्न: सौरि: प्रचोदयात।वेद मंत्र:- औम प्राँ प्रीँ प्रौँ स: भूर्भुव: स्व: औम शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तु न:।औम स्व: भुव: भू: प्रौं प्रीं प्रां औम शनिश्चराय नम:।

शनि बीज जप मंत्र 👉  ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनिश्चराय नम:। संख्या 23000 जाप।

शनि स्तोत्रम

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शनि अष्टोत्तरशतनामावलि

ॐ शनैश्चराय नमः ॥ ॐ शान्ताय नमः ॥ ॐ सर्वाभीष्टप्रदायिने नमः ॥ ॐ शरण्याय नमः ॥ ॐ वरेण्याय नमः ॥ ॐ सर्वेशाय नमः ॥ ॐ सौम्याय नमः ॥ ॐ सुरवन्द्याय नमः ॥ ॐ सुरलोकविहारिणे नमः ॥ ॐ सुखासनोपविष्टाय नमः ॥ ॐ सुन्दराय नमः ॥ ॐ घनाय नमः ॥ ॐ घनरूपाय नमः ॥ ॐ घनाभरणधारिणे नमः ॥ ॐ घनसारविलेपाय न मः ॥ ॐ खद्योताय नमः ॥ ॐ मन्दाय नमः ॥ ॐ मन्दचेष्टाय नमः ॥ ॐ महनीयगुणात्मने नमः ॥ ॐ मर्त्यपावनपदाय नमः ॥ ॐ महेशाय नमः ॥ ॐ छायापुत्राय नमः ॥ ॐ शर्वाय नमः ॥ ॐ शततूणीरधारिणे नमः ॥ ॐ चरस्थिरस्वभा वाय नमः ॥ ॐ अचञ्चलाय नमः ॥ ॐ नीलवर्णाय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ नीलाञ्जननिभाय नमः ॥ ॐ नीलाम्बरविभूशणाय नमः ॥ ॐ निश्चलाय नमः ॥ ॐ वेद्याय नमः ॥ ॐ विधिरूपाय नमः ॥ ॐ विरोधाधारभूमये नमः ॥ ॐ भेदास्पदस्वभावाय नमः ॥ ॐ वज्रदेहाय नमः ॥ ॐ वैराग्यदाय नमः ॥ ॐ वीराय नमः ॥ ॐ वीतरोगभयाय नमः ॥ ॐ विपत्परम्परेशाय नमः ॥ ॐ विश्ववन्द्याय नमः ॥ ॐ गृध्नवाहाय नमः ॥ ॐ गूढाय नमः ॥ ॐ कूर्माङ्गाय नमः ॥ ॐ कुरूपिणे नमः ॥ ॐ कुत्सिताय नमः ॥ ॐ गुणाढ्याय नमः ॥ ॐ गोचराय नमः ॥ ॐ अविद्यामूलनाशाय नमः ॥ ॐ विद्याविद्यास्वरूपिणे नमः ॥ ॐ आयुष्यकारणाय नमः ॥ ॐ आपदुद्धर्त्रे नमः ॥ ॐ विष्णुभक्ताय नमः ॥ ॐ वशिने नमः ॥ ॐ विविधागमवेदिने नमः ॥ ॐ विधिस्तुत्याय नमः ॥ ॐ वन्द्याय नमः ॥ ॐ विरूपाक्षाय नमः ॥ ॐ वरिष्ठाय नमः ॥ ॐ गरिष्ठाय नमः ॥ ॐ वज्राङ्कुशधराय नमः ॥ ॐ वरदाभयहस्ताय नमः ॥ ॐ वामनाय नमः ॥ ॐ ज्येष्ठापत्नीसमेताय नमः ॥ ॐ श्रेष्ठाय नमः ॥ ॐ मितभाषिणे नमः ॥ ॐ कष्टौघनाशकर्त्रे नमः ॥ ॐ पुष्टिदाय नमः ॥ ॐ स्तुत्याय नमः ॥ ॐ स्तोत्रगम्याय नमः ॥ ॐ भक्तिवश्याय नमः ॥ ॐ भानवे नमः ॥ ॐ भानुपुत्राय नमः ॥ ॐ भव्याय नमः ॥ ॐ पावनाय नमः ॥ ॐ धनुर्मण्डलसंस्थाय नमः ॥ ॐ धनदाय नमः ॥ ॐ धनुष्मते नमः ॥ ॐ तनुप्रकाशदेहाय नमः ॥ ॐ तामसाय नमः ॥ ॐ अशेषजनवन्द्याय नमः ॥ ॐ विशेशफलदायिने नमः ॥ ॐ वशीकृतजनेशाय नमः ॥ ॐ पशूनां पतये नमः ॥ ॐ खेचराय नमः ॥ ॐ खगेशाय नमः ॥ ॐ घननीलाम्बराय नमः ॥ ॐ काठिन्यमानसाय नमः ॥ ॐ आर्यगणस्तुत्याय नमः ॥ ॐ नीलच्छत्राय नमः ॥ ॐ नित्याय नमः ॥ ॐ निर्गुणाय नमः ॥ ॐ गुणात्मने नमः ॥ ॐ निरामयाय नमः ॥ ॐ निन्द्याय नमः ॥ ॐ वन्दनीयाय नमः ॥ ॐ धीराय नमः ॥ ॐ दिव्यदेहाय नमः ॥ ॐ दीनार्तिहरणाय नमः ॥ ॐ दैन्यनाशकराय नमः ॥ ॐ आर्यजनगण्याय नमः ॥ ॐ क्रूराय नमः ॥ ॐ क्रूरचेष्टाय नमः ॥ ॐ कामक्रोधकराय नमः ॥ ॐ कलत्रपुत्रशत्रुत्वकारणाय नमः ॥ ॐ परिपोषितभक्ताय नमः ॥ ॐ परभीतिहराय न मः ॥ ॐ भक्तसंघमनोऽभीष्टफलदाय नमः ॥

