25 August 2019

अजा एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

अजा एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Aja Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

aja ekadashi kab ki hain
aja ekadashi kab hai 
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान जी को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसका व्रत करने मन निर्मल बनता हैं, ह्रदय शुद्ध होता हैं तथा आप सदमार्ग की ओर प्रेरित होते हैं। भाद्रपद की कृष्ण एकादशी के दिन मनाए जाने वाले इस व्रत को अजा एकादशी के व्रत के नाम से जाना जाता हैं। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में यह व्रत श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन आता हैं। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार अजा एकादशी का व्रत अगस्त या सितम्बर के महीने में आता हैं। अजा एकादशी का व्रत समस्त प्रकार के पापों का नाश करने वाला माना गया हैं। जो मनुष्य इस दिन भगवान ऋषिकेश जी की पूजा विधि-विधान तथा सच्चे मन से एवं पवित्र भावना के साथ करते हैं तथा रात्रि जागरण करते हैं उन्हे इस जन्म एवं पूर्व-जन्म के समस्त पाप-कर्मो से मुक्ति प्राप्त होती हैं तथा मरणोपरांत मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।

अजा एकादशी व्रत का पारण

        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष, भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त, सोमवार की प्रातः 07 बजकर 02 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 27 अगस्त, मंगलवार की प्रातः 05 बजकर 09 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में अजा एकादशी का व्रत 26 अगस्त, सोमवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, अजा एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 27 अगस्त, मंगलवार की दोपहर 01 बजकर 44 से 04 बजकर 15 मिनिट तक का रहेगा।
        (हरि वासर समाप्त होने का समय :- 10:31 AM)

अजा एकादशी व्रत का महत्व

समस्त उपवासों में अजा एकादशी के व्रत श्रेष्ठतम कहे गए हैं। एकादशी व्रत को रखने वाले व्यक्ति को अपने चित, इंद्रियों, आहार और व्यवहार पर संयम रखना होता हैं। अजा एकादशी व्रत का उपवास व्यक्ति को अर्थ-काम से ऊपर उठकर मोक्ष और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हैं। यह व्रत प्राचीन समय से यथावत चला आ रहा हैं। इस व्रत का आधार पौराणिक, वैज्ञानिक और संतुलित जीवन हैं। इस उपवास के विषय में यह मान्यता हैं कि इस उपवास के फलस्वरुप मिलने वाले फल अश्वमेघ यज्ञ, कठिन तपस्या, तीर्थों में स्नान-दान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होते हैं। यह उपवास, मन निर्मल करता हैं, ह्रदय शुद्ध करता हैं तथा सदमार्ग की ओर प्रेरित करता हैं।

14 August 2019

रक्षाबंधन शुभ मुहूर्त 2019 । राखी बांधने का शुभ मुहूर्त । Raksha Bandhan 2019 Shubh Muhurat | रक्षा बंधन 2019

रक्षाबंधन शुभ मुहूर्त 2019 । राखी बांधने का शुभ मुहूर्त । Raksha Bandhan 2019 Shubh Muhurat | रक्षा बंधन 2019

raksha bandhan shubh muhurat 2019
raksha bandhan muhurat in 2019

रक्षाबन्धन मन्त्रः (Raksha Bandhan Mantra)

येन बद्धो वली राजा दानवेन्द्रो महाबलः ।
तेन त्वा रक्षबध्नामी रक्षे माचल माचल ॥
Yen Baddho bali raja danvendro mahabal,
ten twam RakshBadhnami rakshe machalmachal.
The meaning of Raksha Mantra - "I tie you with the same Raksha thread which tied the most powerful, the king of courage, the king of demons, Bali. O Raksha (Raksha Sutra), please don't move and keep fixed throughout the year."


रक्षाबंधन का पर्व सनातन भारतवर्ष में मनाये जाने वाले पवित्र तथा प्रमुख त्योहारों में से एक हैं। रक्षाबंधन का पर्व भाई व बहन के अतुल्य स्नेह के प्रतीक के स्वरूप में भक्ति एवं उत्साह के साथ मनाया जाता हैं, जिसमें बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती हैं साथ ही अपने भाई की दिर्ध आयु के लिए प्रार्थना करती हैं तथा भाई अपनी बहनकी रक्षा करने का वचन देता हैं। हिंदुओ में रक्षाबंधन का पर्व अत्यंत हर्षोल्लास के साथ, धूमधाम से मनाया जाता हैं। साथ ही सिख, जैन, तथा लगभग सभी भारतीय समुदायों में यह पर्व बिना किसी रुकावट के तथा प्रेम-भाव के साथ मनाया जाता हैं। रक्षाबंधन के पर्व में रक्षा सूत्र अर्थात राखीका सबसे अधिक विशेष महत्व होता हैं। माना जाता हैं की राखीबहन का अपने भाई के प्रति स्नेह व आदर का प्रतीक होती हैं। रक्षाबंधन का त्योहार सनातन हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता हैं जो की अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अगस्त या सितंबर के महीने में आता हैं। रक्षा बंधन के ठीक आठ दिन के पश्चात भगवान् श्री कृष्ण का जन्मदिन अर्थात श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता हैं।
rakshabandhan
raksha-bandhan
रक्षाबंधन के शुभ दिवस पर प्रत्येक जातक को चाहिए की वह रक्षा सूत्र को भगवान शिव की प्रतिमा के समक्ष अर्पित कर 108 या उस से भी अधिक बार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें या शिव के पंचाक्षरी तथा अत्यंत प्रभावशाली मन्त्र “ॐ नमः शिवाय” का जप करें तथा उसके पश्चात ही रक्षा सूत्र को अपने भाईयों की कलाई पर बांधे। ऐसा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा दृष्टि प्राप्त होती हैं। क्योंकि श्रावण का पवित्र मास सम्पूर्ण प्रकार से भगवान भोलेनाथ को समर्पित होता हैं।

