06 February 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021

षटतिला एकादशी कब है 2021 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Shattila Ekadashi 2021 

shattila ekadashi vrat
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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना गया हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसके व्रत के दिन “तिल” का विशेष रूप से छ: प्रकार से उपयोग किया जाता हैं। जो की इस प्रकार हैं-

1- तिल से स्नान करना

2- तिल का उबटन लगाना

3- तिल से हवन करना

4- तिल से तर्पण करना

5- तिल का भोजन करना तथा

6- तिलों का दान करना

इस प्रकार, तिलों का छह प्रकार से उपयोग करने के कारण माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहा जाता हैं। अपने नाम के अनुसार यह व्रत तिलों से जुडा हुआ हैं, तिल का महत्व सर्वव्यापक हैं तथा हिन्दु धर्म में तिल अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। पूजा में भी तिल का विशेष महत्व होता हैं। माघ मास में शरद ऋतु अपने चरम पर होती हैं तथा यह मास के अंत के साथ ही सर्दियाँ जाने लगती हैं। इस मौसम में तिलों का व्यवहार अत्यंत बढ़ जाता हैं क्योंकि तिल का सेवन सर्दियों में अत्यंत लाभदायक रहता हैं। अतः स्नान, दान, तर्पण, आहार आदि में तिलों का विशेष महत्व होता हैं। जो जातक इस एकादशी का व्रत करता हैं, उसे यथासंभव तिलों से भरा घडा़, लोटा, या गिलास उचित ब्राह्मण को दान करना चाहिए। ऐसी मान्यता हैं की, इस एकदशी के दिन जातक जितने तिलों का दान करेगा उतने ही हज़ार वर्ष तक वह स्वर्गलोक का अधिकारी रहेगा।

 

षटतिला एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

 

ध्यान रहे,

१- एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।

२- यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।

३- द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।

४- एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।

५- व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।

६- व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।

७- जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।

८- यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

 

इस वर्ष माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी, रविवार की प्रातः 06 बजकर 26 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 08 फरवरी, सोमवार की प्रातः 04 बजकर 47 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

 

अतः इस वर्ष 2021 में षटतिला एकादशी का व्रत 07 फरवरी, रविवार के दिन किया जाएगा।

साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत 08 फरवरी, सोमवार के दिवस किया जाएगा।

 

इस वर्ष, षटतिला एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 08 फरवरी, सोमवार की दोपहर 01 बजकर 51 मिनिट से 04 बजकर 02 मिनिट तक का रहेगा।

हरि वासर समाप्त होने का समय - प्रातः 10 बजकर 25 मिनिट का रहेगा।

 साथ ही, वैष्णव एकादशी का व्रत का पारण 9 फरवरी, मंगलवार की प्रातः 07 बजकर 04 मिनिट से 09 बजकर 18 मिनिट तक का रहेगा।

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