13 July 2019

चातुर्मास 2019 | चातुर्मास व्रत के नियम | चातुर्मास व्रत विधि | Chaturmas Kya hai | Chaturmas ke Niyam

चातुर्मास 2019 | चातुर्मास व्रत के नियम | चातुर्मास व्रत विधि | Chaturmas Kya hai | Chaturmas ke Niyam

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Chaturmas Kya hai 
पद्म पुराण के उत्तर खंड, स्कंद पुराण के ब्राह्म खंड एवं नागर खंड के उत्तरार्ध के अनुसार व्रत, भक्ति तथा शुभ कर्म करने के लिए विशेष चार मास को हिन्दू धर्म में 'चातुर्मास' कहा जाता हैं। एक हजार अश्वमेध यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता हैं, वही चातुर्मास व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता हैं। इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं। ध्यान तथा साधना करने वाले जातकों के लिए यह चार मास अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान शारीरिक तथा मानसिक स्थिति तो सही होती ही हैं, साथ ही वातावरण भी अच्छा रहता हैं। चातुर्मास 4 मास की अवधि हैं, जो आषाढ़ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी अर्थात प्रबोधिनी तक चलता हैं।
हिंदी कैलंडर के अर्ध आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन एवं अर्ध कार्तिक मास ही चातुर मास कहलाते हैं। इन दिनों कोई शुभ कार्य, जैसे की विवाह संबंधी कार्य, मुंडन विधि, नाम करण आदि, करना अच्छा नहीं माना जाता, किन्तु इन दिनों धार्मिक अनुष्ठान बहुत अधिक किये जाते हैं, जैसे भागवत कथा, रामायण, सुंदरकांड पाठ, भजन संध्या एवं सत्य नारायण की पूजा आदि। इसके अलावा इस समय कई तरह के दानों का भी महत्व हैं, जिसे व्यक्ति अपनी श्रद्धा एवं हैसियत के हिसाब से करता हैं।
जिन दिनों में भगवान् विष्णुजी शयन करते हैं उन्हीं चार महीनों को चातुर्मास या चौमासा भी कहते हैं, देवशयनी एकादशी से हरिप्रबोधनी एकादशी तक चातुर्मास के इन चार महीनों की अवधि में विभिन्न धार्मिक कर्म करने पर मनुष्य को विशेष पुण्य लाभ की प्राप्ति होती हैं, क्योंकि इन दिनों में किसी भी जीव की ओर से किया गया कोई भी पुण्यकर्म व्यर्थ नहीं जाता। साथ ही, देवशयन के चातुर्मासीय व्रतों में पलंग पर सोना, स्त्री संघ करना, मिथ्या वचन कहना, मांस, शहद, मूली, बैंगन आदि का सेवन वर्जित माना जाता हैं।
वैसे तो चातुर्मास का व्रत देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ होता हैं, आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी के दिन उपवास करके जातक भक्तिपूर्वक चातुर्मास व्रत प्रारंभ कर सकता है, किन्तु जैन धर्म में चतुर्दशी से प्रारंभ माना जाता हैं, द्वादशी, पूर्णिमा से भी यह व्रत प्रारम्भ किया जा सकता हैं, भगवान् को पीले वस्त्रों से श्रृंगार करें तथा सफेद रंग की शय्या पर सफेद रंग के ही वस्त्र द्वारा ढक कर उन्हें शयन करायें।

चातुर्मास के नियम

चातुर्मास या चौमासा के कई नियम बताए गए हैं, जो प्रत्येक मनुष्य अपनी मान्यता, श्रद्धा तथा सामर्थ्य के अनुसार निभाते हैं।
1- चौमासा के दिनों में महिलायें सूर्योदय के पूर्व उठकर स्नान करती हैं, साथ ही श्रावण एवं कार्तिक के मास में नित्य मंदिर जा कर पूजा करती हैं। कार्तिक में कृष्ण जी एवं तुलसी जी की पूजा की जाती हैं।
2- कई जातक सम्पूर्ण चार मास तक उपवास या एक समय भोजन कर के रात्रि में फलाहार ग्रहण करते हैं।
3- चातुर्मास में कई जातक प्याज, लहसुन, बैंगन, मसूर जैसे भोज्य पदार्थ का अपने भोजन में उपयोग नहीं करते हैं।
4- देखा गया हैं की, कई जातक नव-दुर्गा के समय चप्पल भी नहीं पहन कर व्रत का पालन करते हैं।
5- श्रावण एवं नव दुर्गा के व्रत में कई पुरुष अपने बाल तथा दाढ़ी नहीं कटवाते हैं।
6- सम्पूर्ण चौमासा गीता पाठ, सुंदर कांड का पाठ, भजन तथा रामायण का पाठ प्रत्येक जातक अपनी-अपनी श्रद्धा तथा क्षमता के अनुसार करते हैं।
7- चातुर्मास के समय कई जातक दान पुण्य एवं धार्मिक स्थलों की यात्रा भी करते हैं।

चातुर्मास में श्री विष्णु भगवान् को क्या भोग लगायें?

