22 November 2019

एकादशी व्रत उद्यापन की विधि | Ekadashi Vrat Udyapan Vidhi in Hindi | Gyaras ka Udyapan kaise karte hain

एकादशी व्रत उद्यापन की विधि | Ekadashi Vrat Udyapan Vidhi in Hindi | Gyaras ka Udyapan kaise karte hain #EkadashiVrat

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एकादशी या ग्यारस का व्रत भगवान विष्णु जी को समर्पित होता हैं। भगवान विष्णु की विशेष कृपा निरंतर प्राप्त करने का सर्वोत्तम व्रत एकादशी को ही माना गया हैं। एकादशी के व्रत को व्रतराज भी कहा जाता हैं, क्योंकि एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की समस्त इच्छाएं तो पूर्ण होती ही हैं, साथ ही, इस व्रत को करने से मृत्यु के पश्चात वैकुंठ लोक की प्राप्ति भी हो जाती हैं। प्रत्येक महीने में 2 बार एकादशी का व्रत आता हैं, एक शुक्ल पक्ष का तथा दूसरा कृष्ण पक्ष का। एकादशी तिथि पर व्रत-उपवास तथा विष्णु भगवान की भक्ति का अत्यंत विशेष महत्व होता हैं। शास्त्रों के अनुसार एकादशी का व्रत करने वाले भक्तों पर भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी दोनों की कृपादृष्टि समान रूप से रहती हैं। किन्तु एकादशी व्रत का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता हैं, जब इसका विधि-विधान से उद्यापन किया जाए। एकादशी व्रत के नियम का पालन करते हुए व्रती को एकादशी व्रत का उद्यापन भी करना होता हैं। किसी भी व्रत की पूर्णता तभी मानी जाती हैं, जब विधि-विधान से उस व्रत का उद्यापन किया जाए। उद्यापन करना इसलिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि हम जो व्रत करते हैं उसके साक्षी प्रत्येक देवी-देवता, यक्ष, नाग तथा गंधर्व आदि होते हैं। उद्यापन के दौरान की जाने वाली पूजा तथा हवन से उन प्रत्येक देवी-देवताओं को उनका भाग प्राप्त होता हैं। इस दौरान किए जाने वाले दान-दक्षिणा से ही व्रत की पूर्णता सिद्ध होती हैं। एकादशी व्रत का उद्यापन तब किया जाता हैं, जब व्रत रखने वाले श्रद्धालु, स्त्री-पुरुष कुछ समय तक नियमित या वर्षों तक निश्चित संख्या में नियमित व्रत करते हैं। भगवान् को साक्षी मानकर व्रत के संकल्प की पूर्णता, अन्तिम व्रत के पश्चात व्रत के उद्यापन करने पर ही पूर्ण होती हैं। व्रतों के संकल्प का पुण्य-फल तब ही प्राप्त होता हैं, जब उसका उद्यापन अर्थात् व्रत का समापन पूर्ण विधि-विधान पूर्वक सम्पन्न किया जाता हैं, अन्यथा वह एकादशी व्रत अधूरा ही माना जाता हैं। उद्यापन किये बिना कोई भी व्रत पूर्ण नहीं माना जाता। अतः नियमित एकादशी व्रत करने वाले प्रत्येक विष्णु भक्तजनों को उद्यापन के संकल्प को सम्पूर्ण पूजन विधि सहित सम्पन्न करने के पश्चात ही, संकल्प छोड़ना चाहिए। व्रत का उद्यापन एकादशी का व्रत करने के पश्चात ही किया जाता हैं। बिना उद्यापन किए कोई भी व्रत सिद्ध नहीं होता, अतः नियमित रूप से एकादशियों का व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तजनों को किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण की देख-रेख में व्रत का उद्यापन करना चाहिए।



