02 January 2017

Maha Mrityunjaya Mantra with meaning in english lord Shiva

Om Triyambakam Yajamahe Sugandhim Pushtivardhanam,

Urvarukamiva Bandhanan Mrrityormokshiya Mamrritat


Meaning:-

           We worship Shiva - The three eyed (triyambakam) Lord (yajamahe), who is fragrant (sugandhim) and nourishes (pushti) and grows (vardhanam) all beings. As the ripened cucumber (urvarukamiva) is liberated (bandhanan) (by the intervention of the farmer) from its bondage to the creeper when it fully ripens, may He liberate us (mokshiya) from death (mrityor), for the sake of immortality (mamrritat).


           When we pray to Lord Shiva, we are in essence asking for his blessings and assistance in opening our third eye of spiritual wisdom. The natural consequence of this awakening is that we will be lead towards spiritual liberation or moksha, and attain freedom from the cycles of death and rebirth. The goal of chanting this mantra is to spiritually ripen so that Lord Shiva can free us from all bondages.


           The Maha Mrityunjaya Mantra is hailed by the sages as the heart of the Rigveda. It is a great death conquering mantra, dedicated to Lord Shiva. Shiva is the God of death. It is said those who worship Shiva, untimely death can never come to them. It is also believed that to overcome the fear of death, Lord Shiva himself gave humanity the Maha Mrityunjaya Mantra. This mantra has many names and forms. It is also called the Rudra Mantra, referring to the furious aspect of Shiva; the Tryambakam Mantra, alluding to Shiva's three eyes. This mantra restores health, happiness and brings calmness in the period of death. The mantra should ideally be repeated 108 times, twice daily, at dawn and at dusk.

01 January 2017

श्री राम की बहन शांता जी का जीवन परिचय

श्री राम की बहन शांता

भगवान राम की बहन कौन थी
भगवान राम की बहन कौन थी

          

           कई युगों से सभी लोग रामायण की कहानी  सुनते, देखते भी एवम पढ़ते आ रहे हैं जिसमे हमने राम और उनके भाइयों के प्रेम के बारे में विस्तार से जाना लेकिन हमने राम की बहन शांता के बारे में बहुत कम सुना हैं या कहे कि सुना ही नहीं हैं |हम आपको शांता जी के जीवन के बारे में कुछ बातें बतायेंगे | राम की बहन शांता कौन थी ? और क्यूँ उनका कही पर भी उल्लेख्य नहीं पाया जाता है ? और किस वजह से उनका परी त्याग किया गया था ?

           राजा  दशरथ एवम कौशल्या रानी अयोध्या के राजा-रानी थे | महाराज दशरथ की दो अन्य पत्नियां  भी थी जिनके नाम था  कैकयी और सुमित्रा | आप सभी जानते हैं कि इनके चार पुत्र थे राम, भरत, लक्ष्मण एवम शत्रुघ्न थे | लेकिन यह बात बहूत कम लोगो को पता हैं कि इन चार पुत्रो के अलावा उनकी एक बड़ी बहन "शांता: भी थी | शांता रानी कौशल्या माँ की पुत्री थी |

 
भगवान राम की बहन कौन थी
भगवान राम की बहन कौन थी
          शांता  बहुत होंनहार कन्या थी  वो हर क्षेत्र में सर्वगुणसंपन्न  थी | उसे युद्ध कला, विज्ञान

एवम साहित्य  सभी का अविस्मितपूर्ण  ज्ञान था | अपने युद्ध कौशल से वह सदैव राजा  दशरथ के गर्व के पत्र थी


           एक दिन की बात हैं महारानी कौशल्या की बहन रानी वर्षिणी अपने पति रोमपद के साथ अयोध्या आते हैं| राजा रोमपद अंग देश के राजा थे तथा  उनकी कोई भी संतान नहीं थी| एक समय जब सारे परिवार जन साथ बैठ कर बाते कर रहे थे तब रानी वर्षिणी का ध्यान राजकुमारी शांता की तरफ पड़ा और वे उनकी गतिविधी एवम शालीनता को देख कर बहूत  प्रभावित हो गई और अपने करुण शब्दों में यह कहने लगी कि अगर उनके नसीब में संतान हो तो शांता के समान सुशील हो| उनकी यह बात सुनकर राजा दशरथ उन्हें अपनी शांता गोद देने का वचन देते हैं| "रघुकुल की रित प्राण जाई पर वचन न जाई" के अनुसार राजा दशरथ एवम माता कौशल्या को अपनी पुत्री राजा रोमपद एवम रानी वर्षिणी को गोद देते  हैं |