१. अच्छी वाणी के लिए गुड व मिश्री का भोग लगायें।
२. दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए मुंफली तेल का भोग लगायें।
३.  अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए कड़वे तेल अर्थात सरसों के तेल का भोग लगाये।
४. सौभाग्य के लिए मीठे खाद्य तेल का भोग लगायें।
५. मृत्यु के पश्चात स्वर्ग की प्राप्ति के लिए पीले पुष्पों का भोग लगावे।
इसके अलावा, व्यक्ति को चातुर्मास के इन चार महीनों के लिए अपनी रुचि एवं श्रद्धा के अनुसार नित्य व्यवहार के पदार्थों का त्याग तथा ग्रहण करना चाहिए, जो की इस प्रकार हैं।

चातुर्मास में क्या ग्रहण करें?
१.  मनोवांछित वर प्राप्त करने के लिए बर्तन की जगह केले के पत्ते में भोजन करें।
२.  देह शुद्धि या सुंदरता के लिए निश्चित प्रमाण के पंचगव्य का ग्रहण करें।
३.  आत्म शुद्धि के लिए पंचमेवा का सेवन करें।
४.  वंश वृद्धि के लिए नियमित रूप से गाय के दूध का सेवन करें।
५.  सर्वपापक्षयपूर्वक सकल पुण्य फल प्राप्त होने के लिए एकमुक्त, नक्तव्रत, अयाचित भोजन या     सर्वथा उपवास करने का व्रत ग्रहण करें।
६.  भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए दिन में केवल एक ही बार भोजन करें या उपवास रखें।

चातुर्मास में क्या त्याग करें?
१.  प्रभु शयन के दिनों में सभी प्रकार के मांगलिक कार्य न करें।
२. चारपाई पर सोना, भार्या का संग करना, झूठ बोलना, मांस-मदिरा सेवन, शहद तथा दूसरे का      दिया दही-भात आदि का भोजन करना, मूली, पटोल एवं बैंगन आदि का त्याग करना चाहिए।
३. मधुर स्वर के लिए गुड़ व मिश्री का त्याग करें।
४. दीर्घायु अथवा पुत्र-पौत्र आदि की प्राप्ति के लिए मुंफली तेल का त्याग करें।
५.  शत्रु नाश आदि के लिए सरसों तेल का त्याग करें।
६.  सौभाग्य के लिए मीठे तेल का त्याग करें।
७.  स्वर्ग प्राप्ति के लिए पुष्पादि भोगो का त्याग करें।
यह भी ध्यान दे - देवशयन के पश्चात चार महीनों तक योगी व तपस्वी कही भ्रमण नहीं करते तथा एक ही स्थान पर रहकर तप करते रहते हैं। इस समय में केवल ब्रज-नगर की यात्रा की जा सकती हैं। क्योंकि चातुर्मास के समय पृथ्वी के सभी तीर्थ ब्रज-धाम में आकार निवास करते हैं।

