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22 January 2019

आज का हिन्दू पंचांग | Aaj ka Hindu Panchang

🌞~ आज का हिन्दू #पंचांग ~🌞

aaj ka Panchang 22 january 2019
aaj ka Panchang in hindi

⛅ दिनांक 22 जनवरी 2019

⛅ दिन - मंगलवार
⛅ विक्रम संवत - 2075
⛅ शक संवत -1940
⛅ अयन - उत्तरायण
⛅ ऋतु - शिशिर
⛅ मास - पौष
⛅ पक्ष - शुक्ल  
⛅ तिथि - द्वितीया 23 जनवरी प्रातः 03:25 तक तत्पश्चात तृतीया
⛅ नक्षत्र - अश्लेशा रात्रि 11:32 तक तत्पश्चात मघा
⛅ योग - आयुष्मान् 23 जनवरी रात्रि 02:04 तक तत्पश्चात सौभाग्य
⛅ राहुकाल - शाम 03:34 से शाम 04:56 तक
⛅ सूर्योदय - 07:19
⛅ सूर्यास्त - 18:21
⛅ दिशाशूल - उत्तर दिशा में
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💥 विशेष - द्वितीया को बृहती (छोटा  बैंगन या कटेहरी) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

🌷 संकष्टी चतुर्थी / संकट  चौथ 🌷
👉🏻https://youtu.be/4QEd_Nc3LBA
➡ 24 जनवरी 2019 गुरुवार  को संकट  चौथ, संकष्टी चतुर्थी का त्यौहार है। इस चतुर्थी को 'माघीचतुर्थी', 'तिलचौथ', ‘वक्रतुण्डी चतुर्थी’ भी कहा जाता है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र रहेगा।
🙏🏻 इस दिन गणेश भगवान तथा संकट  माता की पूजा का विधान है। संकष्ट का अर्थ है 'कष्ट या विपत्ति', 'कष्ट' का अर्थ है 'क्लेश', सम् उसके आधिक्य का द्योतक है। आज किसी भी प्रकार के संकट, कष्ट का निवारण संभव है। आज के दिन व्रत रखा जाता है। इस व्रत का आरम्भ ' गणपतिप्रीतये संकष्टचतुर्थीव्रतं करिष्ये ' - इस प्रकार संकल्प करके करें  । सायंकालमें गणेशजी का और चंद्रोदय के समय चंद्र का पूजन करके अर्घ्य दें।
'गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धि प्रदायक।
संकष्टहर में देव गृहाणर्धं नमोस्तुते।
कृष्णपक्षे चतुर्थ्यां तु सम्पूजित विधूदये।
क्षिप्रं प्रसीद देवेश गृहार्धं नमोस्तुते।'
🙏🏻 नारदपुराण, पूर्वभाग अध्याय 113 में संकष्टीचतुर्थी व्रत का वर्णन इस प्रकार मिलता है।
माघकृष्णचतुर्थ्यां तु संकष्टव्रतमुच्यते । तत्रोपवासं संकल्प्य व्रती नियमपूर्वकम् ।। ११३-७२ ।।
चंद्रोदयमभिव्याप्य तिष्ठेत्प्रयतमानसः । ततश्चंद्रोदये प्राप्ते मृन्मयं गणनायकम् ।। ११३-७३ ।।
विधाय विन्यसेत्पीठे सायुधं च सवाहनम् । उपचारैः षोडशभिः समभ्यर्च्य विधानतः ।। ११३-७४ ।।
मोदकं चापि नैवेद्यं सगुडं तिलकुट्टकम् । ततोऽर्घ्यं ताम्रजे पात्रे रक्तचंदनमिश्रितम् ।। ११३-७५ ।।
सकुशं च सदूर्वं च पुष्पाक्षतसमन्वितम् । सशमीपत्रदधि च कृत्वा चंद्राय दापयेत् ।। ११३-७६ ।।
गगनार्णवमाणिक्य चंद्र दाक्षायणीपते । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक ।। ११३-७७ ।।
एवं दत्त्वा गणेशाय दिव्यार्घ्यं पापनाशनम् । शक्त्या संभोज्य विप्राग्र्यान्स्वयं भुंजीत चाज्ञया ।। ११३-७८ ।।
एवं कृत्वा व्रतं विप्र संकष्टाख्यं शूभावहम् । समृद्धो धनधान्यैः स्यान्न च संकष्टमाप्नुयात् ।। ११३-७९ ।।
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🙏🏻 माघ कृष्ण चतुर्थी को ‘संकष्टवव्रत’ बतलाया जाता है। उसमें उपवास का संकल्प  लेकर व्रती सबेरे से चंद्रोदयकाल तक नियमपूर्वक रहे। मन को काबू में रखे। चंद्रोदय होने पर मिट्टी की गणेशमूर्ति बनाकर उसे पीढ़े पर स्थापित करे। गणेशजी के साथ उनके आयुध और वाहन भी होने चाहिए। मिटटी में गणेशजी की स्थापना करके षोडशोपचार से विधिपूर्वक उनका पूजन करें । फिर मोदक तथा गुड़ से  बने हुए तिल के लडडू का नैवेद्य अर्पण करें।