इस वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि 14 अगस्त, बुधवार की दोपहर 03 बजकर 45 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 15 अगस्त, गुरुवार की साँय 05 बजकर 58 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में रक्षा-बंधन का पर्व 15 अगस्त, गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। 

अतः इस वर्ष, रक्षाबंधन के त्योहार पर राखी बांधने का सबसे शुभ मुहूर्त 15 अगस्त, गुरुवार की दोपहर 01 बजकर 46 से साँय 04 बजकर 21 मिनिट तक का रहेगा।

यह भी ध्यान रहे की,
१.     रक्षा बन्धन के दिन भद्रा सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो जाने के कारण राखी बांधने का शुभ मुहूर्त 06 बजकर 09 से साँय 05 बजकर 58 मिनिट तक, अर्थात पूर्णिमा तिथि के समाप्ति तक का रहेगा।
२.     वैदिक मतानुसार अपराह्न का समय राखी बांधने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त माना गया हैं, जो कि हिन्दु समय गणना के अनुसार दोपहर के पश्चात का समय होता हैं।
३.     यदि अपराह्न का समय भद्रा आदि के कारण उपयुक्त नहीं हैं तो, प्रदोष काल का समय भी रक्षा बन्धन के संस्कार के लिये उपयुक्त माना गया हैं।
४.     हिन्दु धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्यों हेतु भद्रा का त्याग किया जाना चाहिये। अतः भद्रा का समय रक्षा बन्धन के लिये निषिद्ध माना गया हैं।

04 August 2019

कैसे करें नाग पंचमी की पूजा विधि 2019 | नाग देवता विशेष पूजन मंत्र | Nag Panchami Puja Vidhi in Hindi

कैसे करें नाग पंचमी की पूजा विधि 2019 | नाग देवता विशेष पूजन मंत्र | Nag Panchami Puja Vidhi in Hindi

nag panchami pujan vidhi
nag panchami puja vidhi in hindi
ॐ भुजंगेशाय विद्महे,

सर्पराजाय धीमहि,
तन्नो नाग: प्रचोदयात्।।

हिन्दू धर्म में नागों को अति महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। त्रिदेवों में से एक भगवान भोलेनाथ के गले में स्थान पाने वाले नागों की विधिवत पूजा की जाती है। पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रुप में मनाया जाता है। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन नागों की पूजा करने से समस्त मनोकामनाएँ शीघ्र ही पूर्ण हो जाती हैं। शास्त्रीय विधान है कि जो भी व्यक्ति नाग पंचमी के दिन श्रद्धाभाव से नाग देवता की पुजा करता है, उस व्यक्ति तथा उसके परिवार को कभी भी सर्प का भय नहीं सताता। नाग पंचमी के दिन नागों को कच्चा दूध अर्पित किया जाता है। मान्यता यह भी है कि इस दिन नागदेव का दर्शन करना अत्यंत शुभ रहता है। भगवान शिव को नागो का देवता माना जाता है। कहा जाता है की भगवान शिव के आशीर्वाद स्वरूप नाग देवता पृथ्वी को संतुलित करते हुए मानव जीवन की रक्षा करते है। अतः नाग पंचमी के दिन, नाग पूजन करने से भगवान शिवजी भी अत्यंत प्रसन्न होते है।
आज हम आपको बताएंगे, भविष्य पुराण के अनुसार नाग पूजन विधि, नाग पंचमी के दिन इस विधि से पूजन करने से प्रत्येक प्रकार का लाभ प्राप्त होता है तथा भगवान शिव की कृपा-दृष्टि आप पर बनी रहती है। 

        नाग देवता की पूजा विधि बताने से पहले आपको आवश्यक जानकारी देते है की इस दिन नागों को दूध पिलाने का कार्य भूल कर भी नहीं करना चाहिए। क्योंकि दूध पिलाने से नागों की मृ्त्यु हो जाती है। अतः नागो को दूध पिलाकर स्वयं ही अपने देवता की अकाल-मृत्यु का कारण ना बने। श्रद्वा व विश्वास के शुभ पर्व पर जीव हत्या करने से बचा जा सकता है। अतः भूलकर भी इस प्रकार का कार्य ना करे। नागो को दूध पिलाने की जगह भक्त को चाहिए की वह शिवलिंग को दूध से स्नान कराये तथा पुण्य-फल अर्जित करे।