पद्मपुराण के अनुसार जो मनुष्य इन चार महीनों में मंदिर में झाडू लगाते हैं तथा मंदिर को धोकर साफ करते हैं, कच्चे स्थान को गोबर से लीपते हैं, उन्हें सात जन्म तक ब्राह्मण योनि प्राप्त होती हैं, जो भगवान को दूध, दही, घी, शहद, तथा मिश्री से स्नान कराते हैं, वह संसार में वैभवशाली होकर स्वर्ग में जाकर इन्द्र के समान सुख भोगते हैं।
Chaturmas ke Niyam
Chaturmas
धूप, दीप, नैवेद्य तथा पुष्प आदि से पूजन करने वाला प्राणी अक्षय सुख भोगता हैं, तुलसीदल अथवा तुलसी मंजरियों से भगवान का पूजन करने, स्वर्ण की तुलसी ब्राह्मण को दान करने पर वैकुंठ लोक प्राप्त होता हैं, गूगल की धूप तथा दीप अर्पण करने वाला मनुष्य जन्म जन्मांतरों तक धनवान रहता हैं, पीपल का पेड़ लगाने, पीपल पर प्रति दिन जल चढ़ाने, पीपल की परिक्रमा करने, उत्तम ध्वनि वाला घंटा मंदिर में चढ़ाने, ब्राह्मणों का उचित सम्मान करने वाले व्यक्ति पर भगवान् श्री हरि विष्णु जी की विशेष कृपा दृष्टि सदा बनी रहती हैं।
किसी भी प्रकार का दान देने जैसे- कपिला गौ का दान, शहद से भरा चांदी का बर्तन तथा तांबे के पात्र में गुड़ भरकर दान करने, नमक, सत्तू, हल्दी, लाल वस्त्र, तिल, जूते, तथा छाता आदि का यथाशक्ति दान करने वाले मनुष्य को कभी भी किसी वस्तु की कमी जीवन में नहीं आती तथा वह सदा ही सर्व साधन सम्पन्न रहता हैं।
जो व्रत की समाप्ति अर्थात उद्यापन करने पर अन्न, वस्त्र तथा शय्या का दान करते हैं वह अक्षय सुख को प्राप्त करते हैं तथा सदा धनवान रहते हैं, वर्षा ऋतु में गोपीचंदन का दान करने वालों को सभी प्रकार के भोग एवं मोक्ष मिलते हैं, जो नियम से भगवान् श्री गणेशजी तथा सूर्य भगवान् का पूजन करते हैं वह उत्तम गति को प्राप्त करते हैं, तथा जो शक्कर का दान करते हैं उन्हें यशस्वी संतान की प्राप्ति होती हैं।
माता लक्ष्मी तथा पार्वती को प्रसन्न करने के लिए चांदी के पात्र में हल्दी भर कर दान करनी चाहिये तथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बैल का दान करना श्रेयस्कर हैं, चातुर्मास में फलों का दान करने से नंदन वन का सुख मिलता हैं, जो लोग नियम से एक समय भोजन करते हैं, भूखों को भोजन खिलाते हैं, स्वयं भी नियमबद्ध होकर चावल अथवा जौ का भोजन करते हैं, भूमि पर शयन करते हैं उन्हें अक्षय कीर्ति प्राप्त होती हैं।
इन दिनों में आंवले से युक्त जल से स्नान करना तथा मौन रहकर भोजन करना श्रेयस्कर हैं, श्रावण अर्थात सावन के मास में साग एवम् हरि सब्जियां, भादों में दही, आश्विन में दूध तथा कार्तिक में दालें खाना वर्जित हैं, किसी की निंदा चुगली न करें तथा न ही किसी से धोखे से उसका कुछ हथियाना चाहिये, चातुर्मास में शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिये तथा कांसे के बर्तन में कभी भोजन नहीं करना चाहिये।
जो अपनी इन्द्रियों का दमन करता हैं वह अश्वमेध यज्ञ के फल को प्राप्त करता हैं, शास्त्रानुसार चातुर्मास एवं चौमासे के दिनों में देवकार्य अधिक होते हैं जबकि विवाह आदि उत्सव नहीं किये जाते, इन दिनों में मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा दिवस तो मनाए जाते हैं किन्तु नवमूर्ति प्राण प्रतिष्ठा व नवनिर्माण कार्य नहीं किये जाते, जबकि धार्मिक अनुष्ठान, श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ, श्री रामायण  तथा श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, हवन यज्ञ आदि कार्य अधिक होते हैं।
गायत्री मंत्र के पुरश्चरण व सभी व्रत सावन मास में सम्पन्न किए जाते हैं, सावन के मास में मंदिरों में कीर्तन, भजन, जागरण आदि कार्यक्रम अधिक होते हैं, स्कन्दपुराण के अनुसार संसार में मनुष्य जन्म तथा विष्णु भक्ति दोनों ही दुर्लभ हैं, किन्तु चार्तुमास में भगवान विष्णु का व्रत करने वाला मनुष्य ही उत्तम एवं श्रेष्ठ माना गया हैं।
चौमासे के इन चार मासों में सभी तीर्थ, दान, पुण्य, तथा देव स्थान भगवान् विष्णु जी की शरण लेकर स्थित होते हैं तथा चातुर्मास में भगवान विष्णु को नियम से प्रणाम करने वाले का जीवन भी शुभ फलदायक बन जाता हैं, भाई-बहनों! चौमासे के इन चार महीनों में नियम से रहते हुये, शुभ कार्य करते हुये, भगवान् श्री हरि विष्णुजी की भक्ति से जन्म जन्मांतरों के बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति करें।

कोकिला व्रत | Kokila Vrat | कोकिला व्रत की कहानी | Kokila Vrat Katha in Hindi


कोकिला व्रत | Kokila Vrat | कोकिला व्रत की कहानी | Kokila Vrat Katha in Hindi

Kokila Vrat
हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार समस्त कुंवारी कन्याएं कोकिला व्रत पूर्ण विधि से करती हैं, साथ ही इस व्रत को विवाहिताएँ भी कर सकती हैं। कोकिला व्रत कुमारी कन्या सुयोग्य पति की कामना के लिए करती हैं। इस व्रत के प्रभाव से व्रती को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती हैं। यह व्रत आषाढ़ माह की पूर्णिमा को ही मनाया जाता है। इस व्रत को दक्षिण भारत में अधिक मनाया जाता है। इस व्रत को करने वाली स्त्रियाँ सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करने के पश्चात सुगंधित इत्र का प्रयोग करती हैं। यह नियम से आठ दिन तक चलता है. प्रातःकाल भगवान भास्कर की पूजा करने का विधान है।

कोकिला व्रत की पौराणिक कथा

पौराणिक कथानुसार जब देवों के राजा दक्ष की बेटी सती अपने पिता के अनुमति के खिलाफ भगवान शिव जी से विवाह कर लेती हैं। जिस कारण राजा दक्ष बेटी सती से नाराज हो जाते हैं। राजा दक्ष भगवान शिव जी के रहन-सहन से घृणा करते थे।
उनको भगवान शिवजी पसंद नहीं थे। इसी कारण राजा दक्ष बेटी सती से सभी सम्बन्ध तोड़ लेते हैं। एक बार राजा दक्ष ने बहुत बड़ा यज्ञ किया जिसमें सभी देव गण एवम् देवियों को आमंत्रित किया लेकिन भगवान शिवजी तथा देवी सती को इस यज्ञ में आमंत्रित नहीं किया गया।
भगवान शिव जी माँ सती को बिना बुलाये ना जाने को कहते हैं किन्तु माँ सती उस यज्ञ में शामिल होने अपने पिता के घर पर पहुंच जाती हैं। इस यज्ञ में माँ सती तथा भगवान शिव जी को अपमानित किया जाता हैं। इस कारण माँ सती क्रोध में आकर यज्ञ कुण्ड में अपने शरीर का त्याग कर देती हैं।