तत्पश्चात्‌ तांबे के पात्र में लाल चन्दन, कुश, दूर्वा, फूल, अक्षत, शमीपत्र, दधि और जल एकत्र करके निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करते हुए उन्हें चन्द्रमा को अर्घ्य दें -
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।
गृहाणार्घ्यं मया दत्तं गणेशप्रतिरूपक॥
'गगन रूपी समुद्र के माणिक्य, दक्ष कन्या रोहिणी के प्रियतम और गणेश के प्रतिरूप चन्द्रमा! आप मेरा दिया हुआ यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।’
इस प्रकार गणेश जी को यह दिव्य तथा पापनाशन अर्घ्य देकर यथाशक्ति उत्तम ब्राह्मणों को भोजन कराने के पश्च्यात स्वयं भी उनकी आज्ञा लेकर भोजन करें। ब्रह्मन ! इस प्रकार कल्याणकारी ‘संकष्टवव्रत’ का पालन करके मनुष्य धन-धान्य से संपन्न होता है। वह कभी कष्ट में नहीं पड़ता।
🙏🏻 लक्ष्मीनारायणसंहिता में भी कुछ इसी प्रकार वर्णन मिलता है ।
माघकृष्णचतुर्थ्यां तु संकष्टहारकं व्रतम् ।
उपवासं प्रकुर्वीत वीक्ष्य चन्द्रोदयं ततः ।। १२८ ।।
मृदा कृत्वा गणेशं सायुधं सवाहनं शुभम् ।
पीठे न्यस्य च तं षोडशोपचारैः प्रपूजयेत् ।। १२९ ।।
मोदकाँस्तिलचूर्णं च सशर्करं निवेदयेत् ।
अर्घ्यं दद्यात्ताम्रपात्रे रक्तचन्दनमिश्रितम् ।। १३० ।।
कुशान् दूर्वाः कुसुमान्यक्षतान् शमीदलान् दधि ।
दद्यादर्घ्यं ततो विसर्जनं कुर्यादथ व्रती ।। १३१ ।।
भोजयेद् भूसुरान् साधून् साध्वीश्च बालबालिकाः ।
व्रती च पारणां कुर्याद् दद्याद्दानानि भावतः ।। १३२ ।।
एवं कृत्वा व्रतं स्मृद्धः संकटं नैव चाप्नुयात् ।
धनधान्यसुतापुत्रप्रपौत्रादियुतो भवेत् ।। १३३ ।।
➡ भविष्यपुराण में भी इस व्रत का वर्णन मिलता है  ।
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👉🏻 आज के दिन क्या करें
➡ १. गणपति अथर्वशीर्ष का पाठ अत्यन्त शुभकारी होगा ।
➡ २. गणेश भगवान को दूध (कच्चा), पंचामृत, गंगाजल से स्नान कराकर, पुष्प, वस्त्र आदि समर्पित करके तिल तथा गुड़ के लड्डू, दूर्वा का भोग जरूर लगायें। लड्डू की संख्या 11 या 21 रखें। गणेश जी को मोदक (लड्डू), दूर्वा घास तथा लाल रंग के पुष्प अति प्रिय हैं । गणेश अथर्वशीर्ष में कहा गया है "यो दूर्वांकुरैंर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति" अर्थात जो दूर्वांकुर के द्वारा भगवान गणपति का पूजन करता है वह कुबेर के समान हो जाता है।  "यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छित फलमवाप्रोति" अर्थात जो सहस्र (हजार) लड्डुओं (मोदकों) द्वारा पूजन  करता है, वह वांछित फल को प्राप्त करता है।
➡ ३. आज गणपति के 12 नाम या 21 नाम या 101 नाम से पूजा करें ।
➡ ४. शिवपुराण के अनुसार “महागणपतेः पूजा चतुर्थ्यां कृष्णपक्ष के। पक्षपापक्षयकरी पक्षभोगफलप्रदा ॥ “ अर्थात प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को की हुई महागणपति की पूजा एक पक्ष के पापों का नाश करनेवाली और एक पक्ष तक उत्तम भोगरूपी फल देनेवाली होती है ।
➡ ५. किसी भी समस्या के समाधान के लिए आज संकट नाशन गणेश स्तोत्र के 11 पाठ करें।