नाग पंचमी पूजन विधि

        नागपंचमी के शुभ-दिन पर प्रातः स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त हो कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। महिलाएं घर की दीवारों पर या दरवाजे के दोनों ओर गोबर से सर्पों की आकृति या नाग का चित्र बनाए। सर्व-प्रथम भगवान श्री गणेश जी की पुजा उनके किसी भी मंत्रोच्चारण से करें। उसके पश्चात भगवान भोलेनाथ का ध्यान करें। अब पूजा का संकल्प लें। नाग-नागिन के जोड़े की सोने, चांदी या तांबे से निर्मित प्रतिमा है तो उसका दूध से स्नान करवाएं। यदि प्रतिमा नहीं है तो केवल तस्वीर के सामने एक कटोरे में इस भाव से दूध रखें कि, आप नाग-नागिन का स्नान करा रहे हैं। तस्वीर या घर में बनाई गई आकृति को दूध स्पर्श करा दें। इसके पश्चात नाग-नागिन के जोड़े की प्रतिमा या घर पर बनाई गई आकृति या तस्वीर के सामने बैठकर इस पौराणिक मंत्र का उच्चारण करे-

 नाग पंचमी पर नाग पूजन का विशेष मंत्र :-

सर्वे नागा: प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले,
ये च हेलिमरीचिस्था ये न्तरे दिवि संस्थिता:।
ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिन:,
ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नम:।।
अर्थात् - संपूर्ण आकाश, पृथ्वी, स्वर्ग, सरोवर-तालाबों, नल-कूप, सूर्य किरणें आदि जहां-जहां भी नाग देवता विराजमान है। वे सभी हमारे दुखों को दूर करके हमें सुख-शांतिपूर्वक जीवन प्रदान करे। उन सभी नागो को हमारी ओर से बारम्बार प्रणाम हो।
इसके पश्चात नागो को शुद्ध जल से स्नान कराकर, उनकी गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से पूजा करनी चाहिए। इसके पश्चात इन्द्राणी देवी की पूजा करनी चाहिए। दही, दूध, अक्षत, जलम पुष्प, नेवैद्य आदि से उनकी आराधना करे। नेवैध्य के रूप में नागो को सफेद मिठाई का भोग लगाएं।
नाग पंचमी के दिन पौराणिक कथाओं में वर्णित सर्पों के 12 स्वरूपों की पूजा की जाती है तथा नागपूजन करते समय इन 12 प्रसिद्ध नागों के नाम का जप भी किया जाता है। जो की इस प्रकार है-
अनंता, वासुकी, शेष, कालिया, तक्षक, पिंगल, धृतराष्ट्र, कार्कोटक, पद्मनाभा, कंबाल, अश्वतारा तथा शंखपाल।
अतः यथासंभव नाग गायत्री मंत्र का जप करना चाहिए-

नाग गायत्री मंत्र

ऊँ नागकुलाय विद्महे विषदन्ताय धीमहि तन्नो सर्प: प्रचोदयात्।

        इसके पश्चात नागदेवता की आरती करें तथा प्रसाद वितरित कर दें। यह नागदेवता की विधिवत पूजा का विधान है। इससे नागदेवता प्रसन्न होते हैं तथा आपके समस्त कष्टो का समाधान करते हैं। नागों की विशेष पूजा करके उनसे परिवार की रक्षा का आशीर्वाद मांगा जाता है।
        तत्पश्चात भक्तिभाव से यथा-शक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्चात स्वयं भी भोजन ग्रहण करे। इस दिन पहले मीठा भोजन करे उसके पश्चात स्व-रुचि भोजन करना चाहिए। इस दिन ब्राह्मणो को द्रव्य दान करने वाले व्यक्ति पर कुबेरदेव की दयादृष्टि बनी रहती है।
        मान्यता है कि यदि किसी जातक के घर में किसी सदस्य की मृत्यु सांप के काटने से हुई हो तो उसे बारह महीने तक पंचमी का व्रत करना चाहिए। जिसके फल से जातक के कुल में कभी भी सांप का भय नहीं होगा।
        यद्यपि इतनी पूजा पर्याप्त है किंतु जिन व्यक्ति के कुलदेवता स्वयं नागदेव होते हैं। उन्हे विधिवत पूजा के लिए किसी नागमंदिर में या शिव मंदिर में सर्पसूक्त का पाठ भी करना चाहिए।
जो की इस प्रकार है-
       

।। सर्पसूक्त ।।

ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा: शेषनाग पुरोगमा:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
कद्रवेयाश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
इंद्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखादय:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
पृथिव्यांचैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
ग्रामे वा यदिवारण्ये ये सर्पा प्रचरन्ति च।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
समुद्रतीरे ये सर्पा ये सर्पा जलवासिन:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।
रसातलेषु या सर्पा: अनन्तादि महाबला:।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीता: मम सर्वदा।।

नाग पंचमी कब है 2019 | NagPanchami 2019 | पूजन का शुभ मुहूर्त | Nag Panchami kab hai | नागपंचमी किस दिन है