अमरनाथ यात्रा की कथा एवं इतिहास

भगवान शिवजी के मना करने के पश्चात यज्ञ में शामिल होने के कारण क्रोध में आकर माँ भगवान शिवजी उन्हें कोकिला बनने का श्राप देते हैं। इस प्रकार माँ सती कोकिला बन 10 हजार वर्षों तक भटकती रहती हैं। इसके पश्चात माँ सती को श्राप से मुक्ति मिलती हैं। अगले जन्म में माँ सती पार्वती का रूप लेकर पुन: अवतरित होती हैं।
इस जन्म में माँ पार्वती कोकिला व्रत को करती हैं। व्रत के प्रभाव से माँ पार्वती का विवाह भगवान शिव जी से होती हैं। अतः यह व्रत कुमारी कन्या के लिए अति फलदायी हैं।

कोकिला व्रत पूजन विधि

इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठें, तथा सूर्योदय से पूर्व दैनिक कार्य से निवृत्त होकर स्नान कर लेना चाहिए। तत्पश्चात पीपल वृक्ष या आँवला वृक्ष के सान्निध्य में भगवान शिव जी एवम् माँ पार्वती की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करना चाहिए।

भगवान की पूजा जल, पुष्प, बेलपत्र, दूर्वा, धूप,दीप आदि से करें। इस दिन निराहार व्रत करना चाहिए। सूर्यास्त के पश्चात आरती-अर्चना करने के पश्चात फलाहार करना चाहिए। इस प्रकार कोकिला व्रत की कथा सम्पन्न हुई।

वासुदेव द्वादशी व्रत | व्रत पूजन विधि | Vasudeva Dwadashi Vrat | वासुदेव द्वादशी व्रत की कथा

वासुदेव द्वादशी व्रत | व्रत पूजन विधि | Vasudeva Dwadashi Vrat | वासुदेव द्वादशी व्रत की कथा

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आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वादशी अर्थात वासुदेव द्वादशी के दिन सभी श्रद्धालु गण व्रत रखेंगे। वासुदेव द्वादशी देवशयनी एकादशी के एक दिन बाद मनाई जाती हैं। इस दिन श्रीकृष्ण के साथ भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की पूजा की जाती हैं। आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद तथा अश्विन मास में जो भी यह पूजा करता हैं उसे मोक्ष की प्राप्ति  होती हैं। 
यह व्रत आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वादशी पर करना चाहिए। इसमें देवता वासुदेव की पूजा, तथा वासुदेव के विभिन्न नामों एवं उनके व्यूहों के साथ चरण से सिर तक के सभी अंगों की पूजा होती हैं। पहली बार यह व्रत वासुदेव तथा माता देवकी ने किया था। वासुदेव यदुवंशी शूर तथा मारिषा के पुत्र, कृष्ण के पिता, कुंती के भाई तथा मथुरा के राजा उग्रसेन के मंत्री थे। इनका विवाह देवकी अथवा आहुक की सात कन्याओं से हुआ था जिनमें देवकी सर्वप्रमुख थी। वासुदेव के नाम पर ही कृष्ण को वासुदेव (अर्थात् वासुदेव के पुत्र) कहते हैं। वासुदेव के जन्म के समय देवताओं ने आनक तथा दुंदुभि बजाई थी जिससे इनका एक नाम आनकदुंदुभि भी पड़ा। 

वासुदेव द्वादशी व्रत की कथा

चुनार देश का प्राचीन नाम करुपदेश था। वहां के राजा का नाम पौंड्रक था। कुछ लोग मानते हैं कि पुंड्र देश का राजा होने से इसे पौंड्रक भी कहते थे। कुछ लोग मानते हैं कि वह काशी नरेश ही था। चेदि देश में यह पुरुषोत्तम नाम से विख्यात था। इसके पिता का नाम वासुदेव था। इसलिए वह खुद को वासुदेव कहता था। यह द्रौपदी स्वयंवर में उपस्थित था। कौशिकी नदी के तट पर किरात, वंग एवं पुंड्र देशों पर इसका स्वामित्व था। यह मूर्ख एवं अविचारी था।
पौंड्रक को उसके मूर्ख तथा चापलूस मित्रों ने यह बताया कि असल में वही परमात्मा वासुदेव तथा वही विष्णु का अवतार हैं, मथुरा का राजा कृष्ण नहीं। कृष्ण तो ग्वाला हैं। पुराणों में उसके नकली कृष्ण का रूप धारण करने की कथा आती हैं।
राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। एक दिन उसने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा था कि 'पृथ्वी के समस्त लोगों पर अनुग्रह कर उनका उद्धार करने के लिए मैंने वासुदेव नाम से अवतार लिया हैं। भगवान वासुदेव का नाम एवं वेषधारण करने का अधिकार केवल मेरा हैं। इन चिह्नों पर तेरा कोई भी अधिकार नहीं हैं। तुम इन चिह्नों एवं नाम को तुरंत ही छोड़ दो, वरना युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।
बहुत समय तक श्रीकृष्ण ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया, बाद में जब उसकी बातें असहनीय हो गई । तब उन्होंने उसे प्रत्युत्तर भेजा, 'तेरा संपूर्ण विनाश करके, मैं तेरे सारे गर्व का परिहार शीघ्र ही करूंगा।
यह सुनकर राजा पौंड्रक श्रीकृष्ण के विरुद्ध युद्ध की तैयारी शुरू करने लगा। वह अपने मित्र काशीराज की सहायता प्राप्त करने के लिए काशीनगर गया। यह सुनते ही श्रीकृष्ण ने ससैन्य काशीदेश पर आक्रमण किया।
श्रीकृष्ण आक्रमण कर रहे हैं- यह देखकर पौंड्रक तथा काशीराज अपनी-अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर आए। युद्ध के समय पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, वनमाला, रेशमी पीतांबर, उत्तरीय वस्त्र, मूल्यवान आभूषण आदि धारण कर रखे थे एवं वह गरूड़ पर आरूढ़ था।
नाटकीय ढंग से युद्धभूमि में प्रविष्ट हुए इस नकली कृष्ण को देखकर भगवान कृष्ण को अत्यंत हंसी आई। इसके बाद युद्ध हुआ तथा पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन: द्वारिका चले गए।
बाद में बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र सुदक्षण ने कृष्ण का वध करने के लिए मारण-पुरश्चरण यज्ञ किया, लेकिन द्वारिका की ओर गई वह आग की लपट रूप कृत्या ही पुन: काशी में आकर सुदक्षणा की मृत्यु का कारण बन गई। उसने काशी नरेश पुत्र सुदक्षण को ही भस्म कर दिया।