एकादशी व्रत का उद्यापन करने की विधि

एकादशी के व्रत का उद्यापन ग्रहण-रहित कृष्ण पक्ष की एकादशी या मार्गशीर्ष महीने की एकादशी के दिन करना शुभ माना जाता हैं। किन्तु व्रत के उद्यापन के लिए यह भी आवश्यक हैं कि, इस एकादशी के दिन तक आपकी 24 एकादशियां पूर्ण हो गई हों। अर्थात आपको ध्यान रखना चाहिए की, एकादशी व्रत के उद्यापन के लिए कम से कम आपको 24 एकादशी का व्रत करना अति आवश्यक है। एकादशी व्रत का उद्यापन करना तो आवश्यक हैं किन्तु यह पूर्णरूप से व्रती की श्रद्धा पर निर्भर करता हैं की, उद्यापन में पूजन कितना बड़ा या छोटा करना हैं या कितने ब्राह्मणों को भोजन करवाना हैं, यह सब व्रती की श्रद्धा तथा आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता हैं।
एकादशी व्रतों का उद्यापन करते समय भगवान श्री विष्णु की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती हैं, साथ ही, हवन भी अनिवार्य रूप से किया जाता हैं। उद्यापन करने वाले व्रती को दशमी के दिन एक समय भोजन करना चाहिए, तथा उद्यापन वाले शुभ दिवस अपने जीवन-साथी सहित स्नानादि करके स्वच्छ सफेद या पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा-स्थल को सुंदर रूप से सजाकर तथा प्रत्येक पूजन सामग्री अपने निकट रखकर भगवान विष्णु तथा लक्ष्मीजी की षोडशोपचार से आराधना की जाती हैं। पवित्रीकरण, भूत-शुद्धि तथा शांति-पाठ के पश्चात गणेश-पूजन आदि की प्रत्येक क्रियाएं की जाती हैं।
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एकादशी व्रत के उद्यापन में 12 महीने की एकादशियों के निमित्त 12 ब्राह्मणों को पत्नी सहित निमंत्रित किया जाता हैं। एक पूजन करवाने वाले आचार्य रहते हैं, उन्हें भी पत्नी सहित आमंत्रित करना चाहिए। एकादशी व्रतोद्यापन पूजा में कलश स्थापना हेतु तांबे के कलश में चावल भरकर रखने का विधान हैं। अष्टदल कमल बनाकर भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का ध्यान एवं आह्वान सहित षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता हैं। साथ ही, इस दिवस भगवान कृष्ण, श्रीराम, अग्निदेव, देवराज इंद्र, प्रजापति, विश्वदेव तथा ब्रह्माजी आदि का भी आह्वान किया जाता हैं। इसके पश्चात मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान को प्रत्येक प्रकार की सेवाएं तथा पूजन सामग्री अर्पित की जाती हैं। वैदिक विधान के अनुसार भगवान की स्वर्ण प्रतिमा, स्वर्ण आभूषणों, स्वर्ण सिंहासन, छत्र, चमर, पंचरत्न, दर्जनों मेवों, अनेक प्रकार के अनाजों तथा विविध फलों आदि का प्रयोग करना चाहिए। किन्तु, भगवान की पूजा-आराधना तथा हवन में कौन सी वस्तुओं का तथा कितनी-कितनी मात्रा में प्रयोग किया जाए, यह पूर्ण प्रकार से जातक की श्रद्धा तथा सामर्थ्य पर निर्भर करता हैं।
पूजन के पश्चात हवन होता हैं तथा आचार्य सहित ब्राह्मणों को फलाहारी भोजन करवाकर पूजा में प्रयुक्त प्रत्येक वस्तुएं, पाँच प्रकार के वस्त्र, जूते, छाता, पांच बर्तन तथा पलंग एवं घरेलू उपयोग की अनेक सामग्री दक्षिणा के रूप में देने का विधान हैं। कितने ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तथा आचार्य एवं अन्य ब्राह्मणों को कौन-कौन सी वस्तुएं दान दी जाएं, यह आपकी भावना तथा श्रद्धा का विषय हैं।

एकादशी व्रत का उद्यापन में ध्यान देने योग्य नियम

१) 24 एकादशियां अर्थात सम्पूर्ण 1 वर्ष का व्रत पूर्ण होने पर एकादशी व्रत का उद्यापन करना चाहिए।
२) मार्गशीर्ष महीने में व्रत का उद्यापन करना शुभ माना जाता हैं।
३) जिस महीने में सूर्य या चन्द्र ग्रहण ना हो, ऐसी एकादशी के व्रत के पश्चात ही व्रत का समापन करना चाहिए।
४) व्रत उद्यापन में आदर सहित पूजा कराने वाले एक आचार्य तथा कम से कम 12 (बारह) विद्वान ब्राह्मणों को पत्नी-सहित अपने घर पर आने के लिए आमंत्रित करना चाहिये।
५) ब्राह्मणों तथा आचार्य को वैदिक विष्णु भगवान के मंत्र का जप करना चाहिये तथा विधिपूर्वक पूजा तथा स्तुति करनी चाहिए।
६) हवन के लिये वेदी बनाये तथा संकल्पपूर्वक वेदोक्त मन्त्रों से हवन करना चाहिए।
७) उद्यापन की पूजा विधि आचार्य के द्वारा संपन्न कराई जाने के पश्चात प्रत्येक ब्राह्मण, आचार्य तथा उनकी पत्नियों को भोजन अवश्य कराना चाहिए।
८) भोजन कराने के पश्चात प्रत्येक अतिथि को यथायोग्य कपड़े तथा उचित दक्षिणा देकर उनका आर्शीवाद ग्रहण करना चाहिए।
९) उद्यापन विधि निर्विघ्न रूप से संपन्न होने के पश्चात किसी उचित सज्जन निर्धन व्यक्ति को धन या वस्त्र का दान अवश्य करना चाहिए।
१०) उद्यापन करने के पश्चात भी आप निरंतर एकादशी का व्रत कर सकते है।