नाग पंचमी कब है 2019 | NagPanchami 2019 | पूजन का शुभ मुहूर्त | Nag Panchami kab hai | नागपंचमी किस दिन है

nag panchami 2019
nag panchami kab hai 2019
ॐ भुजंगेशाय विद्महे,
सर्पराजाय धीमहि,
तन्नो नाग: प्रचोदयात्।।

        हिन्दू धर्म में नागों को अति महत्वपूर्ण स्थान दिया गया हैं। त्रिदेवों में से एक भगवान भोलेनाथ के गले में स्थान पाने वाले नागों की विधिवत पूजा की जाती हैं। पौराणिक धर्मग्रंथों के अनुसार प्रतिवर्ष श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रुप में मनाया जाता हैं। नाग पंचमी का पर्व हरियाली तीज के दो दिन के पश्चात आता हैं तथा अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार नाग पंचमी जुलाई या अगस्त के महीने में आती हैं। गुजरात, महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में अमान्त पंचांग के अनुसार नाग पंचमी 15 दिनों के पश्चात अर्थात श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन मनाई जाती हैं। नाग पंचमी को गुजरात में नाग पाचम के रूप में अधिक जाना जाता हैं तथा यह पर्व कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव से तीन दिन पूर्व मनाया जाता हैं। स्कन्द पुराण के अनुसार इस दिन नागों की पूजा करने से समस्त मनोकामनाएँ शीघ्र ही पूर्ण हो जाती हैं। शास्त्रीय विधान हैं कि जो भी व्यक्ति नाग पंचमी के दिन श्रद्धाभाव से नाग देवता की पुजा करता हैं, उस व्यक्ति तथा उसके परिवार को कभी भी सर्प का भय नहीं सताता। श्रावण मास के दौरान नाग देवता की पूजा करने के लिए अत्यधिक शुभ माना जाता हैं। अतः नाग पंचमी पूजा के शुभ दिवस बारह नागों की पूजा की जाती हैं। नाग पंचमी के दिन नागों को कच्चा दूध अर्पित किया जाता हैं तथा परिवार के रक्षण की प्रार्थना भी की जाती हैं। कुछ जातक नाग पंचमी से एक दिन पूर्व व्रत रखते हैं जिसे नाग चतुर्थी या नागुल चविथी के रूप में जाना जाता हैं। मान्यता यह भी हैं कि नाग पंचमी के दिन नागदेव का दर्शन करना अत्यंत शुभ रहता हैं। भगवान शिव को नागो का देवता माना जाता हैं। कहा जाता हैं की भगवान शिव के आशीर्वाद स्वरूप नाग देवता पृथ्वी को संतुलित करते हुए मानव जीवन की रक्षा करते हैं। अतः नाग पंचमी के दिन, नाग पूजन करने से भगवान शिवजी भी अत्यंत प्रसन्न होते हैं।


नाग पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त

इस वर्ष 2019 में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि, 04 अगस्त , रविवार की साँय 06 बजकर 49 मिनिट से प्रारम्भ होकर, 05 अगस्त, सोमवार की दोपहर 03 बजकर 55 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में नाग पंचमी का त्योहार 05 अगस्त, सोमवार के शुभ दिवस किया जाएगा।

नाग पंचमी पूजा का शुभ मुहूर्त 05 अगस्त, सोमवार की प्रातः 06 बजकर 05 मिनिट से 08 बजकर 38 तक का रहेगा।

27 July 2019

कामिका एकादशी व्रत कथा | कामिका एकादशी व्रत विधि | Ekadashi Vrat Katha in Hindi | Kamika Ekadashi 2019

कामिका एकादशी व्रत कथा | कामिका एकादशी व्रत विधि | Kamika Ekadashi 2019 | Ekadashi Vrat Katha in Hindi

kamika ekadashi katha
kamika ekadashi vrat katha in hindi
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसकी कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं। गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में कामिका एकादशी का व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण एकादशी के दिन किया जाता हैं। जिस व्यक्ति ने पापकर्म किया हैं, तथा उसे इसका भय उसे सताता हैं, ऐसे व्यक्ति को कामिका एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धाभाव तथा विधि-विधान से अवश्य करना चाहिए। कामिका एकादशीका व्रत भगवान विष्णु जी की अराधना एवं पूजा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर होता हैं। एकादशी के सभी व्रतों में कामिका एकादशी को सर्वोत्तम व्रत माना जाता हैं। धर्म-ग्रंथो के अनुसार, यह एकादशी उपासकों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित इच्छापूर्ती करने वाली मानी गई हैं। अतः कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की आराधना की जाती हैं तथा एकादशी का व्रत करने से व्रती को उनके समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त होती हैं।