वासुदेव द्वादशी की व्रत पूजन विधि

सर्वप्रथम जलपात्र में रखकर तथा दो वस्त्रों से ढंककर वासुदेव की स्वर्णिम प्रतिमा का पूजन तथा उसका दान करना चाहिए। यह व्रत नारद द्वारा वासुदेव एवं देवकी को बताया गया था। इसके करने से जातक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। 
उसे पुत्र की प्राप्ति होती हैं या नष्ट हुआ राज्य पुन: मिल जाता हैं। सुबह सर्वप्रथम स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए।
इस दिन आप को पूरे दिन व्रत रहना होगा। भगवान को आप हाथ के पंखे, लैंप के साथ फल फूल चढ़ाने चाहिए। भगवान विष्णु की पंचामृत से पूजा करनी चाहिए। उन्हें भोग लगाना चाहिए। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का जाप करने से आप की हर समस्या  का समाधान होगा।

11 July 2019

देवशयनी एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Devshayani Ekadashi 2019

देवशयनी एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त |  Devshayani Ekadashi 2019

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देवशयनी एकादशी क्या हैं?

वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिक मास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न-भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशियों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्री विष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुक्ल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्री विष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्रि जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसमें भगवान विष्णु का क्षीरसागर में चार मास की अवधि के लिए शयनकाल प्रारम्भ हो जाता हैं, अतः आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता हैं। देवशयनी एकादशी को पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी तथा हरिशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता हैं। देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु योग-निंद्रा में चले जाते हैं तथा देवशयनी एकादशी के चार मास के पश्चात प्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान् विष्णु पुनः जागते हैं। अतः प्रबोधिनी एकादशी को देवउठनी एकादशी भी कहा जाता हैं। इस बीच के अंतराल को ही चातुर्मास काल कहा गया हैं। अतः सम्पूर्ण वर्ष में देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक महीने की शुक्ल एकादशी अर्थात देवउठनी एकादशी तक यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, गृह निर्माण, ग्रहप्रवेश, यज्ञ आदि धर्म कर्म से जुड़े प्रत्येक शुभ कार्य करना अच्छा नहीं माना जाता हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष महत्व का वर्णन किया गया हैं। इस एकादशी के व्रत से मनुष्योकी समस्त मनोकामनाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। व्रती के प्रत्येक पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। यह भी कहा गया हैं की, यदि जातक चातुर्मास का सच्चे वचन से, विधिपूर्वक पालन करें तो उसे मरणोपरांत मोक्ष अवश्य प्राप्त होता हैं।

        देवशयनी एकादशी व्रत का पारण

        एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण न किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 11 जुलाई, गुरुवार की मध्यरात्रि 01 बजकर 02 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 12 जुलाई, शुक्रवार की मध्यरात्रि 12 बजकर 31 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में देवशयनी एकादशी का व्रत 12 जुलाई, शुक्रवार के दिन किया जाएगा। 
इस वर्ष 2019 में, देवशयनी एकादशी का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 13 जुलाई, शनिवार की प्रातः 06 बजकर 32 से 8 बजकर 29 मिनिट तक का रहेगा।
(हरि वासर समाप्त होने का समय - 06:32)

02 July 2019

आषाढ़ मास की अमावस्या | अत्यंत ही पुण्यदायिनी तिथि | सूर्य ग्रहण | आषाढ़ अमावस्या | तिथि व मुहूर्त

आषाढ़ मास की अमावस्या | अत्यंत ही पुण्यदायिनी तिथि | सूर्य ग्रहण | आषाढ़ अमावस्या | तिथि व मुहूर्त

ashadha amavasya importance
ashada amavasya good or bad
मंगलवार-2 जुलाई-2019
मृगशीर्ष नक्षत्र-सुबह 8.13 तक
सुबह 8.14 से आर्द्रा नक्षत्र 

हिन्दु कैलेण्डर में नये चन्द्रमा के दिन को अमावस्या कहते हैं। यह एक महत्वपूर्ण दिन होता है क्योंकि कई धार्मिक कृत्य केवल अमावस्या तिथि के दिन ही किये जाते हैं।

अमावस्या जब सोमवार के दिन पड़ती है तो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं और अमावस्या जब शनिवार के दिन पड़ती है तो उसे शनि अमावस्या कहते हैं।

पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए अमावस्या के सभी दिन श्राद्ध की रस्मों को करने के लिए उपयुक्त हैं। कालसर्प दोष निवारण की पूजा करने के लिए भी अमावस्या का दिन उपयुक्त होता है।

आषाढ़ अमावस्या मुहूर्त

जुलाई 2, 2019 को 03:07:09 से अमावस्या आरम्भ जुलाई 3, 2019 को 00:47:18 पर अमावस्या समाप्त

धार्मिक दृष्टि से अमावस्या की तिथि का बहुत महत्व है। क्योंकि यह दिन दान-पुण्य और पितरों की शांति के लिए किये जाने वाले तर्पण के लिए बहुत ही उत्तम माना जाता है। आषाढ़ मास की अमावस्या को भी खास माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार का आषाढ़ माह हिंदू वर्ष का चौथा महीना होता है। इस दिन पवित्र नदियों, धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नान करने का विशेष महत्व है।

आषाढ़ अमावस्या व्रत एवं धार्मिक कर्म

हर अमावस्या की भांति आषाढ़ अमावस्या पर भी पितरों के तर्पण का भी विशेष महत्व है। इस दिन किये जाने वाले धार्मिक कर्मकांड इस प्रकार हैं-

● इस दिन नदी, जलाशय या कुंड आदि में स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य देने के बाद पितरों का तर्पण करें।

● पितरों की आत्मा की शांति के लिए उपवास करें और किसी गरीब व्यक्ति को दान-दक्षिणा दें।

● अमावस्या के दिन शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक लगाएं और अपने पितरों को स्मरण करें। पीपल की सात परिक्रमा लगाएं।

आषाढ़ अमावस्या का महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास हिंदू वर्ष का चौथा महीना होता है। इस महीने की समाप्ति के बाद वर्षा ऋतु प्रारंभ होती है। आषाढ़ अमावस्या दान-पुण्य व पितरों की आत्मा की शांति के लिये किये जाने वाले धार्मिक कर्मों के लिए विशेष फलदायी मानी गई है। इस दिन पवित्र नदी और तीर्थ स्थलों पर स्नान का कई गुना फल मिलता है। धार्मिक रूप से अमावस्या तिथि का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या तो शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या शनि अमावस्या कहलाती है।

जो अमावस्या पुष्य, पुनर्वसु या आर्द्रा नक्षत्र से युक्त हो, उसमें पूजित होने से पितृगण बारह वर्षों तक तृप्त रहते हैं।

अमावस्या नारायण की प्रिय तिथियों में से एक है, इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ जरूर करें अगर पाठ कर पाना संभव नहीं तो श्रवण करें।

अगर संभव हो तो किसी तीर्थ क्षेत्र, विशेषकर गंगाजी में स्नान करें और यदि न जा पायें तो घर पर ही नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें !

अमावस्या के दिन अपने घर की अच्छे से साफ़ सफाई करें, मोटा नमक मिले हुए पानी से घर में पोंछा लगायें, झाले हटायें एवं बिना काम का सामान या तो रद्दी वाले को दें या फेंक दें !

शाम के समय सुगंधित धूप घर में लगायें एवं लक्ष्मी-हृदय स्तोत्र सुनें ! (मोबाइल इत्यादि पर घर में बजाएं )

पितरों का श्राद्ध करें और अगर श्राद्ध करने में असमर्थ हैं तो कम से कम  तिल मिश्रित जल अपने पितरों के निमित्त अर्पण करना चाहिए !

अमावस्या के दिन अपने पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करायें ! अन्न दान, वस्त्र दान एवं तिलदान  करें ।

अन्नदान ब्राह्मणों के साथ साथ गरीबों एवं जरुरतमंदों को भी कर सकते हैं, याद रखिये "कलियुग में दान ही प्रधान धर्म माना गया है !"

जरूर करें : गौ सेवा अर्थात देशी गाय को चारा या जो संभव हो जरूर खिलायें, अनंत लाभ होगा, गौ सेवा से हुए लाभ को बताने के लिए शब्द कम पड़ जायेंगे, लेकिन ध्यान दीजियेगा, गाय देशी ही हो ।

कौवों को कुछ भोजन दें, चींटियों के निमित्त आटे एवं शक्कर को मिलाकर किसी पेड़ के निचे रखें, मछलियों को दाना दें।

पितरों के निमित्त एक नारियल बहते जल में प्रवाहित करें एवं उनसे आपके ऊपर अपनी कृपा दृष्टि बनाये रखने की प्रार्थना करें ।

सुबह या शाम के समय पीपल का पूजन, दीपक थोडा बड़ा ले लीजिये, जिससे की दीपक 6-7 घंटे अर्थात लम्बे समय तक जल सके !