20 November 2019

उत्पन्ना एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Utpanna Ekadashi Vrat 2019

उत्पन्ना एकादशी कब है 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय व शुभ मुहूर्त | Utpanna Ekadashi Vrat 2019 #EkadashiVrat

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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिस दिन स्वयं एकादशी माता जी का जन्म हुआ था। जिन्होंने मुरासूर नामक दैत्य का वध कर भगवान विष्णु जी की रक्षा की थी। अतः इसी एकादशी के दिन ही स्वयं भगवान विष्णु जी ने माता एकादशी को आशीर्वाद के रूप में एकादशी तिथि के दिन को पूजा का एक महान व्रत बताया था। अतः मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि “उत्पन्ना एकादशी” कहलाती है। प्रत्येक एकादशी का महत्व पुराणों में प्राप्त होता हैं तथा उनका फल एक समान एवम अति उत्तम होता हैं। इस एकादशी के दिन व्रत करने से जातक के अतीत तथा वर्तमान के समस्त पापों का नाश हो जाता है। इस व्रत का प्रभाव जातक को प्रत्येक तीर्थों के समान प्राप्त होता है। जो जातक एकादशी के व्रत को नहीं रखते हैं तथा इस व्रत को लगातार रखने के बारें में सोच रहे हैं अर्थात जो हरी-भक्तजन प्रत्येक महीने आने वाले एकादशी के व्रत को प्रारम्भ करना चाहते है, वे मार्गशीर्ष मास की कृष्ण एकादशी अर्थात उत्पन्ना एकादशी से ही अपने एकादशी के व्रत का शुभ-आरंभ कर सकते है। क्योंकि सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में इसी एकादशी से एकादशी के दिव्य व्रत का प्रारंभ हुआ है। व्यतीपात योग, संक्रान्ति तथा चन्द्र-सूर्य ग्रहण में दान देने एवं कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उसी के समान पुण्य इस एकादशी का व्रत करने से जातक को प्राप्त हो जाता है। इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस एकादशी में मुख्य रूप से भगवान् श्रीविष्णु तथा माता एकादशी की पूजा-अर्चना की जाती है।

उत्पन्ना एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१.   एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२.   यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३.   द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४.   एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५.   व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६.   व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७.   जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८.   यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।

इस वर्ष, मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 22 नवम्बर, शुक्रवार के दिन 09 बजकर 01 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 23 नवम्बर, शनिवार की प्रातः 06 बजकर 23 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में, उत्पन्ना एकादशी का व्रत 22 नवम्बर, शुक्रवार के दिन किया जाएगा।

इस वर्ष, उत्पन्ना एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 23 नवम्बर, शनिवार की दोपहर 01 बजकर 11 मिनिट से 03 बजकर 25 मिनिट तक का रहेगा।
हरि वासर समाप्त होने का समय - 11:44 AM

साथ ही, गौण उत्पन्ना एकादशी अर्थात वैष्णव उत्पन्ना एकादशी का व्रत 23 नवम्बर, शनिवार के दिन रखा जाएगा।
जिसका पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय 24 नवम्बर, रविवार की प्रातः 06:51 से 08:48
द्वादशी सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाएगी।

07 November 2019

प्रबोधिनी एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Prabodhini Ekadashi 2019 | Dev Uthani Ekadashi 2019

प्रबोधिनी एकादशी कब हैं 2019 | एकादशी तिथि व्रत पारण का समय | तिथि व शुभ मुहूर्त | Prabodhini Ekadashi 2019 #EkadashiVrat | Dev Uthani Ekadashi 2019