कामिका एकादशी व्रत का उद्देश्य

कामिका एकादशी की रात्रि को दीपदान तथा जागरण के फल का माहात्म्य चित्रगुप्त भी नहीं कह सकते। जो जातक इस एकादशी की रात्रि को भगवान के मंदिर में दीपक जलाते हैं उनके पितर स्वर्गलोक में अमृतपान करते हैं तथा जो घी या तेल का दीपक जलाते हैं, वे सौ करोड़ दीपकों से प्रकाशित होकर सूर्य लोक को जाते हैं।
ब्रह्माजी कहते हैं कि “हे नारद! ब्रह्महत्या तथा भ्रूण हत्या आदि पापों को नष्ट करने वाली इस कामिका एकादशी का व्रत मनुष्य को यत्न के साथ करना चाहिए। कामिका एकादशी के व्रत का माहात्म्य तथा कथा श्रद्धा-भाव से सुनने तथा पढ़ने वाला मनुष्य सभी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता हैं।

कामिका एकादशी व्रत का महत्त्व

कामिका एकादशीके व्रत को आध्यात्मिक साधकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता हैं, क्योंकि यह व्रत चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता हैं तथा मन एवं हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता हैं। कामिका एकादशी का व्रत करने से सबके बिगड़े कार्य शीघ्र पूर्ण हो जाते हैं। विशेष रूप से इस तिथि में विष्णु जी की पूजा-अर्चना करना अत्यंत लाभकारी माना गया हैं। कामिका एकादशी के व्रत में शंख, चक्र, तथा गदाधारी श्री हरी-विष्णु जी की पूजा की जाती हैं। जो मनुष्य इस एकाद्शी को धूप, दीप, नैवेद्ध आदि से भगवान श्री विष्णु जी कि पूजा करता हैं उसे शुभ फलों की प्राप्ति होती हैं।
कामिका एकादशी व्रत के दिन श्री हरि का पूजन करने से व्यक्ति के पितरों के भी कष्ट दूर होते हैं। उपासक को मोक्ष प्राप्ति होती हैं। इस दिन तीर्थस्थानों में स्नान करने तथा दान-पुण्य करने से अश्वमेघ यज्ञ के समान फलप्राप्ति होती हैं।
यह भी मान्यता हैं कि श्रावण के पवित्र मास में भगवान विष्णुजी की पूजा करने से, सभी देवता, गन्धर्वों तथा नागों एवं सूर्य देव आदि सब पूजित हो जाते हैं। श्री विष्णुजी को यदि संतुष्ट करना हो तो उनकी पूजा तुलसी पत्र से करें। ऐसा करने से ना केवल प्रभु प्रसन्न होंगे अपितु वरती के भी सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। कामिका एकादशी व्रत की कथा सुनना वाजपेय यज्ञ करने के समान ही माना गया हैं।
जो फल सूर्य व चंद्र ग्रहण पर पुष्कर तथा काशी में स्नान करने से तथा गोदावरी तथा गंगा नदी में स्नान से भी प्राप्त नहीं होता वह फल इस दिन भगवान विष्णु के पूजन से प्राप्त होता हैं।
पापरूपी कीचड़ में फँसे हुए तथा संसाररूपी समुद्र में डूबे मनुष्यों के लिए इस एकादशी का व्रत तथा भगवान विष्णु का पूजन अत्यंत आवश्यक मानी गई हैं। इस व्रत से बढ़कर पापों के नाश का कोई अन्य उपाय नहीं हैं।

कामिका एकादशी व्रत के नियम

कामिका एकादशी व्रत का नियम तीन दिन का होता हैं। अर्थात दशमी, एकादशी तथा द्वादशी के दिन कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता हैं। अतः इन तीन दिनों की अवधि तक जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज तथा मसुर की दाल का सेवन भी वर्जित हैं। मांस तथा मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए।
दशमी के दिन एक समय भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा सूर्यास्त के पश्चात कुछ भी नहीं खाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए तथा व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना चाहिए। एकादशी के दिन जागरण करना भी व्रत का ही नियम हैं। द्वादशी के दिन पूजा कर पंडित को यथाशक्ति दान देना चाहिए तथा उसके पश्चात पारण करना चाहिए।
साथ ही एकादशी के दिन दातुन नहीं करना चाहिए। अपनी उंगली से ही दांत साफ करें। क्योंकि एकादशी के दिन पेड़ पौधों को तोड़ते नहीं हैं। साथ ही इस दिन किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।

इस व्रत में क्या खाये

चावल व चावल से बनी किसी भी चीज के खाना पूर्णतः वर्जित होता हैं। व्रत के दूसरे दिन चावल से बनी हुई वस्तुओं का भोग भगवानजी को लगाकर ग्रहण करना चाहिए। व्रत के दिन नमक रहित फलाहार करें। फलाहार भी केवल दो समय ही कर सकते हैं। फलाहार में तुलसी दल का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिए। व्रत में पीने वाले पानी में भी तुलसी दल का प्रयोग करना लाभकारी होता हैं।