           आगे जा कर शांता अंगदेश की राजकुमारी बन जाती हैं| एक दिन अंगराज रोमपद अपनी गोद ली पुत्री शांता से विचार विमर्श कर रहे थे तब ही उनके दर पर एक ब्राह्मण याचक अपनी याचना लेकर आया लेकिन रोमपद अपनी वार्ता में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने ब्राह्मण की याचना सुनी ही नहीं और ब्राह्मण को बिना कुछ लिए खाली हाथ जाना पड़ा| यह बात देवताओं के राजा इंद्र को बहुत बुरी लगी और उन्होंने वरुण देवता को अंगदेश में बारिश ना करने का हुक्म दिया| वरुण देवता ने यही किया और उस वर्ष अंगदेश में सुखा पड़ने से हाहाकार मच गया| इस समस्या से निजात पाने के लिये रोमपद ऋषि शृंग के पास जाते हैं| और उन से वर्षा की समस्या कहते हैं तब ऋषि श्रृंग रोमपद को यज्ञ करने को कहते हैं| ऋषि श्रृंग के कहेनुसार यज्ञ किया जाता हैं पुरे विधान से संपन्न होने के बाद अंग देश में वर्षा होती हैं और सूखे की समस्या खत्म होती हैं| ऋषि श्रृंग से प्रसन्न होकर अंगराज रोमपद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह ऋषि श्रृंग से कर दिया|

           शांता के बाद राजा दशरथ की कोई संतान नहीं थी| वो अपने वंश के लिए बहुत चिंतित थे| तब वे ऋषि श्रृंग के पास जाते हैं और उन्हें पुत्र कामाक्षी यज्ञ करने का आग्रह करते हैं| तब अयोध्या के पूर्व दिशा में एक स्थान पर राजा दशरथ के लिए पुत्र कमिक्षी यज्ञ किया जाता हैं| ( यह यज्ञ ऋषि श्रृंग के आश्रम में किया गया था | आज भी इस स्थान पर इनकी स्मृतियाँ हैं) इस यज्ञ के बाद प्रशाद के रूप में खीर रानी कौशल्या को दी जाती हैं जिसे वे छोटी रानी कैकयी से बाँटती हैं बाद में दोनों रानी अपने हिस्से में से एक एक हिस्सा सबसे छोटी रानी सुमित्रा को देती हैं जिसके फलस्वरूप सुमित्रा को दो पुत्र लक्ष्मण एवम शत्रुघ्न होते हैं और रानी कौशल्या को दशरथ के जेष्ठ पुत्र राम की माता बनने का सौभाग्य मिलता हैं एवम रानी कैकयी को भरत की प्राप्ति होती हैं|

           इस प्रकार शांता के त्याग के बाद राजा दशरथ को चार पुत्र प्राप्त होते हैं| पुत्री वियोग के कारण रानी कौशल्या एवम राजा दशरथ के मध्य मतभेद उत्पन्न हो जाता हैं| शांता के बारे में चारों राज कुमारों को कुछ ज्ञात नहीं होता लेकिन समय के साथ वे माता कौशल्या के दुःख को महसूस करने लगते हैं तब राम कौशल्या से प्रश्न करते हैं तब राम को अपनी जेष्ठ बहन शांता के बारे में पता चलता हैं और वे अपनी माँ को बहन शांता से मिलवाते हैं इस प्रकार राम अपने माता पिता के बीच के मतभेद को दूर करते हैं|

           देवी शांता के बारे में वाल्मीकि रामायण में कोई उल्लेख्य नहीं मिलता लेकिन दक्षिण के पुराणों में स्पष्ट रूप से शांता के चरित्र का वर्णन किया गया हैं|