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वैदिक विधान कहता हैं की, दशमी को एकाहार, एकादशी में निराहार तथा द्वादशी में एकाहार करना चाहिए। सनातन हिंदू पंचांग के अनुसार सम्पूर्ण वर्ष में 24 एकादशियां आती हैं, किन्तु अधिकमास की एकादशियों को मिलाकर इनकी संख्या 26 हो जाती हैं। प्रत्येक एकादशी का भिन्न भिन्न महत्व होता हैं तथा प्रत्येक एकादशीयों की एक पौराणिक कथा भी होती हैं। एकादशियों को वास्तव में मोक्षदायिनी माना जाता हैं। भगवान श्रीविष्णु जी को एकादशी तिथि अति प्रिय मानी गई हैं चाहे वह कृष्ण पक्ष की हो अथवा शुकल पक्ष की। इसी कारण एकादशी के दिन व्रत करने वाले प्रत्येक भक्तों पर प्रभु की अपार कृपा-दृष्टि सदा बनी रहती हैं, अतः प्रत्येक एकादशियों पर हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले भगवान श्रीविष्णु जी की पूजा करते हैं तथा व्रत रखते हैं, साथ ही रात्री जागरण भी करते हैं। किन्तु इन प्रत्येक एकादशियों में से एक ऐसी एकादशी भी हैं जिसमे श्री विष्णु जी क्षीरसागर में चार मास अर्थात चातुर्मास के विश्राम के पश्चात जागते हैं। भगवान विष्णु जी आषाढ शुक्ल एकादशी अर्थात देवशयनी एकादशी पर सायन आरम्भ करते हैं। अतः देव-शयन हो जाने के पश्चात से प्रारम्भ हुए चातुर्मास का समापन देवोत्थान-उत्सव होने पर ही होता हैं। अतः प्रबोधिनी एकदशी का दिन चतुर्मास के अंत का प्रतीक हैं। चातुर्मास के दिनों में केवल पूजा पाठ, तप तथा दान के कार्य ही किए जाते हैं। इन चार मास में कोई भी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, मुंडन संस्कार, नाम करण संस्कार आदि नहीं किये जाते हैं। किन्तु प्रबोधनी एकादशी से प्रत्येक प्रकार के मंगल कार्यो का प्रारंभ हो जाता हैं।प्रबोधिनी एकदशी को देवोतथान एकादशी, देव प्रबोधिनी एकादशी, देवुत्थान एकादशी, देवउठनी एकादशी, देवौठनी एकादशी, देवउठनी ग्यारस, हरि प्रबोधिनी एकादशी, देव उथानी एकदशी, देवउत्थान एकादशी तथा देवतुथन एकदशी के नाम से भी जाना जाता हैं। प्रबोधिनी एकदशी को हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर में मनाया जाता हैं, जो कि अङ्ग्रेज़ी कैलेंडर में अक्टूबर या नवम्बर में आता हैं। यह एकादशी का व्रत दिवाली पर्व के ग्यारहवे दिन किया जाता हैं।पौराणिक मान्यता हैं कि भगवान विष्णु ने इस दिन देवी तुलसी से विवाह किया था। अतः इस दिन तुलसी विवाह का भी विशेष महत्व माना गया हैं। इस दिन तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण जगत में विवाह के उत्सव प्रारम्भ हो जाते हैं।प्रबोधिनी एकदशी के दिन वैष्णव ही नहीं, किन्तु स्मार्त श्रद्धालु भी अत्यंत उत्साह तथा पूर्ण आस्था से व्रत करते हैं। प्रबोधिनी एकादशी को पापमुक्त करने वाली सर्वश्रेष्ठ एकादशी माना गया हैं। वैसे तो प्रत्येक एकादशी का व्रत पापो से मुक्त होने के लिए किया जाता हैं। किन्तु इस एकादशी का महत्व अत्यंत अधिक माना जाता हैं। राजसूय यज्ञ करने से जो पुण्य की प्राप्ति होती हैं, उससे कई गुना अधिक पुण्य प्रबोधनी एकादशी के व्रत का होता हैं।


प्रबोधिनी एकादशी व्रत का पारण

एकादशी के व्रत की समाप्ती करने की विधि को पारण कहते हैं। कोई भी व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक उसका विधिवत पारण ना किया जाए। एकादशी व्रत के अगले दिवस सूर्योदय के पश्चात पारण किया जाता हैं।

ध्यान रहे,
१. एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पूर्व करना अति आवश्यक हैं।
२. यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो रही हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के पश्चात ही करना चाहिए।
३. द्वादशी तिथि के भीतर पारण ना करना पाप करने के समान माना गया हैं।
४. एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए।
५. व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल का होता हैं।
६. व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए।
७. जो भक्तगण व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत समाप्त करने से पूर्व हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि होती हैं।
८. यदि जातक, कुछ कारणों से प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं हैं, तो उसे मध्यान के पश्चात पारण करना चाहिए।