कामिका एकादशी व्रत पूजन विधि

कामिका एकादशी व्रत के दिन व्यक्तिगत एवं घर की स्वच्छता का विशेष महत्व माना गया हैं। एकादशी तिथि पर व्रती प्रात: स्नानादि से निवृत्त होकर सर्वप्रथम संकल्प लें तथा श्री विष्णु के पूजन-क्रिया को प्रारंभ करें। इसके पश्चात पुज्य गणेश जी पूजा करें। क्योकि किसी भी पूजा में गौरी गणेश की पूजा पहले होती हैं। तत्पश्चात भगवान विष्णु की प्रतिमा को पंचामृत से स्नान करायें। पंचामृत से स्नान कराने से पूर्व प्रतिमा को शुद्ध गंगाजल से स्नान करना चाहिए। पंचामृत में दूध, दही, घी, शहद तथा शक्कर का उपयोग होता हैं। भगवान जी को स्नान कराने के पश्चात भगवान को गंध, अच्छत इंद्र जौ का प्रयोग करे तथा पुष्प चढ़ायें। धूप, दीप, चंदन आदि सुगंधित पदार्थो से आरती उतारनी चाहिए। भगवान विष्णु जी की आरती के पश्चात, एकादशी माता जी की आरती अवश्य करें। प्रभु को फल-फूल-माला, तिल, दूध, पंचामृत, इत्र, मौसमी फल, मिष्ठान, धूप, दीप आदि नाना पदार्थ निवेदित करें। नैवेध्य का भोग लगाये। नैवेध्य मे भगवानजी को मक्खन, मिश्री तथा तुलसी-पत्र अवश्य ही चढ़ाएं तथा अन्त में श्रमा याचन करते हुए भगवान को नमस्कार करें। इस दिन कामिका एकादशी व्रत कथा अवश्य पढ़नी चाहिए एवं व्रत के दिन विष्णु सहस्त्र नाम पाठ का जप अवश्य करना चाहिए। इस दिन ब्राह्मण भोज एवं दान-दक्षिणा का विशेष महत्व होता हैं। अत: ब्राह्मण को भोज करवाकर दान-दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजन ग्रहण करें। इस प्रकार विधिनुसार जो भी कामिका एकादशी का व्रत रखता हैं उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं।

कामिका एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

कामिका एकादशी व्रत की पौराणिक कथा

महाभारतकाल में एक समय कुंतीपुत्र धर्मराज युधिष्ठिरजी ने श्री कृष्ण ने कहा, “हे भगवन, कृपा करके श्रावण कृष्ण एकादशी का नाम तथा महत्व का वर्णन करें तथा ईसकी कथा सुनाएं।” तब श्रीकृष्णजी ने कहा कि “हे युधिष्ठिर! इस एकादशी की कथा एक समय स्वयं ब्रह्माजी भी देवर्षि नारद से कह चुके हैं, अतः मैं भी तुम्हें वही बताता हूं”। एकबार देवर्षि नारदजी ने ब्रह्माजी से श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा सुनने की इच्छा जताई थी। उस एकादशी का नाम, विधि, कथा तथा माहात्म्य जानना चाहा।
तब ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! श्रावण मास की कृष्ण एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं"।
जिसकी कथा इस प्रकार हैं,
प्राचीन काल में एक गांव में एक ठाकुर जी थे। वे अत्यंत ही क्रोधित हुआ करते थे। क्रोधी ठाकुर की एक दिन किसी कारण वश एक ब्राहमण से हाथापाई हो गई तथा परिणाम स्वरूप उस ब्राहमणदेव की मृत्य हो गई। अपने हाथों मरे गये ब्राहमण की क्रिया उस ठाकुर ने करनी चाही। परन्तु पंडितों ने उसे क्रिया में उपस्थित होने से मना कर दिया। ब्राहमणों ने बताया कि तुम पर ब्रहम हत्या का दोष हैं। पहले प्रायश्चित कर इस पाप से मुक्त हो जावों, तब हम तुम्हारे घर आएंगे व भोजन तथा अन्य पूजन-क्रिया करेंगे।
ठाकुर जी ने एक एक विधवान मुनी से अपने पापों का निवारण करने का उपाय पूछा। इस पर मुनीजी ने उन्हें श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कमिका एकदशी का व्रत पूर्ण भक्तिभाव से करने के लिए कहा तथा एकादशी पूजन कर ब्राहमणों को भोजन कराके यथाशक्ति दश्रिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति प्राप्त होगी ऐसा बताया। मुनिजी के बताये हुए निवारण पर कमिका एकदशी का व्रत पूर्ण श्रद्धा एवं भक्तिभाव से किया। एकादशी के रात्री ठाकुरजी ने भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, जिसमे भगवानजी ने ठाकुर को दर्शन देकर कहा कि तुम्हें ब्रहम-हत्या के पाप से मुक्ति प्राप्त हो गई हैं तथा तुम्हें क्षमा-दान दिया गया हैं।
इस प्रकार ठाकुर जी के बड़े से बड़े पाप-कर्म का नाश हो जाता हैं।

26 July 2019

कामिका एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamika Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