02 January 2019

हिन्दू नव वर्ष कब मनाया जाता हैं | हिंदू नव-वर्ष 2019 | Bhartiya Nav Varsh Kab Aata Hai | Hindu Nav Varsh 2019

हिन्दू नव वर्ष कब मनाया जाता हैं | हिंदू नव-वर्ष 2019 | Bhartiya Nav Varsh Kab Aata Hai | Hindu Nav Varsh 2019

bhartiya nav varsh kab aata hai
Bhartiya Nav Varsh Kab Aata Ha
 सर्वप्रथम आपको सम्पूर्ण विश्व के साथ साथ भारत-वर्ष में अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने वाले अङ्ग्रेज़ी नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाए।

        यह नूतन-वर्ष आपके लिए शुभ रहे तथा आपको उज्ज्वल भविष्य प्रदान करें।


        आज के युग में अङ्ग्रेज़ी केलेण्डर का प्रचलन अत्यधिक तथा सर्वव्यापी हो गया हैं, किन्तु उससे भारतीय केलेण्डर का महत्व कभी कम नहीं किया जा सकता हैं। हमारे प्रत्येक त्यौहार एवं व्रत-उपवास, युग-पुरुषों की जयंती या पुण्यतिथि, विवाह तथा अन्य शुभ कार्यों के शुभ मुहूर्त आदि सभी भारतीय केलेण्डर अर्थात हिन्दू पंचांग के अनुसार ही देखे जाते हैं।

        सम्पूर्ण विश्व में नव-वर्ष का उत्सव प्रतिवर्ष 01 जनवरी के दिन ही धूमधाम तथा हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता हैं। यह नव-वर्ष अङ्ग्रेज़ी केलेण्डर के अनुसार मनाया जाता है, किन्तु भारतीय सनातन पंचांग के अनुसार नव-वर्ष चैत्र मास में मनाया जाता हैं। जिसे नव संवत्सर भी कहा जाता हैं। अङ्ग्रेज़ी केलेण्डर के अनुसार चैत्र मास मार्च या अप्रैल के महीने में आता हैं। इस दिन को महाराष्ट्र में गुड़ी पड़वा तथा आंध्र प्रदेश में उगादी पर्व के रूप में भी मनाया जाता हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिवस ही वासंती नवरात्र का प्रथम दिवस भी होता हैं। पुरातन ग्रथों के अनुसार इसी दिन सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी।

        चैत्र मास ही नव-वर्ष मनाने के लिए सर्वोत्तम हैं, क्यो की चैत्र मास में चारो ओर पुष्प खिल जाते हैं, वृक्षो पर नए पत्ते आ जाते हैं। चारो ओर हरियाली मानो प्रकृति नव-वर्ष मना रही हो। चैत्र मास में सर्दी जा रही होती हैं, गर्मी का आगमन होने जा रहा होता हैं। मनुष्य के लिए यह समय प्रत्येक प्रकार के वस्त्र पहनने के लिए उपयुक्त रहता हैं। चैत्र मास अर्थात मार्च या अप्रैल में विध्यालयों का परिणाम आता हैं एवं नई कक्षा तथा नया सत्र प्रारम्भ होता है, अतः चैत्र मास विद्यालयों के लिए नव-वर्ष ही माना गया हैं। चैत्र मास अर्थात 31 मार्च से 01 अप्रैल के दिन ही बैंक तथा सरकार नया सत्र प्रारम्भ होता हैं। चैत्र में नया पंचांग आता हैं। जिससे प्रत्येक भारतीय पर्व, विवाह तथा अन्य महूर्त देखे जाते हैं। चैत्र मास में ही फसल कटती हैं तथा नया अनाज घर में आता हैं तो किसानो का नया वर्ष यही हैं। भारतीय नव-वर्ष से प्रथम नवरात्र प्रारम्भ होता हैं जिस से घर-घर मे माता रानी की पूजा की जाती हैं, जो की वातावरण को शुद्ध तथा सात्विक बना देते हैं। चैत्र प्रतिपदा के दिन महाराज विक्रमादित्य द्वारा विक्रमी संवत् की शुरुआत, भगवान झूलेलाल का जन्म, नवरात्रे प्रारंम्भ, गुड़ी पड़वा, उगादि तथा ब्रहम्मा जी द्वारा सृष्टि की रचना इत्यादि का संबंध इस दिन से हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से प्रारम्भ कर के सूर्य-चन्द्र आदि की दिशा, मौसम, फसल, कक्षा, नक्षत्र, पौधों की नई पत्तिया, किसान की नई फसल, विद्यार्थी की नई कक्षा, मनुष्य में नया रक्त संचरण आदि परिवर्तन चैत्र से ही होते हैं।