           भारत के कुल्लू में श्रृंग ऋषि का मंदिर हैं एवम वहां से ६० किलोमीटर की दुरी पर देवी शांता का मंदिर हैं| यह भी कहा जाता हैं कि राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए देवी शांता का त्याग किया था| वैसे तो देवी शांता एक परिपूर्ण राजकुमारी थी लेकिन बेटी होने के कारण उनसे वंश वृद्धि एवम राज कार्य पूरा नहीं हो सकता था इसलिये राजा दशरथ को उनका परित्याग करना पड़ा|

           इस प्रकार जब चारों भाई अपनी बहन शांता से मिलते हैं तो वे अपने भाइयों से अपने त्याग का फल मांगती हैं और उन्हें सदैव साथ रहने का वचन लेती हैं| भाई अपनी बहन के त्याग को व्यर्थ नहीं जाने देते और जीवन भर एक दुसरे की परछाई बनकर रहते हैं|

           रामायण एक ऐसा ग्रन्थ हैं जिसमें सभी रिश्तों की गहराई मर्यादा एवम सबसे अधिक वचन पालन का महत्व बताया हैं| इस प्रकार रामायण से जुडी कहानियाँ हमें उचित मार्गदर्शन करती हैं हमें रिश्तों की मर्यादा का भान कराती हैं| यह कहानियाँ आज के समय में संस्कारों का महत्व बताती हैं एवम व्यक्तित्व विकास में सहायक होती हैं| 

           -धन्यवाद 

29 December 2016

दुर्जन व्यक्ति का त्याग करे || श्लोक

दुर्जन व्यक्ति का त्याग करे | 





दुर्जनः परिहर्तव्यो विद्ययालङ्कृतोअपि सन्।

मणिना भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकरः ।।


 

 

अर्थ :-

विद्या से विभूषित होने पर भी दुर्जन त्याग करने योग्य है। मणि से अलङ्कृत होने पर भी वह सर्प क्या भयंकर नहीं होता है अर्थात् अवश्य होता है |

          जैसे उच्च कुल में जन्म लेने तथा महान विद्वान व् शक्तिशाली होने के बावजूद भी रावण को हिन्दू समाज ने स्वीकार नहीं किया ।

          उसी प्रकार मानव की हत्या करने वाले  आतंकवादी विचारधारा को समर्थन और सम्मान करने वाला समुदाय खुद अपना सर्वनाश रावण की तरह कर लेगा यह विश्वास रखिये ।

 

 

सज्जन अच्छे मित्रों के लक्षण || श्लोक

सज्जन अच्छे मित्रों के लक्षण

 श्लोक :-


पापान्निवारयति योजयते हिताय,

गुह्यं निगूहति गुणान् प्रकटीकरोति।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले,

सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।






अर्थ :-

सज्जन अच्छे मित्रों का लक्षण यह बतलाते हैं कि अच्छा मित्र मनुष्य को पाप कर्म से रोकता है, हितकारी कार्यों में लगाता है, गुप्त बातों को छिपाता है, गुणों को प्रकट करता है, आपत्तिग्रस्त होने के समय साथ नहीं छोड़ता है और समय पड़ने पर सहायता प्रदान करता है।

 

 - धन्यवाद

 

 

 

 

19 December 2016

विध्यार्थी श्लोक मन्त्र - काक चेष्टा भावार्थः सहित

  विध्यार्थी श्लोक मन्त्र



काक चेष्टा , बको ध्यानं,

स्वान निद्रा तथैव च । 

अल्पहारी, गृहत्यागी, 

विद्यार्थी पंच लक्षणं ।

  

 





भावार्थः :-

१.             एक विध्यार्थी की कामयाब होने की कोशिशें उस कौवे की तरह होनी चाहिए, जिसने तिनका तिनका जोड़ के जलपात्र की सतह से पानी ऊपर लाया था।

.           विध्यार्थी  का ध्यान बगुले की तरह होना चाहिए, जो अपनी एक टांग पर कई देर तक खड़े हुए अपने आहार उस मछली की प्रतीक्षा करता है और अंत में सफल होने तक अपना सारा ध्यान अपने लक्ष्य पर ही केंद्रित रखता है