इसका 108 पाठ करने से शनि सम्बन्धी समस्त पीडायें समाप्त हो जाती हैं। तथा पाठ कर्ता धन धान्य समृद्धि वैभव से पूर्ण हो जाता हैं। तथा उसके समस्त बिगडे कार्य बनने लगते हैं। यह सौ प्रतिशत अनुभूत हैं।
इसके अतिरिक्त दशरथकृत शनि स्तोत्र का यथा सामर्थ्य पाठ भी शनि जनित अरिष्ट से शांति दिलाता हैं।

दशरथकृत शनि स्तोत्र

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नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते। 2

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते। 3

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने। 4

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च। 5

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते। 6

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:।7

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्। 8

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:। 9

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:।10

शनैश्चरी अमावस्या पर शनिदेव को प्रसन्न करने के शास्त्रोक्त  उपाय।

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ज्योतिषशास्त्र के अनुसार समस्त जातक की कुंडली में 9 ग्रह होते हैं जो अपना प्रभाव दिखाते हैं।

इन ग्रहों की स्थिति परिवर्तन के वजह से मनुष्य को समय समय पर अच्छे व बुरे दोनों परिणाम प्राप्त होते हैं।

इन 9 ग्रह में से केवल शनिदेव ऐसे हैं जिनके प्रभाव से मनुष्य घबरा जाता हैं।

हिन्दू धर्मशास्‍त्रों में भी शनिदेव का चरित्र भी दण्डाधिकारी के रूप में माना गया हैं जो कि कर्म तथा सत्य को जीवन में अपनाने की ही प्रेरणा देता हैं।

किन्तु अगर आप शनिदेव को प्रसन्न करना चाहते हैं तो शास्‍त्रों में अत्यंत सारे उपाय बताए गए हैं जिससे शनिदेव प्रसन्‍न हो जाएंगे।

शनिदेव के प्रसन्‍न होने से आपका जीवन सफल हो जाएगा। तो आइए जानते हैं उन उपायों को

अगर आप शनि को प्रसन्न करना चाहते हैं तो शनैश्चरी अमावस्या के दिवस पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाएं तथा दोनों हाथों से पीपल के पेड़ को स्‍पर्श करें।

इस दौरान पीपल के पेड़ की परिक्रमा करें तथा शनि मंत्र ऊं शं शनैश्‍चराय नम:का जाप करते रहना चाहिए, यह आपकी साढ़ेसाती की समस्त परेशानियों को दूर ले जाता हैं।

साढ़ेसाती के प्रकोप से बचने के लिए इस दिवस उपवास रखने वाले जातक को दिवस में एक बार नमक विहीन भोजन करना चाहिए।

   उपाय

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अगर आपकी कोई विशेष मनोकामना हैं तो शनैश्चरी अमावस्या के दिवस आप अपने लंबाई का लाल रंग का धागा लेकर इसे आम के पत्‍ते पर लपेट दें।

इस पत्‍ते तथा लपेटे हुए धागे को लेकर अपनी मनोकामना को मन में आवाहन करें तथा उसके बाद इस पत्‍ते तथा धागे को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इससे आपकी मनोकामना जल्‍द पूरी होगी।

   उपाय

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अक्‍सर ऐसा होता हैं कि लोग अत्यंत संघर्ष व मेहनत करते हैं किन्तु उन्‍हें सफलता हाथ नहीं लगती या लोग जो सोचते हैं वो हो नहीं पाता ऐसे में लोग न चाहते हुए भी अपने भाग्‍य को कोसने लगते हैं।

कहते हैं कि भाग्य बिल्कुल भी साथ नहीं देता तथा दुर्भाग्य निरन्तर पीछा कर रहा हैं।

कहा जाता हैं कि इंसान के पिछले कर्मों के अच्छे-बुरे परिणामों का फल भी आपके भाग्‍य का निर्धारण करता हैं इसलिए आपको इन समस्त बातों को छोड़कर निष्काम भाव से सच्चे मन से प्रयास करना चाहिए।

किन्तु आज एक उपाय जो हम आपको बताने जा रहे हैं उसे करने से आपका सोया हुआ भाग्‍य जाग जाएगा।

शनैचरी अमावस्या से आरंभ कर लगातार 41 दिवस रोज सुबह गाय का दुध लेकर नहाने से पहले इसे अपने सिर पर थोड़ा सा रख लें।

तथा फिर नहा लें अगर आप ऐसा रोज करेंगे तो आपका सोया हुआ भाग्‍य जाग जाएगा।

इतना ही नहीं आप जो भी काम सोचेंगे वो पूरा हो जाएगा। आपकी जीवन में आ रही रूकावटें खत्‍म हो जाएगी। बस अधिक से अधिक संयम रखने का प्रयास करें।

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