इस वर्ष, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 07 नवम्बर, गुरुवार के दिन 09 बजकर 54 मिनिट से प्रारम्भ हो कर, 08 नवम्बर, शुक्रवार की दोपहर 12 बजकर 24 मिनिट तक व्याप्त रहेगी।

अतः इस वर्ष 2019 में प्रबोधिनी एकादशी का व्रत 08 नवम्बर, शुक्रवार के दिवस किया जाएगा।

इस वर्ष, प्रबोधिनी एकादशी व्रत का पारण अर्थात व्रत तोड़ने का शुभ समय, 09 नवम्बर, शनिवार की प्रातः 06 बजकर 48 मिनिट से 8 बजकर 51 मिनिट तक का रहेगा।
ध्यान रखें: शनिवार, 9 नवंबर द्वादशी को पारण दोपहर 2.54 के पहले कर लें, क्योंकि उसके बाद रेवती नक्षत्र शुरू हो जायेगा..
शास्त्र कहते हैं रेवती नक्षत्र में पारण करने से 12 एकादशियों का फल व्यर्थ जाता है!

27 October 2019

दीपावली पूजन की विधि और सामग्री | Diwali Puja Vidhi in Hindi 2019 | Dipawali Maha Laxmi Poojan Mantra

दीपावली पूजन की विधि और सामग्री | Diwali Puja Vidhi in Hindi 2019 | Dipawali Maha Laxmi Poojan Mantra

diwali puja vidhi in hindi
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ॐ श्री महालक्ष्म्यै च विद्महे

विष्णु पत्न्यै च धीमहि

तन्नो लक्ष्मी: प्रचोदयात्॥

शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा, ।
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते ॥
आप सभी को सपरिवार दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएँ।
आपके जीवन को दीपावली का दीपोत्सव सुख, समृद्धि, सौहार्द, शांति तथा अपार खुशियों की रोशनी से जग-मग करें।

लक्ष्मी बीज मन्त्र

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
Om Hreem Shreem Lakshmibhayo Namah

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः।।
Om Shreeng Mahalaxmaye Namah।।
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या
दिवाली का पर्व सनातन हिन्दू धर्म का सर्वाधिक पवित्र तथा प्रसिद्ध त्योहार है, तथा इस पर्व को दिपावली, लक्ष्मी पूजा, अमावस्या लक्ष्मी पूजा, केदार गौरी व्रत, चोपड़ा पूजा, शारदा पूजा, बंगाल की काली पूजा, दिवाली स्नान, दिवाली देवपूजा, लक्ष्मी-गणेश पूजा तथा दिवाली पूजा के नाम से जाना जाता है। दिवाली का त्योहार कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है।
        जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर गतिमान बनाने वाला यह त्यौहार अत्यंत उत्साह एवं धूमधाम से सम्पूर्ण भारतवर्ष के साथ साथ सपूर्ण जगत में मनाया जाता हैं। दीपावली के त्यौहार की तैयारी सभी व्यक्ति कई दिन पहले से ही करते हैं, जिसका प्रारम्भ घर की साफ-सफाई से किया जाता हैं, क्योंकि, दिवाली के दिन शुभ मुहूर्त में माता लक्ष्मी की विधि-पूर्वक पूजा की जाती हैं, तथा माँ लक्ष्मीजी वहीँ निवास करती हैं जहाँ स्वच्छता होती हैं।
Diwali Puja Vidhi at Home
Diwali Puja Vidhi 
        दिवाली के दिन गणेश तथा लक्ष्मी पूजा करने के लिए उपयुक्त महूर्त प्रदोष काल का होता है। प्रदोष काल सूर्यास्त के पश्चात प्रारम्भ होता है तथा लगभग २ घण्टे २२ मिनट तक व्याप्त रहता है। धर्मसिंधु ग्रंथ के अनुसार श्री महालक्ष्मी पूजन हेतु शुभ समय प्रदोष काल से प्रांरम्भ हो कर अर्ध-रात्री तक व्याप्त रहने वाली अमावस्या तिथि को श्रेष्ठ माना गया है। अतः प्रदोष काल का मुहूर्त लक्ष्मी पूजा के लिए सर्वश्रेस्ठ है। अतः प्रदोष के समय व्याप्त पूर्ण अमावस्या तिथि दिवाली की पूजा के लिए विशेष महत्वपूर्ण होती है।
दीवाली के पर्व पर तथा अन्य किसी भी शुभ दिवस पर माता लक्ष्मी, देवी सरस्वती जी एवं भगवान् गणेशजी की पूजा विशेष विधी से करने से सुख-समृद्धि, बुद्धि तथा धन की प्राप्ति होती है तथा घर में शांति व् प्रगति का वरदान भी प्राप्त होता है।