३.           विध्यार्थी  की निंद्रा उस स्वान (कुत्ते) की तरह होनी चाहिए की जो हल्की सी भी हलचल से तुरंत जाग जाता है, और सदैव पूरी तरह से चौकन्ना रहता है। 

४.           विध्यार्थी  सदैव अपनी आवश्यकता के अनुसार ही कहना चाहिए, कदापि आवश्यकता से अधिक नहीं कहना चाहिए। अधिक आहार ग्रहण करने से मोटापा, बीमारी, आलास तथा बुद्धिहीनता अति है। 

५.           विध्यार्थी  अपनी पढाई अपने घर के सुखद एवं  आरामदायक जगह से दूर जा के करे, तो उसके सफल होने की संभावनाएं अधिक बढ़ जाती है। परंतु, अगर वह अपने घर पर ही रह के अभ्यास करना चाहे तो माता, पिता एवं परिजनों को उसे पूर्ण सहयोग देना चाहिए तथा विध्यार्थी  की आसपास का माहोल पढ़ने के योग्य बनाने में अपना पूर्णरूप से योगदान प्रदान करे।

 

                                 - धन्यवाद् 

 



  • छात्रों के लिए एक प्रेरणास्प्रद कविता :-


बच्चो पढ़ाई है सुखदायी ,

मिले इस से तुमको बढ़ायी।

पहले थोड़ा कष्ट उठाओ,

फिर बाकि दिन आनंन्द उठाओ॥



16 December 2016

Individualities of a student with meaning in English

Individuality of a Student !

  Kaak chesta bako dhyaanam!


Kaak cheshta bako dhyaanam,

Swan Nindra tathaiwa cha;!

Alpahaari, grihatyaagi,

Vidhyaarthi paanch lakshnam !!






       Meaning :-

       Efforts should be similar to a crow, Focus on the work like a crane, take alert sleep similar to that of a dog,
 
     A student should have these characteristics besides he should eat a bit less and  as far as possible, stay away from the sweet home (may be stay in a hostel) !





  • Crow :-    Repetitive,  remember story of a crow trying to drink water from a pot, while placing pieces of stones to raise the water level.







  •   In addition, there is one more motivating poem:


Bachcho padhna hei Sukhdayee, 

Meelay is se tumko Badhaai, 

Pehle thoda Kashtt uthwo,

fir Baaki Deen Aanad uthawo !

 

15 December 2016

अच्छी निंद्रा के लिए श्लोक - मन्त्र क्रमांक १

निंद्रा के समय का श्लोक - मंत्र  





राम स्कन्धं हनुमतं ।

वैनतेयं वृकोदरम् ॥

शयनेय स्मरनित्यम् ।

दुस्वप्नम् तस्यनस्यति ॥

 




भावार्थः   :-

     हम प्रतिरात्रि भगवान श्री हनुमान जी, गरुड़ भगवान एवं वीर भीम जी को याद करते है कि  वे हमें रात्रि में आने वाले ख़राब सपनो से हमारी रक्षा करे । 



  श्लोक का महत्व :-


      आम तौर पर आरामदायक निंद्रा  , अच्छे सपने और अच्छी रात्रि के लिए यह मंत्र पढ़ना चहिये। यह श्लोक रात्रि में कभी अशुभ स्वप्न नहीं  आने देता ।

               

      जिसके फलस्वरूप हमारी सामान्य जीवनचर्या और सभी काम बहुत ही आसानी से और सफलतापूर्ण पूरे होते है ।

 

 








11 December 2016

Bed Time Prayer - Shlok No#1 in English

Shlok before going to bed

"Ramaskandam hanumantham vainatheye rukodaram,


Shayaneye smaren nithyam dus swapnam thasya nasyathi"



 

 

 

Meaning:- We pray every night to lord Shri Hanuman ji vynatheya (garuda) and Vrukodhara (Bheema) all the brave people to remove all bad dreams.








Importance of this Shlok :-


     Basically praying for Peaceful Sleep, Sweet dreams and  Good Night. To be delicate, it is a prayer for bypass bad dreams.

     

 Thus, we see that even normal everyday activities can be done with more effectively and sincerity by proceeding the Shlok.