कामिका एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Kamika Ekadashi 2019 #EkadashiVrat

kamikaa ekadasi shubh Muhurt 2019
kamikaa ekadasi shubh Muhurt 2019
वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं। किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। भगवान को एकादशी तिथि अति प्रिय हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण इस दिन व्रत करने वाले भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा सदा बनी रहती हैं अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं। किन्तु इन सभी एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसकी कथा सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं। श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम कामिका एकादशी हैं। गुजरात व महाराष्ट्र तथा दक्षिणी भारत में कामिका एकादशी का व्रत आषाढ़ मास के कृष्ण एकादशी के दिन किया जाता हैं। इस एकादशी के पालक देवता भगवान विष्णु जी के अवतार “वामन देवता” को माना जाता हैं। जिस व्यक्ति ने कभी कोई पापकर्म किया हैं, तथा उसे इसका भय सताता हो, ऐसे व्यक्ति को कामिका एकादशी का व्रत पूर्ण श्रद्धाभाव तथा विधि-विधान से अवश्य करना चाहिए। कामिका एकादशी का व्रत भगवान विष्णु जी की आराधना एवं पूजा करने के लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर होता हैं। ऐसा करने से, जातक पाप रूपी संसार से उभर कर, मोक्ष की प्राप्ति करने में समर्थ हो पाता हैं। यह एकादशी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होती हैं। एकादशी के प्रत्येक व्रतों में कामिका एकादशी को सर्वोत्तम व्रत माना जाता हैं। सुवर्ण, लालमणी मोती, दूर्वा आदि से पूजा होने पर भी भगवान श्री हरी उतने संतुष्ट नहीं होते, जितने की तुलसी पत्र से पूजा होने के पश्चात हो जाते हैं। जो जातक तुलसी पत्र से श्री माधव की पूजा करता हैं। उसके प्रत्येक जन्म के पाप नष्ट हो जाते हैं। कामिका एकादशी को श्री विष्णु का उत्तम व्रत कहा गया हैं, कहा जाता हैं कि इस एकादशी की कथा स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। साथ ही, इससे पूर्व वशिष्ठ मुनि जी ने इस व्रत की कथा राजा दिलीप को भी सुनायी थी, जिसे सुनकर उन्हें समस्त पापों से मुक्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। धर्म-ग्रंथों के अनुसार, यह एकादशी उपासकों के सभी कष्टों का निवारण करने वाली तथा मनोवांछित इच्छापूर्ति करने वाली मानी गई हैं। इस एकादशी के व्रत को करने से पूर्वजन्म की बाधाएं भी दूर होती हैं। कामिका एकादशी भगवान विष्णु की आराधना तथा पूजा का सर्वश्रेष्ठ समय होता हैं। अतः कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु का व्रत करने से व्रती को उनके समस्त पापों से मुक्ति प्राप्त होती हैं। इस एकादशी के विषय में यह भी मान्यता हैं कि, जो साधक सावन के पवित्र मास में भगवान विष्णु जी की पूजा तथा व्रत करता हैं, उसके द्वारा गंधर्वों तथा समस्त नागों की भी पूजा हो जाती हैं। कामिका एकादशी के दिन “गौ दुग्ध” का सागार लेना चाहिए तथा इस दिन भगवान विष्णु के उपेन्द्र स्वरूप की पूजा करनी चाहिए।

कामिका एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ति करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की प्रथम एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष, श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 27 जुलाई, शनिवार की साँय 07 बजकर 45 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 28 जुलाई रविवार की साँय 06 बजकर 49 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में कामिका एकादशी का व्रत 28 जुलाई, रविवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, कामिका एकादशी का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 29 जुलाई, सोमवार की प्रातः बजकर 05 बजकर 56 मिनिट से सायं 08 बजकर 24 मिनिट तक का रहेगा।
(द्वादशी समाप्त होने का समय - 17:10 Hrs)

21 July 2019

श्रावण मास 2019 | सावन कब से शुरू हैं | सावन का महीना कब हैं 2019 | श्रावण सोमवार व्रत कब से हैं 2019

श्रावण मास 2019 | सावन कब से शुरू हैं | सावन का महीना कब हैं 2019 | श्रावण सोमवार व्रत कब से हैं 2019

sawan mahina kab hoga
sawan mahina kab se shuru hoga
करपूर गौरम करूणावतारम, संसार सारम भुजगेन्द्र हारम ।
सदा वसंतम हृदयारविंदे, भवम भवानी सहितं नमामि ॥
जिनका शरीर कपूर के समान गोरा हैं, जो करुणा के अवतार हैं, जो शिव संसार के सार अर्थात मूल हैं। तथा जो महादेव सर्पराज को गले के हार के रूप में धारण करते हैं, ऐसे सदैव प्रसन्न रहने वाले भगवान शिव को मैं अपने हृदय कमल में शिव तथा पार्वती के साथ नमस्कार करता हूँ।