पूजा हेतु पूजन सामग्री

चौकी, लक्ष्मी, सरस्वती व गणेश जी का चित्र या प्रतिमा, रोली, कुमकुम, चावल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप, कपूर, अगरबत्तियां, मिट्टी तथा तांबे के दीपक, रुई, मौलि, नारियल, शहद, दही, गंगाजल, गुड़, धनिया, फल, फूल, जौ, गेहूँ, दूर्वा, चंदन, सिंदूर, घृत, पंचामृत, दूध, मेवा, बताशे, गंगाजल, जनेऊ, पिला वस्त्र, लाल वस्त्र, इत्र, खील, चौकी, कलश, शंख, आसन, थाली, चांदी का सिक्का तथा प्रसाद हेतु मिष्ठान्न

प्रात:काल देवपूजन-

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। स्नान के पश्चात् मुख्य द्वार पर आम के पत्तों का तोरण बांधे, द्वार के दोनों ओर केले के पत्ते भी लगाएं, तत्पश्चात् देवताओं का आवाहन कर धूप, दीप, नैवेद्य आदि पँचोपचार-विधि से पूजन करें। पूजन में सर्वप्रथम भगवान् श्रीगणेश जी का पूजन करें।

पूजन तैयारी

पूजा में सर्वप्रथम एक चौकी पर पिला वस्त्र बिछा कर उस पर माता लक्ष्मी, देवी सरस्वती व भगवान् गणेश की चित्र या प्रतिमा इस प्रकार विराजमान करें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम दिशा के ओर रहे। यह ध्यान दे की माता लक्ष्मीजी, भगवान् गणेशजी की दाहिनी ओर रहें। पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठें। कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें। नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें। यह कलश वरुण का प्रतीक माना जाता है।
दो बड़े दीपक ले। एक में घी भरें व दूसरे में तेल। एक दीपक चौकी के दाईं ओर रखें व दूसरा मूर्तियों के चरणों में। इसके अतिरिक्त एक दीपक भगवान् गणेशजी के पास रखें।
मूर्तियों वाली चौकी के सामने छोटी चौकी रखकर उस पर पिला वस्त्र बिछाएं। कलश की ओर एक मुट्ठी चावल से लाल वस्त्र पर नवग्रह की प्रतीक नौ ढेरियां बनाएं। गणेशजी की ओर चावल की सोलह ढेरियां बनाएं। ये सोलह मातृका की प्रतीक हैं। नवग्रह व षोडश मातृका के बीच स्वस्तिक का चिह्न बनाएं।
इसके बीच में सुपारी रखें व चारों कोनों पर चावल की ढेरी। सबसे ऊपर बीचोंबीच ॐ लिखें। छोटी चौकी के सामने तीन थाली व जल भरकर कलश रखें।

थालियों की व्यवस्था

थालियों की निम्नानुसार व्यवस्था करें-

प्रथम थाली- ग्यारह दीपक,
द्वितीय थाली- खील, बताशे, मिठाई, वस्त्र, आभूषण, चन्दन का लेप, सिन्दूर, कुंकुम, सुपारी, पान,
तृतीय थाली- फूल, दुर्वा, चावल, लौंग, इलायची, केसर-कपूर, हल्दी-चूने का लेप, सुगंधित पदार्थ, धूप, अगरबत्ती, एक दीपक।
इन थालियों के सामने यजमान बैठे। यजमान के परिवार के सदस्य उनकी बाईं ओर बैठें। कोई आगंतुक हो तो वह आपके या आपके परिवार के सदस्यों के पीछे बैठे।

पूजा की विधि

सर्वप्रथम पवित्रीकरण करें।

हाथ में पूजा के जलपात्र से थोड़ा-सा जल लेकर उसे प्रतिमा के ऊपर यह मंत्र पढ़ते हुए छिड़कें।
ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपिवा।
यः स्मरेत्‌ पुण्डरीकाक्षं स वाह्यभ्यन्तर शुचिः॥

इसके पश्चात् इसी तरह से स्वयं को तथा पूजा की सामग्री को भी इसी तरह जल छिड़ककर पवित्र कर लें।