भूलियेगा मत: "जो व्यक्ति अमावस्या को दूसरों का अन्न खाता है उसका महीने भर का पुण्य उस अन्न के स्वामी/दाता को चला जाता है !"
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प्रत्येक मास में चंद्रमा की कलाएं घटती और बढ़ती रहती हैं। चंद्रमा की घटती बढ़ती कलाओं से ही प्रत्येक मास के दो पक्ष बनाये गये हैं। जिस पक्ष में चंद्रमा घटती कला का होता है तो उसे कृष्ण पक्ष कहा जाता है और चढ़ती कला के चंद्रमा वाले पक्ष को शुक्ल पक्ष कहा जाता है। ऐसे में प्रत्येक पक्ष का अंतिम दिन बहुत ही महत्वपूर्ण जाता है। शुक्ल पक्ष का अंतिम दिन यानि जिस दिन चंद्रमा की कलाएं चढ़ते-चढ़ते चंद्रमा अपने वास्तविक रूप में गोल गोल और दूधिया रोशनी वाला दिखाई दे वह पूर्णिमा कहलाता है तो जब चंद्रमा घटते घटते बिल्कुल समाप्त हो जाये और रात घोर अंधकार वाली हो तो उसे अमावस्या कहते हैं। धार्मिक रूप से अमावस्या तिथि का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। सोमवार के दिन पड़ने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या तो शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या शनि अमावस्या कहलाती है। आषाढ़ मास की अमावस्या को भी खास माना जाता है।

आषाढ़ अमावस्या (ASHADHA AMAVASYA)

आषाढ़ मास हिंदू पंचांग के अनुसार का हिंदू वर्ष का चौथा महीना माना जाता है। आषाढ़ मास की अमावस्या के पश्चात वर्षा ऋतु का आगमन भी माना जाता है। इस मायने में आषाढ़ अमावस्या का बहुत ही महत्व है। दान-पुण्य व पितरों की आत्मा की शांति के लिये किये जाने वाले अनुष्ठानों के लिये तो यह तिथि चिर-परिचित है ही। अमावस्या के दिन पवित्र नदियों, धार्मिक तीर्थ स्थलों पर स्नान का भी विशेष महत्व माना जाता है।

2019 में क्यों खास है आषाढ़ अमावस्या (ASHADHA AMAVASYA IN 2019)

2019 में आषाढ़ अमावस्या 2 जुलाई को है। जो जातक अमावस्या को पितृकर्म करना चाहते हैं ज्योतिषाचार्यों के अनुसार उन्हें 2 जुलाई को पितृकर्म संपन्न करवाना चाहिये। अमावस्या तिथि 2 जुलाई को प्रात: 3 बजकर 06 मिनट से आरंभ हो रही है जो कि 3 जुलाई मध्य रात्रि 12 बजकर 46 मिनट तक रहेगी।

आषाढ़ अमावस्या को लगेगा 2019 का दूसरा सूर्य ग्रहण

आषाढ़ मास की अमावस्या को वर्ष का दूसरा सूर्यग्रहण लगेगा। चूंकि यह ग्रहण मध्यरात्रि के समय लग रहा है इस कारण भारत में इसे नहीं देखा जा सकेगा जिसके कारण भारतीयों पर इसका असर नहीं पड़ेगा। इसी कारण यहां सूतक पर कोई विचार प्रकट नहीं किया गया है।

आषाढ़ अमावस्या तिथि व मुहूर्त (ASHADHA AMAVASYA TITHI MUHURAT)

अमावस्या तिथि – 2 जुलाई 2019
अमावस्या तिथि आरंभ – 03:06 बजे से (2 जुलाई 2019)
अमावस्या तिथि समाप्त – 00:46 बजे तक (3 जुलाई 2019)

नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | गुप्त नवरात्र 2019 | Ghat Sthapana kab hai | Gupt Navratra 2019

नवरात्र कलश स्थापना शुभ मुहूर्त | गुप्त नवरात्र 2019 | Ghat Sthapana kab hai | Gupt Navratra 2019
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       ॥  जय माता दी 
जय श्री कालका माँ

नमो देवी महाविद्ये नमामि चरणौ तव।
सदा ज्ञानप्रकाशं में देहि सर्वार्थदे शिवे॥
        सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी।
        त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः॥
         