सनातन हिन्दू धर्म के अनुसार चतुर्थी, एकादशी, त्रयोदशी-प्रदोष, अमावस्या, पूर्णिमा आदि जैसे अनेक व्रत तथा उपवास किए जाते हैं। किन्तु चातुर्मास को व्रतों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया हैं। चातुर्मास का समय 4 मास की अवधि में होता हैं, जो की आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात प्रबोधिनी एकादशी तक चलता हैं। चातुर्मास के चार मास इस प्रकार हैं:- श्रावण, भाद्रपद, आश्विन तथा कार्तिक।
चातुर्मास के प्रथम मास को ही श्रावण मास कहा जाता हैं। श्रावण शब्द, श्रवण से बना हैं जिसका अर्थ होता हैं सुनना, अर्थात सुनकर धर्म को समझना। वेदों के ज्ञान को ईश्वर से सुनकर ही ऋषियों ने समस्त प्राणियों को सुनाया था। सावन का महीना भक्तिभाव तथा सत्संग के लिए विशेष होता हैं। सावन के मास में विशेष रूप से भगवान शिव, माता पार्वती तथा श्री कृष्णजी की पूजा-अर्चना की जाती हैं। भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने हेतु सम्पूर्ण सावन के मास को अत्यंत शुभ व फलदायक माना जाता हैं। अतः भगवान शिव को प्रसन्न करने हेतु समस्त भक्तगण श्रावण मास के दौरान विभिन्न प्रकार से व्रत तथा उपवास रखते हैं।
श्रावण मास के दौरान समस्त उत्तरी भारत के राज्यों में सोमवार का व्रत अत्यंत शुभ माना जाता हैं। कई भक्त सावन मास के प्रथम सोमवार के दिन से ही सोलह सोमवार उपवास का प्रारम्भ करते हैं। श्रावण मास में प्रत्येक मंगलवार भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती माँ को समर्पित होते हैं। श्रावण मास के दौरान मंगलवार का उपवास मंगल-गौरी व्रत के रूप में जाना जाता हैं।
वैसे तो प्रत्येक सोमवार भगवान शिव की उपासना के लिये उपयुक्त माना जाता हैं किन्तु सावन के सोमवार का महत्व अधिक माना गया हैं। श्रावण के सोमवार व्रत की पूजा भी अन्य सोमवार व्रत के अनुसार की जाती हैं। इस व्रत में केवल एकाहार अर्थात एक समय भोजन ग्रहण करने का संकल्प लिया जाता हैं। भगवान भोलेनाथ तथा माता पार्वती जी की धूप, दीप, जल, पुष्प आदि से पूजा करने का विधान हैं। शिव पूजा के लिये सामग्री में उनकी प्रिय वस्तुएं भांग, धतूरा आदि भी रख सकते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार भगवान शिव को जल अवश्य अर्पित करना चाहिये। रात्रि में भूमि पर आसन बिछा कर शयन करना चाहिये। सावन के पहले सोमवार से आरंभ कर 9 या 16 सोमवार तक लगातार उपवास करना चाहिये तथा उसके पश्चात 9वें या 16वें सोमवार पर व्रत का उद्यापन अर्थात पारण किया जाता हैं। यदि लगातार 9 या 16 सोमवार तक उपवास करना संभव न हो तो आप केवल सावन के चार सोमवार इस व्रत को कर सकते हैं।

सावन के सोमवार का व्रत 2019

इस वर्ष, श्रावण सोमवार का व्रत कब से प्रारम्भ हैं तथा कब तक किया जाएगा?
भारतवर्ष के विभिन्न क्षेत्रों में चंद्र पंचांग के आधार पर श्रावण मास के प्रारम्भ के समय में पंद्रह दिनों का अंतर आ जाता हैं। पूर्णिमांत पंचांग में श्रावण मास अमांत पंचांग से पंद्रह दिन पहले प्रारम्भ हो जाता हैं। अमांत चंद्र पंचांग का प्रयोग गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु में किया जाता हैं, वहीं पूर्णिमांत चंद्र पंचांग का उपयोग उत्तरी भारत के राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखंड में किया जाता हैं। साथ ही, नेपाल तथा उत्तराखंड तथा हिमाचल प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में तो सावन के सोमवार को सौर पंचांग के अनुसार मनाया जाता हैं। अतः सावन सोमवार की आधी तारीखें दोनों पंचांग में भिन्न-भिन्न होती हैं।

सावन सोमवार व्रत 2019

उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, छत्तीसगढ़, बिहार तथा झारखण्ड के लिए सावन के सोमवार का व्रत

श्रावण मास प्रारम्भ
17 जुलाई 2019
बुधवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत
22 जुलाई 2019
सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत
29 जुलाई 2019
सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत
05 अगस्त 2019
सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत
12 अगस्त 2019
सोमवार

श्रावण मास की समाप्ति
15 अगस्त 2019
गुरुवार


सावन सोमवार व्रत 2019

गुजरात, महाराष्ट्र, आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, कर्नाटक तथा तमिलनाडु के लिए सावन के सोमवार का व्रत

श्रावण मास प्रारम्भ
02 अगस्त 2019
शुक्रवार

प्रथम श्रावण सोमवार व्रत
05 अगस्त 2019
सोमवार

द्वितीय श्रावण सोमवार व्रत
12 अगस्त 2019
सोमवार

तृतीय श्रावण सोमवार व्रत
19 अगस्त 2019
सोमवार

चतुर्थ श्रावण सोमवार व्रत
26 अगस्त 2019
सोमवार

श्रावण मास की समाप्ति
30 अगस्त 2019
शुक्रवार

Enter you Email