अब पृथ्वी पर जिस जगह आपने आसन बिछाया है, उस जगह को पवित्र कर लें तथा यह मंत्र का उच्चारण करे-
 पृथ्विति मंत्रस्य मेरुपृष्ठः ग ऋषिः सुतलं छन्दः कूर्मोदेवता आसने विनियोगः॥

माता पृथ्वी को प्रणाम करके तथा उनसे क्षमा प्रार्थना करते हुए मंत्र उच्चारण करे-
ॐ पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय माता देवि पवित्रं कुरु चासनम्‌॥
पृथिव्यै नमः आधारशक्तये नमः।

अब आचमन करें

पुष्प, चम्मच या अंजुलि से एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए तथा बोलिए-
ॐ केशवाय नमः
तथा दोबारा एक बूंद पानी अपने मुंह में छोड़िए तथा बोलिए-
ॐ नारायणाय नमः
तथा एक तीसरी बूंद पानी की मुंह में छोड़िए तथा बोलिए-
ॐ वासुदेवाय नमः

इसके पश्यात ॐ हृषिकेशाय नमः कहते हुए हाथों को खोलें तथा अंगूठे के मूल से होंठों को पोंछकर हाथों को धो लें। पुनः तिलक लगाने के प्राणायाम व अंग न्यास आदि करें। आचमन करने से विद्या-तत्व, आत्म-तत्व तथा बुद्धि-तत्व का शोधन हो जाता है तथा तिलक व अंग न्यास से मनुष्य पूजा के लिए पवित्र हो जाता है।

ध्यान व संकल्प विधि

आचमन आदि के पश्चात् आंखें बंद करके मन को स्थिर कीजिए तथा तीन बार गहरी सांस लीजिए अर्थात प्राणायाम कीजिए क्योंकि भगवान के साकार रूप का ध्यान करने के लिए यह आवश्यक है इसके पश्यात पूजा के प्रारंभ में स्वस्तिवाचन किया जाता है। उसके लिए हाथ में पुष्प, अक्षत तथा थोड़ा जल लेकर स्वतिनः इंद्र वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए परम पिता परमात्मा को प्रणाम किया जाता है। इसके पश्यात पूजा का संकल्प किया जाता है। संकल्प हर एक पूजा में प्रधान होता है।
vkj pandey, Vinod Pandey
Happy Diwali Wishesh
इस पूरी प्रक्रिया के पश्चात् मन को शांत कर आंखें बंद करें तथा लक्ष्मी माता को मन ही मन प्रणाम करें। इसके पश्चात् हाथ में जल लेकर पूजा का संकल्प करें। संकल्प के लिए हाथ में अक्षत, पुष्प तथा जल ले लीजिए। साथ में एक रूपए का सिक्का या यथासंभव धन भी ले लें। इन सब को हाथ में लेकर संकल्प करें कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर माता लक्ष्मी, देवी सरस्वती तथा भगवान् गणेशजी की पूजा करने जा रहा हूं, जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हों।

पूजन विधि

Diwali Puja Vidhi at home
Diwali Puja Vidhi
सर्वप्रथम भगवान गणेशजी व गौरी का पूजन कीजिए। तत्पश्चात कलश पूजन करें इसके पश्यात नवग्रहों का पूजन कीजिए। हाथ में थोड़ा सा जल, अक्षत तथा पुष्प ले लीजिए तथा नवग्रह स्तोत्र का जाप करे। इसके पश्चात् भगवती षोडश मातृकाओं का पूजन किया जाता है। इन सभी के पूजन के पश्चात् 16 मातृकाओं को गंध, अक्षत व पुष्प प्रदान करते हुए पूजन करें। पूरी प्रक्रिया मौलि लेकर गणपति, माता लक्ष्मी व सरस्वती को अर्पण कर तथा स्वयं के हाथ पर भी बंधवा लें। अब सभी देवी-देवताओं के तिलक लगाकर स्वयं को भी तिलक लगवाएं।
अब आनंदचित्त से निर्भय होकर माता महालक्ष्मी जी की पूजा प्रारंभ करे तथा उनकी प्रतिमा के आगे 7, 11 या 21 दीपक जलाएं। माता को श्रृंगार सामग्री अर्पण करें। माता को भोग लगा कर उनकी आरती करें। श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त व कनकधारा स्रोत का पाठ करें। इस तरह से आपकी पूजा पूर्ण होती है।
क्षमा-प्रार्थना करें
पूजा पूर्ण होने के पश्चात् माता से जाने-अनजाने हुए सभी भूलों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें। उन्हें कहें-
हे माता, ना मैं आह्वान करना जानता हूँ, ना विसर्जन करना। पूजा-कर्म भी मैं नहीं जानता। हे परमेश्वरि! मुझे क्षमा करो। मन्त्र, क्रिया तथा भक्ति से रहित जो कुछ पूजा मैंने की है, हे देवि! वह मेरी पूजा सम्पूर्ण हो। यथा-सम्भव प्राप्त उपचार-वस्तुओं से मैंने जो यह पूजन किया है, उससे आप भगवती श्रीलक्ष्मी प्रसन्न हों।