        भारतीय सनातन केलेण्डर अर्थात हिन्दू पंचांग की गणना सूर्य तथा चंद्रमा के अनुसार की जाती हैं। यह सत्य हैं कि विश्व के अन्य प्रत्येक केलेण्डर किसी न किसी रूप में भारतीय पंचांग का ही अनुसरण करते हैं। मान्यता तो यह भी हैं कि विक्रमादित्य के काल में सर्व प्रथम भारतीयों द्वारा ही केलेण्डर अर्थात पंचाग का आविष्कार, गणना तथा विकास हुआ था। हिन्दू पंचांग के अनुसार से ही 12 महीनों का एक वर्ष तथा सप्ताह में सात दिनों का प्रचलन प्रारम्भ हुआ था। कहा जाता हैं कि भारत से ही युनानियों ने भारतीय पंचांग का विश्व के भिन्न-भिन्न राज्यो में प्रचार तथा प्रसार किया था।

        संवत केलेण्डर से भी पूर्व लगभग 6,700 ई.पू. हिंदूओं का प्राचीन सप्तर्षि संवत अस्तित्व में आ चुका था। किन्तु इसका विधि अनुसार प्रारम्भ लगभग 3,100 ई. पू. माना जाता हैं। साथ ही इसी समय में भगवान श्री कृष्ण जी के जन्म से कृष्ण केलेण्डर का प्रारम्भ भी माना जाता हैं। उसके पश्चात कलियुगी संवत का भी प्रारम्भ माना गया हैं। विक्रमी संवत का प्रारम्भ 57 ईसवीं पूर्व से माना जाता हैं। विक्रम संवत को नव संवत्सर भी कहा जाता हैं। संवत्सर पांच प्रकार का होता हैं जिसमें सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, सावन तथा अधिमास का समावेश किया गया हैं। यह 365 दिनों का होता हैं। इसका आरंभ मेष राशि में सूर्य की संक्राति से होता हैं। वहीं चंद्र वर्ष के मास चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि हैं इन महीनों का नाम नक्षत्रों के आधार पर रखा गया हैं। चंद्र वर्ष 354 दिनों का होता हैं, इसी कारण जो बढ़े हुए 10 दिन होते हैं वे चंद्रमास ही माने जाते हैं, किन्तु दिन बढ़ने के कारण इन्हें अधिमास कहा जाता हैं। नक्षत्रों की संख्या 27 हैं इस प्रकार एक नक्षत्र मास भी 27 दिन का ही माना जाता हैं। वहीं सावन वर्ष की अवधि लगभग 360 दिन की होती हैं। इसमें प्रत्येक महीना 30 दिन का होता हैं।

        इस वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि 05 अप्रैल, दोपहर 02 बनकर 20 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 06 अप्रैल दोपहर 03 बजकर 23 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

        अतः इस वर्ष भारतीय हिन्दू नव वर्ष 06 अप्रैल शनिवार के दिन मनाया जाएगा।




        01 जनवरी के दिन सम्पूर्ण विश्व में नव-वर्ष मनाया जाता हैं, किन्तु भारत एक विशाल तथा कृषि प्रधान देश हैं अतः भारत में विभिन्न क्षेत्रो में मौसम तथा संस्कृति एवं परंपराओं के आधार पर भिन्न-भिन्न नव-वर्ष मनाया जाता हैं। जो की इस प्रकार हैं-

   नवसंवत्सर- चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा
   उगाडी- तेलगू नव-वर्ष
   गुड़ी पड़वा- मराठी तथा कोंकनी नव-वर्ष
   बैसाखी- पंजाबी नव-वर्ष
   पुथंडु- तमिल नव-वर्ष
   बोहाग बिहू- असामी नव-वर्ष
   पोहलाबोईशाख- बंगाली नव-वर्ष
   बेस्तु वर्ष- गुजराती नव-वर्ष
   विषु- मलयालम नव-वर्ष
   नवरेह- कश्मीरी नव-वर्ष 
   हिजरी-इस्लामिक नव-वर्ष
hindu ka naya saal kab aata hai
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