नवरात्र हिन्दुओं का अत्यंत पवित्र तथा प्रमुख त्यौहार हैं। देवी दुर्गा माँ को शक्ति का प्रतीक माना जाता हैं। मान्यता हैं कि, माताजी स्वयं ही इस चराचर संसार में शक्ति का संचार निरंतर करती रहती हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार प्रत्येक वर्ष में मुख्य दो बार नवरात्र आते हैं, तथा अन्य गुप्त नवरात्र भी आते हैं। प्रथम नवरात्र का प्रारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष से होता हैं। तथा अगले नवरात्र शारदीय नवरात्रे कहलाते हैं, जो आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होकर नवमी तिथि तक रहते हैं। वहीं, गुप्त नवरात्र माघ, पौष तथा आषाढ़ के मास में मनाए जाते हैं। नवरात्र की पूजा नौ दिनों तक होती हैं तथा इन नौ दिनों में माताजी के नौ भिन्न-भिन्न स्वरुपों की पूजा की जाती हैं। माताजी के नौ रूप इस प्रकार हैं- माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा माँ, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, माँ महागौरी तथा सिद्धिदात्रि माँ। ठीक उसी प्रकार गुप्त नवरात्र में दस महाविद्याओं की साधना की जाती हैं। गुप्त नवरात्र के दौरान साधक महाविद्या अर्थात तंत्र साधना के लिए मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां ध्रूमावती, माता बगलामुखी, मातंगी तथा कमला देवी की पूजा करते हैं।
जब चातुर्मास में भगवान विष्णु शयन काल की अवधि के बीच होते हैं तब देव शक्तियां क्षीण होने लगती हैं। उस समय पृथ्वी पर रुद्र, वरुण, यम आदि का प्रकोप बढ़ने लगता हैं इन विपत्तियों से बचाव के लिए गुप्त नवरात्र में मां दुर्गा की उपासना की जाती हैं। इस समय आध्यात्मिक ऊर्जा ग्रहण करने के लिए लोग विशिष्ट अनुष्ठान करते हैं। इस अनुष्ठान में देवी के स्वरूपों की साधना पूर्ण श्रद्धा से की जाती हैं। मान्यतानुसार गुप्त नवरात्र के दौरान देवी के पूजन करने की विधि अन्य नवरात्र के समान ही रहती हैं। नौ दिनों तक व्रत का संकल्प लेते हुए प्रतिपदा को घटस्थापना कर प्रतिदिन दोनों पहर मां दुर्गा की पूजा की जाती हैं। अष्टमी या नवमी के दिन कन्याओं के पूजन के साथ व्रत का उद्यापन किया जाता हैं अर्थात व्रत का पारण किया जाता हैं।
नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में व्रत का संकल्प किया जाता हैं। अतः व्रत का संकल्प लेते समय उसी प्रकार संकल्प लें, जीतने दिन आपको व्रत रखना हैं। व्रत-संकल्प के पश्चात ही घट-स्थापना की विधि प्रारंभ की जाती हैं। घट-स्थापना सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में ही करना चाहिए, ऐसा करने से घर में सुख, शांति तथा समृद्धि व्याप्त रहती हैं।
हिन्दू धर्म में प्रत्येक पूजा से पूर्व भगवान गणेश जी की पूजा का विधान हैं, अतः नवरात्र की शुभ पूजा से पूर्व कलश के रूप में श्री गणेश महाराज को स्थापित किया जाता हैं। नवरात्र के आरंभ की प्रतिपदा तिथि के दिन कलश या घट की स्थापना की जाती हैं। कलश को भगवान गणेश का रूप माना जाता हैं।

कलश स्थापना करते समय इन विशेष नियमो का ध्यान अवश्य रखना चाहिए-

कृपया ध्यान दे:-

1.  नवरात्र में देवी पूजा के लिए जो कलश स्थापित किया जाता हैं, वह सोना, चांदी, तांबा, पीतल या मिट्टी का ही होना चाहिए। लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग पूजा में नहीं करना चाहिए।
2.  नवरात्र में कलश स्थापना किसी भी समय किया जा सकता हैं। नवरात्र के प्रारंभ से ही अच्छा समय प्रारंभ हो जाता हैं, अतः यदि जातक शुभ मुहूर्त में घट स्थापना नहीं कर पाते हैं तो वे सम्पूर्ण दिवस किसी भी समय कलश स्थापित कर सकते हैं।
3.  कलश स्थापना करने से पूर्व, अपने घर में देवी माँ का स्वागत करने के लिए, घर की साफ-सफाई अच्छे से करनी चाहिए।
4.  नवरात्रों में माँ भगवती की आराधना “दुर्गा सप्तसती” से की जाती हैं, परन्तु यदि समयाभाव हैं तो भगवान् शिव रचित “सप्तश्लोकी दुर्गा” का पाठ अत्यंत ही प्रभाव शाली हैं एवं दुर्गा सप्तसती का पाठ सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाला हैं।
5.  नवरात्रि के दौरान सात्विक जीवन व्यतीत करना चाहिए। अतः नवरात्रि के दौरान भूमि शयन करना चाहिए तथा सात्त्विक आहार, जैसे कि आलू, कुट्टू का आटा, दूध-दही तथा फल आदि ग्रहण करना चाहिए।

गुप्त नवरात्रि 2019
इस वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 02 जुलाई, मंगलवार की मध्यरात्रि 12 बजकर 45 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 03 जुलाई, बुधवार की रात्रि 10 बजकर 04 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष 2019 में गुप्त नवरात्रि का शुभारंभ 03 जुलाई, बुधवार के दिन से हो रहा हैं। तथा यह नवरात्र 11 जुलाई, गुरुवार तक रहेंगे।
नवरात्र के प्रथम दिन अर्थात 03 जुलाई, बुधवार के दिन माता दुर्गाजी के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की पूजा होगी। पार्वती तथा हेमवती भी माँ शैलपुत्री के अन्य नाम हैं।
इस वर्ष 2019 में देवी दुर्गा माताजी का आगमन नाव पर होगा तथा उनका प्रस्थान मनुष्य के सवारी पर होगा।

गुप्त नवरात्रि घटस्थापना (कलश स्थापना) मुहूर्त
इस वर्ष, 2019 में, आषाढ़ गुप्त नवरात्रि घट-स्थापना अर्थात कलश स्थापना करने का शुभ मुहूर्त, 03 जुलाई, बुधवार की प्रातः 05 बजकर 44 मिनिट से 06 बजकर 47 मिनिट तक का रहेगा। यदि इस सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त में आप कलश स्थापना करेंगे तो यह अति लाभदायक एवं शुभ फलदायक सिद्ध होगा।

नवरात्रि पारण
इस वर्ष आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 10 जुलाई, बुधवार की मध्यरात्रि 02 बजकर 02 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 11 जुलाई, गुरुवार की मध्यरात्रि 01 बजकर 02 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।
अतः इस वर्ष, गुप्त नवरात्रि व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 11 जुलाई, गुरुवार की प्रातः 05 बजकर 54 मिनिट के पश्चात का रहेगा।

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