दीपमाला प्रज्जवलन विधि

सूर्यास्त के पश्चात् माता लक्ष्मी के समक्ष दीपमाला का प्रज्जवलन करें। घर के मुख्य द्वार पर दीपमाला लगाएं। दीपमाला प्रज्जवलन के समय यह मन्त्र का उच्चारण करें।
शुभं करोतु कल्याणं आरोग्यं सुख सम्पदाम।
शत्रुबुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमोस्तुते॥

कृपया ध्यान दे
1- पूजन हेतु परिवार के सभी सदस्य का होना उचित माना गया है। 
2-     माताजी को पुष्प में कमल व गुलाब अति प्रिय है। फल में श्रीफल, सीताफल, बेर, अनार व सिंघाड़े प्रिय हैं। सुगंध में केवड़ा, गुलाब, चंदन के इत्र का प्रयोग इनकी पूजा में अवश्य करें। अनाज में चावल तथा मिठाई में घर में बनी शुद्धता पूर्ण केसर की मिठाई या हलवा, शिरा का नैवेद्य उपयुक्त है।
3.     प्रकाश के लिए गाय का घी, मूंगफली या तिल्ली का तेल इनको शीघ्र प्रसन्न करता है। अन्य सामग्री में गन्ना, कमल गट्टा, खड़ी हल्दी, बिल्वपत्र, पंचामृत, गंगाजल, ऊन का आसन, रत्न आभूषण, गाय का गोबर, सिंदूर, भोजपत्र का पूजन में उपयोग करना चाहिए।
4- माता लक्ष्मीजी के पूजन की सामग्री आपके अपने सामर्थ्य के अनुसार होना चाहिए। किन्तु लक्ष्मीजी को कुछ वस्तुएँ अत्यंत प्रिय हैं। उनका उपयोग करने से वे शीघ्र प्रसन्न होती हैं। इनका उपयोग करना आवश्यक है। वस्त्र में माता जी का प्रिय वस्त्र लाल-गुलाबी या पीले रंग का रेशमी वस्त्र है।      
5- लक्ष्मी माता जी को प्रसन्न करने हेतु, श्रीसूक्त, लक्ष्मीसूक्त व कनकधारा स्रोत का पाठ करे

गणेश जी की आरती

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
एक दंत दयावंत चार भुजाधारी।
माथे पर तिलक सोहेमुसे की सवारी।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
पान चढ़े फूल चढ़े तथा चढ़े मेवा।
लड्डुवन का भोग लगे, संत करे सेवा।।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़ियन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।।
सुर श्याम शरण आये सफल कीजे सेवा।। 
जय गणेश देवाजय गणेश जय गणेश देवा। 
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा।।

क्ष्मीजी की आरती

ॐ जय लक्ष्मी माता मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निसदिन सेवतहर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
उमा, रमा, ब्रम्हाणी, तुम जग की माता
सूर्य चद्रंमा ध्यावतनारद ऋषि गाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
दुर्गारूप निरंजन, सुख संपत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्याताऋद्धि सिद्धी धन पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम ही पाताल निवासनी, तुम ही शुभदाता
कर्मप्रभाव प्रकाशनीभवनिधि की त्राता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
जिस घर तुम रहती हो, ताँहि में हैं सद्गुण आता
सब सभंव हो जातामन नहीं घबराता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
तुम बिन यज्ञ ना होता, वस्त्र न कोई पाता
खान पान का वैभवसब तुमसे आता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
शुभ गुण मंदिर, सुंदर क्षीरनिधि जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिनकोई नहीं पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
महालक्ष्मी जी की आरती, जो कोई नर गाता
उर आंनद समातापाप उतर जाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
स्थिर चर जगत बचावै, कर्म प्रेर ल्याता
तेरा भगत मैया जी की शुभ दृष्टि पाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता,
तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥ ॐ जय लक्ष्मी माता....x

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